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Saturday, 19 May, 2012
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सादगी का भव्य भाषाई समन्वय
Sunday, January 08, 2012, 10:53 hrs IST
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Humlog01
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16 दिसंबर की उस शाम जब दो अलग-अलग भाषाओं के ज्ञानपीठ पुरस्कार सम्मानित लेखक कुंवर नारायण एवं सीताकांत महापात्र के साथ दिल्ली के इण्डिया हेबिटेट सेंटर के निदेशक राज लिब्रहान ने जब दीप जलाए तो भारतीय भाषाओं के साहित्योत्सव "समन्वय" के आगाज का उजाला फैल गया। अगले दो दिनों तक 8 सत्रों में इतने ही भाषाओं के लेखकों ने चर्चाएं कीं, रचना पाठ किए।

इण्डिया हेबिटेट सेंटर के खुले आकाश वाले एम्फिथेटर में आयोजित इस उत्सव के बारे में कहा यह जा रहा था कि यह वरिष्ठता के साçन्नध्य में भारतीय भाषाओं के युवा-लेखन का उत्सव है। लेकिन असल में दिल्ली प्रेस और प्रतिलिपि बुक्स के सहयोग से इण्डिया हेबिटेट सेंटर द्वारा आयोजित इस आयोजन को याद किया जाएगा लेखिकाओं की यादगार उपस्थिति-प्रस्तुति के लिए। असमी, तमिल और मलयालम भाषाओं के सत्रों को अनेक लेखिकाओं ने जीवंत बनाया। असमी लेखिका अरूपा पतंगिया कलिता ने पहले ही सत्र में यह बात उठाई कि देर से मिले अवसर के कारण महिला लेखन का आधुनिक साहित्य में "स्पेस" देर से बना। बहस के दौरान इस सत्र में यह बात भी सामने आई कि महिला लेखन को अलग दर्जे में रखकर क्यों देखा जाता है। असमी लेखिका बोंटी सेंचोवा को सुनना भी दिल्ली वालों के लिए प्रभावकारी रहा। आयोजन का शायद सबसे अच्छा सत्र रहा मलयालम का।

"हाशिए की आत्मकथाएं" के इस सत्र में उपस्थित श्रोताओं को सिस्टर जेस्मी और नलिनी जमीला जैसी लेखिकाओं को देखने-सुनने का अवसर मिला। नन रह चुकी जेस्मी ने अपनी आत्मकथा लिखी "आमीन", जिसमें उन्होंने इसाई कॉन्वेंट के भीतर महिलाओं की दुर्दशा को प्रमुखता से उठाया। नलिनी जमीला "ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए सेक्स वर्कर" जैसी किताब लिखकर सुर्खियों में आई।

यह पुस्तक मलयालम और अंग्रेजी में बेस्टसेलर रही। इस साहसी "आत्म"कथा की लेखिका को देखना-सुनना अपने आप में दुर्लभ तो था ही रोमांचकारी भी। इसी सत्र में पोक्कुदन जैसे लेखक भी थे, जो पहले कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे फिर पार्टी छोड़कर पर्यावरण बचाने के काम में लग गए। उनको आज "मैंग्रोव मैन" कहा जाता है। तीन अलग-अलग तरह के जीवन, उनके अनुभव और उनके वृत्तान्त- ऎसे अनुभव अन्य भारतीय भाषाओं में कम मिलते हैं। अगले दिन तमिल साहित्य का सत्र "स्त्री लेखन में देह" विषय पर था, जिसमे "बोल्ड" कवयित्री कुट्टी रेवती के साथ सलमा को सुनना बहुत अच्छा अनुभव रहा।

"समन्वय" में सत्र तो भारतीय अंग्रेजी लेखन का भी था और उसमें भारतीय अंग्रेजी लेखन के अर्शिया सत्तार, बशारत पीर, राहुल पंडिता, चंद्रहास चौधरी जैसे कुछ महत्वपूर्ण समकालीन नाम भी थे। लेकिन "गल्प से परे भारतीय अंग्रेजी लेखन की दुनिया" नामक यह सत्र भी समकालीन भारतीय साहित्य की ही तरह अपनी जमीन तलाशता दिखा। अलबत्ता पंजाबी के सत्र में दलित प्रेम कविता पर एक जीवंत सत्र देखने-सुनने को मिला, जिसमें लाल सिंह दिल की कुछ अच्छी कविताएं भी निरूपमा दत्त ने सुनाई।

उर्दू कविता के सत्र को कुछ "स्टार" शायरों की अनुपस्थिति के बावजूद शीन काफ निजाम ने बहसतलब बना दिया। बांग्ला के सत्र के आकर्षण रहे नवारूण भट्टाचार्य तो खोज रहे कवि उज्जल सिंघा। हिंदी के सत्र में बहस का विषय था "नई सदी में नए पाठक की तलाश", लेकिन बहस कुछ प्रकाशक-लेखक संबंध की दिशा में भी चली गई। दिल्ली प्रेस के परेश नाथ ने जब हिंदी के बाजार की अंग्रेजी के बाजार से तुलना की तो हिंदी को लेकर सुनने वालों का आत्मविश्वास बढ़ा ही होगा। सत्र में रवीश कुमार भी मौजूद थे। उन्होंने हिंदी वालों को आलसी तक करार दे डाला। कुलमिलाकर माहौल अच्छा बना रहा। भारतीय साहित्य के इस सालाना जलसे की शुरूआत बहुत उम्मीदें जगाने वाली है। दरअसल यह रचनात्मकता का उत्सव था। ज्यादातर साहित्योत्सव सेलिब्रिटी लेखकों के आयोजन बन जाते हैं। कम से कम इस बार "समन्वय" की सादगी की यही धवल भव्यता थी।

प्रभात रंजन
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