उनकी बातों में निराशा थी, बेबसी थी और जिंदगी व्यर्थ गमाने की पीड़ा थी। दोस्त की बातों का चंदूजी ने कोई जवाब नहीं दिया। केवल सूनी, निराश, धंुधलाती और आहत नजरों से भीड़ की हलचल को देखते रहे। जैसे उनकी जुबान छीन ली गई हो। दुखी कलेजे के फाले फूटने से उन दोनों के संयम का बांध टूट गया। दोनों जिगरी दोस्त एक-दूजे को डबडबाई आंखों से देखते रहे और फिर नजरें झुका लीं।
अस्पताल से बाहर खड़े चंदूजी निराशा और लाचारी से मन ही मन व्यथित हो रहे थे। उनके दिमाग में सूनापन पसर रहा था। अस्पताल आने के बावजूद उनकी डॉक्टर के पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, क्योंकि उनकी जेब में किराए जितने ही पैसे थे।
तभी उनके कंधे पर किसी ने हल्का सा हाथ रखकर कहा, "वाह चंदू भाई, वषोंü बाद आज मिले हो, कैसे आना हुआ यहां? "अरे संदीप, आज तो खूब मिले यार, मन हरा हो गया।" दोनों प्रेम से गले मिले और चंदूजी ने मरियल स्वर में बताया, "कई बीमारियां मेरे पीछे पड़ गई हैं भाई, इसलिए यहां आना पड़ा।" संदीपजी गौर से अपने पुराने दोस्त की तरफ देखने लगे। मैले कपड़े, सूखा हुआ चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, रूखे बाल, शरीर में खून का नाम नहीं, कद भी जैसे घट गया हो। चिंतित स्वर में पूछा, "क्या बात है, इतने कमजोर कैसे हो गए?"
"क्या बताऊं। बस यही समझ लो कि तुम्हारे दर्शन लिखे थे, इसलिए मरा नहीं। कई रोग और दुख-संताप मेरी जान खा रहे हैं, पता नहीं कब...." गला रूंधने से चंदूजी अपनी बात पूरी नहीं कर पाए। वे खुद को इतना लाचार, इतना बेबस समझ रहे थे, कि आंसुओं से उनकी आंखें भर आइंü। अपनी स्कूल लाईफ के साथी के साथ अपना दुख बांटना चाहते थे पर उसे खुद में खोया देखकर चुप हो गए। यह भी ध्यान से सुन नहीं रहा है। उधर संदीप जी का ध्यान उनकी तरफ ही था, तभी तो उनके चुप होते ही वे अपना दुखड़ा रोने लगे, "मुझे भी ±दय रोग ने दुखी कर रखा है और भी कई दुखदाई चिंताओं में डूबा हुआ हूं मैं भी। तुम्हारी घर-गृहस्थी के क्या हाल हंै? बेटे-बहुओं की खबर बता?"
कभी खूब कमाऊ, सरल स्वाभाव के चंदूजी को शराब और जुआ ले डूबा। जब उन्होंने लाखों की कमाई को हाथ का मैल समझकर पीने-पिलाने व जुए की लत में उड़ाना शुरू कर दिया तो नौकरों के मन में खोट आ गया। जिसका दांव चला, दुकान का माल कौडियों के मोल बेचकर अपनी जेब भरकर, दुकानदारी चौपट कर चलता बना। रोजाना दारू पीकर बवाल करने से खफा होकर उसके चारों नौकरी पेशा बेटे-बहुएं, उसे अकेला छोड़कर दूर जा बसे। शराब से खराब हुए शरीर मे अब कई जानलेवा रोगों ने घर बना लिया तो, रोने-पछताने के सिवाय कुछ शेष नहीं रहा। संदीप जी कभी पुलिस में थे, परन्तु रिश्वतखोरी के कारण बदनाम हो गए और एक दिन रंगे हाथ धरे गए। इससे नौकरी जाती रही और अब कोई उनके पास लगना नहीं चाहता।
रहा-सहा ±दय रोग ने उनका जीना दूभर कर दिया। "चारों बेटों-बहुओं ने सेवा का ढ़ोंग रचकर बची-खुची पूंजी हथिया ली मुझे भगवान भरोसे छोड़कर दूर जा बसे। मुझसे जबरदस्ती हस्ताक्षर करवाकर हवेली बेच दी। अब मैं एक कोठरी में पड़ा हूं। घरवाली ने मुझे समझाया कि बुढापे मे तो औलाद का कहना मानना पड़ेगा परन्तु मैं बेटे-बहुओं की हुकूमत में नहीं रह सकता। किसे दोष दूं? अब न मुंह में दांत हैं न पेट में आंत। मैंने तो अपने हाथों से ही अपनी जिंदगानी बरबाद कर ली।" घायल सुर में अपनी व्यथा कहकर चंदूजी चुप हो गए, कंठ रूंध गए और खांसी आने लगी। मन की व्यथा से व्याकुल हो रहे अपने साथी की तरफ संदीप जी चाह कर भी नहीं देख पा रहे थे। अपने पुराने मित्र का उदास चेहरा देखना उनके लिए पीड़ादाई था। उनके खुद के ±दय का दुख-संताप भी छलक पड़ा।
रूठे सुर में बोल पड़े, "मेरा जमारा तो एक बेटे-बहू ने ही दुखदाई बना रखा है। वषोंü पूर्व जब तुम्हारी भाभी छोड़ कर चली गई तब मेरी तो दुनिया ही उजड़ गई। मेरी सार-सम्भाल करने और दुख-तकलीफ का हाल पूछने वाला भी कोई नहीं था। फिर भी पुत्र मोह में अंधा होकर मैंने खूब काली कमाई की। ना कभी दान-पुण्य किया, न ही किसी गरीब की मदद की। साधु-संगत व सत्संग से भी सदैव दूर रहा। अब पश्चाताप व आत्मग्लानि पूरी-पूरी रात मुझे सोने नहीं देती। आखिर करूं भी तो क्या?" घबराहट बढ़ी तो वे चुप हो गए पर उनके कलेजे मे वेदना की एक हूक उठी कि इस भरी-पूरी दुनिया मे कोई उनका सगा नहीं, कोई अपना नहीं, उनकी मौत पर रोने वाला तक कोई नहीं। गलत रास्ते चलने, दूसरों पर जुल्म ढहाने, झूठ-फरेब और ढेर सारा धन कमाने की लालसा में उम्र गमाने का अफसोस कभी न कभी तो प्रकट होता ही है। मरते वक्त या बेबसी की हालत में मन में दबी भावनाएं बिलबिलाती-कुलबुलाती हुई जुबान पर आ ही जाती हैं। बेटे-बहू के ±दयहीन व्यवहार से दुखी होकर संदीप जी ने कई बार घर-संसार त्यागने का इरादा किया पर कलेजा कमजोर निकला। जीते जी मोह-माया छोड़ना कोई आसान काम नहीं है।
पिछले जमाने की बाते करते हुए, उनकी यादों के झरोखे खुल गए। अब उस गुजरे वक्त की स्मृति कितना सताती है। जवानी के वो लापरवाह दिन, वे मदभरी आंखें, चेहरे पर खून की ललाई, पहलवान-सी काया। न काम-धंधे की फिक्र, न नुकसान का भय, न कमाने की चिंता। हर वक्त बने-ठने रहते और सुख-चैन की बीन बजती। परन्तु अब बुढ़ापे में सिर्फ अंधेरा, अकेलापन, असंतोष और लाचारी। बाजार की चहल-पहल और रौनक से बेखबर, वे दोनों दुखी मित्र आपबीती सुनाते रहे। उनकी आंखें डबडबा रही थीं और चेहरा उदासी व विषाद से काला हो रहा था। उनके दिमाग मे धुंआ-सा उठ रहा था और ±दय में ढलती उम्र, बढ़ती कमजोरी के कारण झुंझलाहट पैदा हो रही थी। अंतस की पीड़ा कलेजे में फंसी पुरानी फांस की मानिंद साल रही थी। बुढ़ापे के धंुधलके में जवानी की याद कितनी प्यारी लगती है। यदि आदमी का बस चले तो अपनी जिंदगी से जवानी को कभी जाने ही न दे। तब घर-गृहस्थी की कल्पना सुहानी लगती है। शानदार बंगला, हर तरह से लायक परी-सी बीवी, गोल-मटोल हंसते-खेलते बच्चे...... परन्तु जब विवाह के बाद, घरेलू समस्याओं से जूझना-निपटना पड़ता है तब सतरंगी कल्पनाओं को बदरंग होते देर नहीं लगती। फिर सोचते हैं कि अकेले रहने में ही जिंदगी का सुख है। जितने कष्ट हैं, जितनी समस्याएं हैं वे सभी इस विवाह में ही हैं। कहावत भी तो है-थाली न परात, बाबा नाचे सारी रात।
अब क्यों याद आ रहा है बीता हुआ वक्त, गुजरा हुआ जमाना, जो समय फिर लौटकर नहीं आ सकता, उसके लिए मन-प्राण क्यों तरसते हैं? जिस पड़ाव को खुशी से छोड़ आए उसे याद करके मन पीछे क्यों भागता है, क्यों तड़पता है? परन्तु इन सवालों का जवाब वक्त के सिवाय और कोई नहीं दे सकता। संदीप जी अपने कांपते हाथों में अपने मित्र का हाथ थामकर कहने लगे, "आज तुम्हारी आपबीती सुनकर मेरी सारी व्यथा मिट गई मेेरे यार, अब मैं जान गया हूं कि सुख-शांति और आत्म संतोष संतान या धन-माया पर निर्भर नहीं है। ये तो जिंदगी में किए सत्कर्माे, सेवा व त्याग से मिलते हैं या फिर मौत की गोद में। मैं दिल का रोगी हूं। कौन जाने यह कब धड़कना बन्द कर दे। शायद हम फिर मिल पाएं कि नहीं लेकिन ऊपर तो मिलेंगे ही। इतना कहकर वे दर्दभरी हंसी हंसने लगे। अनमने चंदूजी भी फीकी सी हंसी हंसे और दोनों पुराने दोस्तों की हंसी एक सुबकी बनकर बिछोह के गम में डूब गई। उनकी बातों में निराशा थी, बेबसी थी और जिंदगी व्यर्थ गमाने की पीड़ा थी। दोस्त की बातों का चंदूजी ने कोई जवाब नहीं दिया। केवल सूनी, निराश, धंुधलाती और आहत नजरों से भीड़ की हलचल को देखते रहे। जैसे उनकी जुबान छीन ली गई हो। दुखी कलेजे के फाले फूटने से उन दोनों के संयम का बांध टूट गया। दोनों जिगरी दोस्त एक-दूजे को डबडबाई आंखों से देखते रहे और फिर नजरें झुका ली। अन्तर्मन की वेदना जब उन दोनों के मुरझाए चेहरे की धुंधलाई आंखों से ढलकने लगी तो वे बाजार में आते-जाते लोगों से मुंह छिपाते हुए थके-हारे कदमों से अपनी-अपनी काल-कोठरी की तरफ चल पड़े।
सावित्री चौधरी अनुवाद-मदनगोपाल लढ़ा
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