देश के शिक्षा क्षेत्र में हलचल है, डीम्ड विश्वविद्यालयों को लेकर बहस जारी है, पर इस बीच यह बहस कहीं नहीं है कि आखिर उच्च शिक्षा में गुणवत्ता किसी की प्राथमिकता पर है या नहीं, क्योंकि अंतत: सवाल संस्थान के स्वरूप का नहीं, बल्कि संस्थान की शिक्षा के स्तर, गुणवत्ता और पहचान का है...
गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन शुरू किया। वे इसकी योजना लेकर कहीं मान्यता लेने नहीं गए थे। इसका ब्ल्यू प्रिंट उनके मन-मस्तिष्क में था। शांति निकेतन को अन्तरर्राष्ट्रीय ख्याति मिली- उसके बल पर यह विश्वविद्यालय बना। तदनन्तर विश्वभारती के नाम से यह डीम्ड विश्वविद्यालय बन गया और एक समय सरकार द्वारा संचालित होने लगा। इसी क्रम में इसकी ख्याति तिरोहित होती गयी।
उच्च शिक्षा के परिदृश्य में डीम्ड यानी मानित विश्वविद्यालयों का मसला फिर से विवादों में हैं। केन्द्र में नयी सरकार और मानव संसाधन विकास मंत्रालय में नए मंत्री के आने के बाद बहुत से लोग ये कयास लगाने लगे थे कि अब देश की उच्च शिक्षा ढर्रे पर आ जाएगी। लेकिन एक साल से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी अभी तक ऎसा कोई संकेत नहीं मिला है। तकनीकी संस्थानों की अनियमतताओं के उजागर होने के बाद केबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल ने डीम्ड विश्वविद्यालयों का मसला हाथ में लिया था जो अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाया है। उल्लेखनीय है कि इसी सरकार में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुनसिंह ने कई विश्वविद्यालयों को डीम्ड दर्जा प्रदान किया था और उनके इस निर्णय पर गंभीर सवाल उठे थे। वर्तमान मंत्री कपिल सिब्बल ने उच्च शिक्षा आयोग बनाने की योजना जाहिर की जो कहीं अटक गयी लगती है। अलबत्ता विदेशी शिक्षा संस्थानों को भारत में अपना विस्तार करने के लिए विधेयक लाने की तैयारी में जरूर वे जोश से लगे हैं।
इस दौरान देश में कई तरह को विश्वविद्यालय खोलने की घोष्ाणा केन्द्र सरकार के स्तर पर हुई है जिनमें नेशनल यूनिवर्सिटी और वल्र्ड क्लास यूनिवर्सिटी जैसी श्रेणियां शामिल हैं। यह कैसी विडम्बना है कि प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा की भांति उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी विष्ामता को खुद राज्य सत्ता स्थापित कर रही है। इन घोçष्ात विश्वविद्यालयों के कार्यालय एक वाइस चांसलर की नियुक्ति के साथ वजूद में तो आ गए हैं लेकिन इनका भावी नक्शा अभी किसी के पास नहीं है। पिछले कुछ वष्ाोüं में निजी विश्वविद्यालयों को लेकर वाद-विवाद थे जिनका सिलसिला पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा उच्च शिक्षा के लिए बनायी बिडला-अम्बानी समिति की रिपोर्ट के साथ शुरू हुआ है। इसके बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्रा को निर्बाध प्रवेश दिया। कहीं-कहीं न्यायालय के दखल से ही इसमें रूकावट खड़ी हुई। विभिन्न विश्वविद्यालयों को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा देना भी इसी उपक्रम का हिस्सा था जिसकी पुनर्समीक्षा की बात की जा रही थी।
इस सबका मिलाजुला नतीजा मौजूदा उच्च शिक्षा में व्याप्त व्यापक अराजकता सामान्यत: विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों का नियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की पारंपरिक जिम्मेदारी रहा है। इसके मूल में तो वस्तुत: इन संस्थानों को दिए जाने वाले अनुदान के व्यय और औचित्य का परीक्षण करना था। कालान्तर में इसमें और भी बहुत-सी प्रक्रियाएं जुड़ती गयीं। डीम्ड विश्वविद्यालय भी इसके दायरे में आते रहे हैं। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों, विशेष्ाकर राज्य स्तर पर संचालित विश्वविद्यालयों में जिस तरह सरकारों का दखल बढ़ता गया है, उसे अक्सर इन संस्थानों में गिरावट का मुख्य कारण बताया जाता रहा है। ऎसे उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षक और कर्मचारी संगठन अपनी मांगों को लेकर भले ही कुछ भी कहते हों, इन संस्थानों की स्वायत्ता की मांग जरूर उठाते रहे हैं। इसे लगभग निर्विवाद माना जा सकता है कि इन संस्थानों की अकादमिक गिरावट के पीछे राज्य सत्ता का नियंत्रण और दखल किसी हद तक जिम्मेदार रहा है। इस दखल के बहुत सारे आयाम हैं। इस वास्तविकता का एक और पहलू है। सरकार द्वार संचालित अथवा सरकार की मदद/अनुदान से चलने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों पर तो नियंत्रण, नियमन और दखल है, लेकिन निजी क्षेत्र के अन्तर्गत खुलने वाले उच्च शिक्षा संस्थान काफी हद तक इस दायरे से मुक्त हंै हालांकि ये अपने संचालक उद्यम अथवा कार्पोरेट घराने के निंयत्रण में हें कहना न होगा कि इन्हें सरकार ने कई बुनियादी सुविधाएं मुहैया करायी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थान इनकी प्रतिस्पर्घा में देखे जाने लगे हंै। इस तरह एक अराजक दृश्य उपस्थित होता है जिसमें अकादमिक क्षरण की ओर जाते सार्वजनिक उच्च शिक्षा संस्थान हैं, सरकारी विश्वविद्यालयों से समकक्षता स्थापित करते डीम्ड विश्वविद्यालय हैं। वैश्वीकरण से उपजी उच्च शिक्षा प्राप्त करने की विराट आकांक्षा से उपजे निजी संस्थान हैं जो अपने खास इरादे से इस क्षेत्र में उतरे हैं। इन सबके बीच कोई अन्त:सूत्रता-संयोजन अथवा समान्तरता नहीं है। किसी एक पहलू पर सोच-विचार शुरू होता है तो कोई अन्य पक्ष अपनी भयावहता के साथ उद्घाटित हो जाता है।
सैद्धान्तिक रूप से कोई असहमत नहीं है कि भारत को यदि आगे बढ़ना है तो इसे उच्च शिक्षा में गुणात्मक और मात्रात्मक विस्तार करना है। लेकिन इसके लिए कोई सुनियोजित नीति और समयबद्ध योजना नजर नहीं आती। उच्च शिक्षा से जुड़े अनेक मुद्दों पर परस्पर विरोधी राय मिलती हैं, मसलन, कहा जाता है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी के बिना उच्च शिक्षा की भावी मांग को पूरा करना संभव नहीं है। इसके विपरीत राय भी मिलती हैं। इसी भांति ये कहा जाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों को जब तक स्वायत्ता नहीं मिलती, वे अकादमिक रूप से उत्कृष्टता हासिल नहीं कर सकते। इसके उलट कहा जाता है कि इनमें सरकारी नियंत्रण और दखल बढ़ा ही इसलिए कि ये ठीक से काम नहीं कर रहे थे।
यहां हम दो प्रसंगों से मुद्दे को साफ करना चाहेंगे। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन शुरू किया। वे इसकी योजना लेकर कहीं मान्यता लेने नहीं गए थे। इसका ब्ल्यू प्रिंट उनके मन-मस्तिष्क में था। शांति निकेतन को अन्तरर्राष्ट्रीय ख्याति मिली- उसके बल पर यह विश्वविद्यालय बना। तदनन्तर विश्वभारती के नाम से यह डीम्ड विश्वविद्यालय बन गया और एक समय सरकार द्वारा संचालित होने लगा। इसी क्रम में इसकी ख्याति तिरोहित होती गयी। दूसरा प्रसंग टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज यानी टी.आई.एस.एस. मुम्बई का है। इसने अपनी उत्कृष्टता कायम की। बाद में सरकार की ओर से इसे डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा लेने के लिए आमंंत्रित किया गया। ये दोनों प्रसंग निजी पहलों के हैं। पहले प्रसंग में सरकारी हस्तक्षेप के बाद संस्थान की उत्कृष्टता में गिरावट आती है। दूसरे प्रसंग में शायद ऎसा न हो क्योंकि वहां वास्तविक नियंत्रण एक निजी घराने का है। लेकिन उत्कृष्टता के बने रहने की संभावना क्यों लगती है? इसलिए कि टाटा समूह इस संस्थान पर स्वामित्व के बावजूद इसके रोजमर्रा के काम में दखलंदाजी नहीं करने जा रहा। संस्थान को एक तरह की स्वायत्तता इसने दी हुई है जो इसकी अकादमिक उत्कृष्टता के लिए अवश्वंभावी है। क्या हम अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों के प्रति ऎसा रूख अपना सकते हैं। यदि इन्हें आन्तरिक स्वतंत्रता का अहसास नहीं होता, इनकी अकादमिक स्वायत्तता अक्षुण्य नहीं रहती, इन्हें अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त नहीं रखा जाता तो भले ही इनके कितने ही विशेष्ाणयुक्त नाम रख दिए जाएं, ये उत्कृष्ट ज्ञान केन्द्र नहीं बन पाएंगे।
लेखक शिक्षा सुधारों एवं नवाचारों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता हैं
राजाराम भादू
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