संविधान के 73 वें संशोधन के अंतर्गत पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए कम से कम तैंतीस और राजस्थान जैसे कई राज्योें में तो पचास फीसदी आरक्षण की व्यवस्था से अकेले राजस्थान में 2010 के पंचायत चुनावों में कुल एक लाख बीस हजार पंचायत जनप्रतिनिधियों में साठ हजार से अधिक महिलाएं चुनाव जीत कर आई हैं।
हाल ही राजस्थान के शिक्षा मंत्री भंवरलाल मेघवाल ने बस्सी तहसील की जिला परिष्ाद सदस्य करमा देवी मीणा के साथ अभद्रता की। करमा देवी सिर्फ यही तो चाहती थी कि उनके गांव के स्कूल में अध्यापक की नियुक्ति की जाए। करमा देवी नहीं जानती कि एक महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस लोकतंत्र में अभी कितने रास्ते हैं, जिनसे वे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकती हैं। मसलन वे अगर अपने साथ गांव के स्त्री-पुरूष्ाों को साथ लेकर सामूहिकता के साथ अपनी बात मनवाने की कोशिश करतीं तो नजारा ही कुछ और होता।
आज देश के अनेक राज्यों में असमान विकास के कारण आम आदमी का जीना इस कदर दूभर हो गया है कि भोले-भाले ग्रामीण किसान और आदिवासियों से लेकर खेत मजदूर और दूसरे दस्तकार तक गहरे असंतोष्ा से भर गए हैं। आबादी के बहुत बड़े हिस्से को लगता है कि सरकार और सरकारी अधिकारी का उनसे कोई जुड़ाव या सरोकार नहीं है और सारी व्यवस्था उन्हें तिल-तिलकर मारने के लिए बनी है। हिंसा की राह पर लोगों को ले जाने वाले नक्सलियों के मुकाबले देश के पास जमीनी स्तर पर लोगों की जरूरत और क्षमताओं के लिहाज से पर्याप्त संसाधन ही नहीं विकास योजनाएं और उन्हें क्रियान्वित करने वाली एक पूरी व्यवस्था भी है। आवश्यकता इस बात की है कि उस व्यवस्था को जल्द से जल्द और ज्यादा से ज्यादा मजबूत किया जाए, ताकि त्रस्त और हताश लोगों को राहत मिले। महात्मा गांधी का सपना था कि ग्रामीण भारत का तेजी से और समुचित विकास करने के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से एक प्रभावशाली व्यवस्था विकसित की जाए जो अपने स्तर पर ग्रामीण भारत के सर्वागीण विकास का दायित्व वहन करे।
नए भारत का निर्माण करेंगी महिलाएं हम जानते हैं कि आम आदमी सामान्य तौर पर हथियार तभी उठाता है जब उसके अस्तित्व पर ही संकट आ जाए, अन्यथा वह सहज भाव से अभावों की जिंदगी भी जी लेता है और शिकायत भी नहीं करता। इसीलिए संविधान के 73वें संशोधन के अंतर्गत पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए कम से कम तैंतीस और राजस्थान जैसे कई राज्यों में तो पचास फीसदी आरक्षण की व्यवस्था ने इस देश के लोकतांत्रिक इतिहास में अनूठा अवसर प्रदान किया है कि वे इस महादेश को अपने ममत्व, वात्सल्य और पारिवारिक दायित्व की भावना के साथ विकास की उस राह पर ले जाएं जहां हर भारतीय के पास एक सहज जीवन जीने के संसाधन उपलब्ध हों। अकेले राजस्थान में 2010 के पंचायत चुनावों में कुल एक लाख बीस हजार पंचायत जनप्रतिनिधियों में साठ हजार से अधिक महिलाएं चुनाव जीत कर आई हैं। सरकार की मंशा इन जनप्रतिनिधियों के माध्यम से एक नए ग्रामीण भारत का निर्माण करने की है। लेकिन पिछला अनुभव बताता है कि सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली में भारी अंतर्विरोध होने के कारण वांछित परिणाम प्राप्त होने में अभी बहुत समय लगना है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है कि खुद भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ से लिखित वादा किया है कि आने वाले पांच सालों में यानी सन् 2015 तक शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप न्यूनतम लक्ष्य प्राप्त कर लिए जाएंगे। ये लक्ष्य मूल रूप से गरीबी उन्मूलन और भुखमरी को समाप्त करने के लिए तय किए गए हैं और दुनिया के कई देशों ने भारत की तरह संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ ऎसे वायदा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। हम जानते हैं कि आंकड़ों के स्तर पर सरकारी लक्ष्य कैसे प्राप्त किए जाते हैं और वाहवाही लूटी जाती है। इसलिए उन रूकावटों की पहचान बहुत जरूरी है, जो हजारों करोड़ रूपये खर्च कर समग्र भारत के विकास का लक्ष्य हासिल करने के मकसद में दिक्कतें पैदा कर सकती हैं। इस मकसद को हासिल करने में महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका बहुत प्रभावी हो सकती है, बशर्ते सरकारें और स्वयं महिलाएं इस पर गंभीरता पूर्वक विचार कर इसे अमल में लाएं।
अबला को सबला बनना होगा नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं का चुनाव में जीत कर आना ही प्रमुख नहीं है, बल्कि उनके लिए सबसे जरूरी यह है कि उनकी क्षमताओं को अधिकाधिक विकसित किया जाए, जिससे वे लोक कल्याण में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका सही ढंग से निभा सकें। फिलहाल स्थिति यह है कि महिला जनप्रतिनिधि अशिक्षा और पुरूष्ाों पर निर्भरता की वजह से न तो अपनी क्षमताओं को पहचान पाती हैं और न ही विकसित कर पाती हैं। हाल ही में देखा गया कि राजस्थान के शिक्षा मंत्री भंवर लाल मेघवाल ने बस्सी तहसील की जिला परिष्ाद सदस्य करमा देवी मीणा के साथ अभद्रता की। करमा देवी सिर्फ यही तो चाहती थी कि उनके गांव के स्कूल में अध्यापक की नियुक्ति की जाए। करमा देवी के साथ जो कुछ हुआ वह हमारे समाज की मर्दवादी मानसिकता का एक सबूत है। करमा देवी नहीं जानतीं कि एक महिला जनप्रतिनिधि के लिए इस लोकतंत्र में अभी कितने रास्ते हैं, जिनसे वे अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकती हैं, मसलन वे अगर अपने साथ गांव के स्त्री-पुरूष्ाों को साथ लेकर सामूहिकता के साथ अपनी बात मनवाने की कोशिश करतीं तो नजारा ही कुछ और होता। लेकिन इसी के साथ सच्चाई यह भी है कि इस बार के पंचायत चुनावों में बड़ी संख्या में शिक्षित महिलाएं जीत कर आई हैं जो अपनी यथासंभव क्षमता के साथ अपने गांवों को बदलते भारत के साथ कदमताल करने की दिशा में ले जाने के लिए काम कर रही हैं।
सरकारी स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए किए जाने वाले कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण है, सभी स्तरों पर जन प्रतिनिधियों को सघन प्रशिक्षण प्रदान करना। लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण को मात्र खानापूर्ति के लिए किया जाता है। दूसरी तरफ जन प्रतिनिधि भी प्रशिक्षण के प्रति उदासीन होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 90 प्रतिशत जन प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, लेकिन यह प्रतिशत उपस्थिति का है और वह भी अनिवार्यता के कारण। वास्तव में कितने जन प्रतिनिधि लाभान्वित होकर निकले और कितनों ने इसका व्यावहारिक जीवन में प्रयोग किया इसके कोई आंकड़े नहीं हैं। एक बार प्रशिक्षण के बाद सरकार अपना दायित्व पूर्ण मानती है और अगले चुनाव तक भूल जाती है। ग्रामीण जन प्रतिनिधियों के लिए एक बार के नहीं, बल्कि सतत प्रशिक्षण की जरूरत है, क्योंकि ऎसा करने से ही नेतृत्व क्षमताओं और आत्मविश्वास का विकास होता है, पूरे तंत्र और व्यवस्था को समझने में सहायता मिलती है। महिला जन प्रतिनिधियों के साथ आरंभ से अंत तक काम करने और सहयोग करने के लिए द हंगर प्रोजेक्ट जैसी बहुत-सी गैर सरकारी संस्थाएं हैं, जो पूरी गंभीरता के साथ ग्रामीण विकास में महिला नेतृत्व को प्रभावकारी बनाने में लगी हैं और इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आए हैं।
गरीबी की मार महिला पर भार इस हकीकत को सभी मानते हैं कि गरीबी की मार ग्रामीण भारत को ज्यादा झेलनी पड़ती है और इसमें भी पहला शिकार महिलाओं को ही होना पड़ता है, क्योंकि सबसे पहले उन्हीं पर होने वाले खर्च कम किए जाते हैं और परिवार की आय बढ़ाने के लिए उन्हीं को सबसे ज्यादा श्रम करना पड़ता है। स्त्री को दोयम मानने की मानसिकता भी हमारे यहां व्यापक है। इस धारणा के साथ ग्रामीण महिलाओं के हालात बदलने में महिला जन प्रतिनिधियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। पंचायत का बजट बनाते समय अगर वे महिलाओं की प्राथमिकता वाले पहलुओं की पैरवी करें, विकास कार्यों में महिला आधारित मुद्दों को शामिल करवाने में सफल हों और महिलाओं पर होने वाली हिंसा रोकने की कोशिश करें तो परिदृश्य बदलने में देर नहीं लगेगी। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हमारे समाज में स्वयं महिला जन प्रतिनिधियों के साथ ही आए दिन यौन दुराचरण के मामले सामने आते रहते हैं। इसमें भी चिंताजनक पहलू यह है कि महिला जन प्रतिनिधि को स्वयं पर होने वाली हिंसा या यौन दुराचरण के मामले में विशेष्ा कानूनी संरक्षण नहीं है, उसके साथ सामान्य महिला जैसी ही स्थिति है।
बिना तालमेल कैसी पंचायत पंचायती राज व्यवस्था का सांगठनिक ढांचा ऊपर से नीचे एक दूसरे पर आश्रित है, लेकिन संकट यह है कि इस बहुस्तरीय प्रणाली को सहयोग करने वाली कोई व्यवस्था नहीं है। पंचायत स्तर पर पंच, सरपंच, उप सरपंच और ग्राम सेवक होते हैं, लेकिन इन सबमें कोई तालमेल नहीं होता। जाति, धर्म, लिंग, वर्ग और राजनैतिक दल जैसे भेद की वजह से आमतौर पर इन सबके बीच कोई सामंजस्य नहीं हो पाता। जबकि पंचायती राज व्यवस्था एक किस्म की टीम भावना की मांग करती है, जो कहीं दिखाई नहीं देती। ग्राम सेवक और अन्य सरकारी कर्मचारी व अधिकारी अपनी नौकरी पक्की मान कर जन प्रतिनिधियों के साथ, खासकर महिलाओं के साथ मनमानी करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि लोगों के काम नहीं हो पाते और व्यवस्था के प्रति असंतोष्ा पनपता है। सरकारी मशीनरी और जनप्रतिनिधियों में जिस प्रकार के संबंध होने चाहिए, उसकी अनुपस्थिति जमीनी लोकतंत्र को विकसित नहीं होने देती। लोगों की मानसिकता में बदलाव से ही ये हालात बदल सकते हैं। इस बदलाव में पंचायती राज व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान कर सकती है, जहां गांव के सब लोग मिल-बैठ कर गांव के विकास के लिए सामूहिक योजनाएं बनाकर निर्णय लें, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि ग्राम सभा प्राय: सब जगह बेहद कमजोर है। सन् 2010 को ग्राम सभा सशक्तिकरण वष्ाü घोçष्ात किया गया है, लेकिन राजस्थान में छह महीने गुजरने के बाद भी इसकी कोई सुगबुगाहट तक सुनाई नहीं देती। पिछली बार जब सीपी जोशी राजस्थान के पंचायत राज मंत्री बने थे, तो ग्राम सभा को मजबूत करने के लिए लगातार अखबारों में विज्ञापन छपे थे। अब जोशी केंद्रीय मंत्री हैं, लेकिन ग्राम सभा की मजबूती की आवाज कहीं नहीं है।
नरेगा ही करेगा हर दर्द की दवा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून लागू होने के बाद ग्रामीण भारत में गरीब लोगों को जीने का एक नया संबल मिला है। पहले नरेगा और अब महानरेगा दोनों ही पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से क्रियान्वित हो रहे हैं। हर पंचायत के पास इसके तहत सालाना एक करोड़ का बजट है, जो न केवल गांव के विकास कार्यों में इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि इसी में से गरीबों को रोजगार भी मिल रहा है। इसमें भ्रष्टााचार की शिकायतें भी आ रही हैं, लेकिन फिर भी यह अकेली योजना ग्रामीण भारत में उपजे असंतोष्ा को कम करने में सक्षम है, जरूरत भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और अधिकाधिक लोगों तक पहुंचने की है। हमारे गृहमंत्री और कई दलों के नेता बारंबार नक्सलवाद से निपटने के लिए दमन की कार्यवाहियों की बात करते हैं, लेकिन एक छोटी सी बात समझ में नहीं आती कि लोगों को सही राह दिखाने के लिए जब हमारे पास पर्याप्त चीजें मौजूद हैं तो आप दवा की जगह बंदूक की गोली क्यों देना चाहते हैं? इस सवाल का जवाब किसी सरकार के पास नहीं है और सारी समस्याएं इसीलिए खड़ी हो रही हैं।
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