मैं एक मजदूर परिवार में पैदा हुआ हूं और मेरे मां-बाप मजदूरी करते रहे हैं। सच कहूं तो मैं ईट-गारों के बीच ही पला-बढ़ा हूं। पांचवीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई-लिखाई से मेरा कोई रिश्ता बचा नहीं, सो मेहनत-मजदूरी करके ही जीवन चलता रहा है। भिलाई शहर में मैंने बतौर मजदूर कई साल काम किया है। मजदूरी से बात नहीं बनी तो सब्जी की दुकान भी लगाई और आलू प्याज भी बेचे।
मेरी पाठशाला "नया थिएटर" पहली बार साल 1999 में बीबीसी के सहयोग से आयोजित एक वर्कशॉप में मुझे साक्षरता और कुष्ठ रोग पर केंद्रित एकनाटक में भाग लेने का अवसर मिला। इस वर्कशॉप के समापन समारोह में हबीब तनवीर साहब मुख्य अतिथि बनकर आए थे। नाटक में मेरा काम देखने के बाद उन्होंने मुझे रायपुर बुलवाया और वहां कुष्ठ पर ही एक नाटक सुनबहरी में मुझे काम दिया। इस तरह मैं हबीब तनवीर के "नया थिएटर" से जुड़ गया। अगर हबीब तनवीर मुझे "नया थिएटर" में लेकर नहीं गए होते और तो आज मैं इस मुकाम पर नहीं होता।
नत्था बनने की कहानी अनुषा रिजवी की फिल्म "पीपली लाइव" में काम के लिए मैंने एक छोटे से रोल मछुआ के लिये ऑडिशन दिया था लेकिन ऑडिशन देखने के बाद आमिर खान, अनुषा जी और महमूद फारूखी जी ने कहा कि नत्था के लिए इससे बेहतर कोई नहीं हो सकता। इस तरह नत्था के लिये मैं चुन लिया गया। फिल्म पूरी होने के बाद आमिर खान मेरे अभिनय से खुश थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ओंकार को देखने के बाद मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं नत्था का रोल करूं। "पीपली लाइव" की शूटिंग के पहले दिन जब कैमरा मेरे सामने था तो मैं डर गया। फिर फिल्म की निर्देशक अनुषा रिजवी ने मुझे समझाया कि आप "नया थिएटर" के कलाकार हैं, आप क्यों घबरा रहे हैं? यह कैमरा-वैमरा छोडिए और आप समझिए कि आप स्टेज पर नाटक कर रहे हैं। खैर, पहले दिन तो मैं डरा हुआ ही रहा लेकिन दूसरे दिन से डर जाता रहा। कोई ढाई महीने तक शूटिंग हुई। थिएटर तो थिएटर है, वहां आप सीधे दर्शक से मुखातिब होते हैं। वहां आपके पास खूब स्पेस होता है। लेकिन ये भी है कि वहां री-शूट नहीं है। आपने कोई डॉयलॉग बोलने में गड़बड़ी की तो वो गया। फिल्म में आप रीटेक पर रीटेक करवा सकते हैं, लेकिन यहां फ्रेम की बंदिश है कि हाथ अगर इस ऊंचाई तक उठाना है तो इसे आप उससे कम या ज्यादा नहीं कर सकते। फिल्म में नत्था से कोई नहीं पूछता कि तुम क्या चाह रहे हो। जो भी आता है, वह यही सवाल करता है कि तुम क्यों मरना चाहते हो? आत्महत्या के फैसले के बाद तुम्हें कैसा लग रहा है? कोई ये नहीं पूछता कि नत्था क्या चाह रहा है। फिल्म में उसके साथ तो कॉमेडी होती ही रहती है। मुझे भी फिल्म में नत्था को देखकर खूब हंसी आई। अपने शहर में लौटने के बाद मैंने फिल्म नहीं देखी है। टॉकीज में जब मैंने पहली बार "पीपली लाइव" देखी तो मेरे मन में यही भाव आया कि किसी समय मैं ऎसी ही टॉकीज में बैठ कर फिल्म देखता था, आज लोग मेरी फिल्म देख रहे हैं।
फिल्म रिलीज होने के बाद जिस दिन मैं मुंबई से लौटा, उस दिन मेरे मुहल्ले में जितने लोग उमड़े, उनको संभाल पाना मुश्किल था। अब यहां हूं तो मेरे जीजा, मेरे भांजे संभाल पा रहे हैं। जब से मैं अपनी बस्ती में लौटा हूं, तब से हर रोज सम्मान का सिलसिला चल रहा है। मुझे अच्छा भी लग रहा है कि पहली फिल्म से ही लोग मुझे जानने लगे हैं, मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं। फिल्मों के कुछ प्रस्ताव और हैं, लेकिन मैंने अभी किसी को हां नहीं कहा है। फिल्म के बारे में मैं आमिर जी से जरूर सलाह लेना चाहूंगा क्योंकि फिल्म मेरे लिए एकदम नया माध्यम है। सितंबर में आगरा बाजार, चरणदास चोर के मंचन की खबर है। फिलहाल तो यही व्यस्तता रहेगी।
मेरा परिवार घर में मां हैं, एक छोटा भाई है, पत्नी और तीन बच्चे हैं। पूरे परिवार ने फिल्म देख ली है और सब खुश हैं। बड़ी बेटी कॉलेज में है। उससे छोटा बेटा पांचवी में पढ़ रहा है। छोटी बेटी पहली कक्षा में है। बेटे ने मेरे साथ फिल्म में मेरे बेटे की भूमिका निभाई है। उसे मैं कभी-कभार थिएटर में ले जाया करता था। अपनी पत्नी सहित परिवार के दूसरे सदस्यों को भी मैं अपने शो में ले जाता रहा हूं और घर वालों ने हमेशा मेरे काम की सराहना ही की है। मेरी पत्नी को भी अच्छा लगता है कि मैं थिएटर करता हूं। "पीपली लाइव" में मेरा काम देखकर वो बहुत खुश हैं। मेरे ख्याल से मैं पहले जैसा था, अब भी वैसा ही हूं। जीवन में भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। हां, देखने वालों का नजरिया जरूर बदला है। शहर में भी "पीपली लाइव" फिल्म में मीडिया नत्था के पीछे रहता था, अब अपने शहर में भी मैं वास्तव में "पीपली लाइव" हो गया हूं। मीडिया लगातार घेरे रह रहा है। बीबीसी के लिए आलोक प्रकाश पुतुल से बातचीत पर आधारित
ओकारदास मानिकपुरी
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