नदियां सारे संसार को एक समान समझती हैं। यह तो मनुष्य है जो जाति, धर्म, प्रांत, भाषा, वर्ण या देश का भेद करता है। मूंग की थाली में कोई मूँग दूसरे मूंग से बड़ा नही होता, लेकिन मनुष्य को दूसरे मनुष्यों से बड़ा होने का जुनून है। बदमाशियों या प्रपंचों से कोई बड़ा हो सका है क्या? बड़ा होने के लिये तो बड़प्पन चाहिए, और जिस में बड़प्पन आ गया हो- वह बड़ा दिखने के लिये प्रपंच नहीं करता। वह अकड़ता नहीं है, झुकता है। झुकने के लिये भी तो कलेजा चाहिए। जैसे फलों से लदी डालियां नम- नम कर सबका अभिनंदन करती हों।
पांडवों ने जब राजसूय यज्ञ किया तो परमेश्वर के पूर्णावतार बताए जाने वाले श्रीकृष्ण ने एक ही जिम्मेदारी ली- अतिथियों के पांव धुलाने की। जिस के पांवों की धूल का स्पर्श ही मनुष्य के सारे पापों को मिटाने की क्षमता रखता हो, वह ही अवतारी यज्ञ के लिये आहूत अतिथियों के चरण धुलवा रहा था। छल छंद तो मनुष्य को ओछा बनाते हैं। पिछले पुण्यों से देव होना आसान है लेकिन देव से "महादेव" तो वह ही हो सकता है, जो सबके कल्याण के लिये हलाहल पीकर भी मुस्कुरा सके। लेकिन जिन्होंने नदी का देय माथे पर धारण नहीं किया हो, उन में से कितने लोग इस बात का मर्म समझ सकते हैं? हम तो नदियां हैं। जो जिस दृष्टि से देखता है, हम में उसे वैसे ही रंग नजर आ जाते हैं। "ये यथा माम् प्रपद्यंति, तांस्तथैव भजाम्यहम्" कहने को यह बात श्रीकृष्ण ने महाभारत के मैदान में अर्जुन से कही थी, लेकिन नदियों के लिये भी सत्य यही है।
नदियों के पानी का क्या स्वरूप? जिसने जैसे पात्र में संचित कर लिया, पानी वैसा ही हो गया। कालिंदी में कूद कर कालिया नाग ने भी जगह मांगी तो कालिंदी ने दे दी। जानती थी कि कालिया तो जहर ही उगलेगा। दूध पीकर भी जहर उगलने वाले पानी की मर्यादा का निर्वहन क्या करेंगे? पड़ी हुई आदतें किससे छूटी हैं जो कालिया से छूटती? उसने अपने जहर की आग से सारी कालिंदी ही जला दी। लेकिन वह नदी ही क्या जो होठों पर "हाय" ले आती? कालिया को मन भर कर मनचीती नहीं करने देती तो पाप का घड़ा कैसे फूटता? भरता नहीं तो छलकता भी कैसे?
कालिन्दी चुपचाप सब कुछ सहती रही। सहती रही, बहती रही। इस सहन करने में कालिंदी की कोई विवशता नहीं थी। जो वह नहीं चाहती तो कालिया की क्या बिसात थी कि उस के भीतर रहकर एक भी फुफकार मार लेता? लेकिन कन्हैया से मिलने के लिये बहाना तो चाहिए था। कलेजे के कन्हाई से मिलते समय उसके ही रंग में रंगे होने का सुख क्या है, यह बात तो वही समझ सकते हैं जिनमें ढाई आखर बांचकर पंडित होने की अप्रतिम ललक हो। यह ढाई आखर का पढ़ना साधारण कागज पढ़ने की तरह नहीं है, दीदार के लिये जागते जागते आंखों में और मिलने के बा नाचते नाचते पांवों में छाले पड़ जाते हैं। विरह का नाग कभी कालिया नाग से कम नहीं होता। अंतस में रहकर ही फुफकारता है।
कालिया हो या विरह, दोनों जब फुफकार मारते हैं तो गर्म-गर्म आग में झुलस कर शरीर जैसे काला स्याह पड़ जाता है। हेत का कान्हा अंतस की लहरों पर चढ़कर बांसुरी यों ही तो नहीें बजाता! इसके लिये तपना पड़ता है। यह तपना तप करना भी है और आग में झुलसना भी। यह तप साधने के लिये अपनी ही सुध-बुध बिसरा देनी होती है। यह बिसरना भी जुटाया नहीं जाता, बस- हो जाता है। जो बिसरना सोचे समझे तरीके से हो, वह कैसा बिसरना? वह तो केवल बिसरने का स्वांग है। ऊद्धव जब गोपियों को ज्ञान योग की सीख देने गोकुल पधारे तो गोकुल की सीधी सादी गोपियों ने भी तो यही बात समझाई थी- "ऊधे, मन न हुए दस-बीस/ एक हुतो सो गयो स्याम संग, कौ आराधैं ईस?"
अपनी सुध-बुध बिसरना और अपने स्वार्थ के लिये जिम्मेदारियों को बिसरना -अलग अलग बातें हैं। मीरा बाई तो दुनिया को भूलकर गांव-गांव गाती फिरी थी- माई री मैं तो लियो री गोविन्दो मोल।" गोविन्दा को कौन खरीद सकता है? जो सारी सृष्टि का पालनहार है, उसे खरीदने का दम भरना तो दूर की बात है, खरीदने की इच्छा करना भी अनहोनी करने की तरह है। पालनेवाला ही बिकने के लिये तैयार होगा तो पालितों की रक्षा कौन करेगा?
लेकिन प्रेम में यह ताकत है कि वह गोविन्द को खरीद लेने का दम ही नहीं भरता, आखिरी समय गोविन्द की मूर्ति में समाकर अपनी बात साबित भी कर देता है। इसलिये ही जो मीरा दुनिया को भूलकर गोविन्द का स्मरण करती फिरी, दुनिया उसी मीरां का स्मरण करके धन्य हो रहा है। लेकिन मीरां का दुनिया को बिसरना, सचमुच ही दुनिया को बिसर जाना नहीं था। जिस के ह्वदय में दीनदयाल की सुमिरनी फिर रही हो, वह दुनिया के गोरखधंधे में कैसे उलझे? शास्त्र भी कहते हैं कि बड़ी बातों के लिये छोटे स्वार्थ को भूलना पड़ता है। इस दौर का मनुष्य अपने स्वार्थ साधने के लिये जिस तरह परमार्थ के कार्य बिसर रहा है- उस विस्मृति में मीरां के घुंघरू नहीं सुनाई देते, केवल उलझनें और प्रपंच के स्वर सुनाई देते है। हम नदियों से बढ़कर इस बात को और कौन समझ सकता है?
मनुष्य के पाप धोने की मंशा से धरती पर आई नदियां सारे जमाने की गंदगी समेट कर ले जाने का साधन बन गईं। हम ने मनुष्य को अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, लेकिन मनुष्य पूंचा पकड़ कर ही नहीं रोका, गला पकड़ कर हमें ही धमकाने लगा! जल जो जीवन की पगड़ी पर लगा हुआ सरपेंच है। कोई अपनी ही पगड़ी को पांवो तले कैसे रौंद सकता है?मनुष्य की आंख का पानी नहीं मरा होता वह नदियों के पानी के साथ वैसा बर्ताव नहीं करता कि आने वाली पीढियों के लिये साफ पानी मिलने की भी गुंजाइश सिमटती सी दिखे। नदियां ही क्या, कुंए-बावड़ी-तालाब- कुण्ड- जोहड़, मनुष्य ने कुछ भी तो नहीं छोड़ा। लोग कहते हैं कि धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन किसी का लालच पूरा नहीं कर सकती। जमाने ने नदियों पर पहरे बैठा दिये। नदियां बिफरें नहीं तो क्या करें?
अतुल कनक
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