किसी भाष्ाा में शायद ही रवींद्रबाबू जैसे रचनाकार मिलते हैं, जो जिंदगी भर अपनी माटी की, अपनी जनता की और अपनी भाष्ाा की सेवा करते रहें और उन्हें जनता का उतना ही प्यार और सम्मान मिले। आज यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि एक अकेला रचनाकार विशुद्ध गांधीवादी औजारों से एक तरफ तो उपनिवेशवादी सरकार से लोहा ले और दूसरी तरफ अपने ही देश में अपनी भाष्ाा और प्रांतीय अस्मिता के लिए जीवन भर संघष्ाü करता हुआ अपने जीवनकाल में विजय भी प्राप्त करे। लेकिन रवींद्रबाबू ऎसे ही संघष्ाüशील और जुझारू कलम के योद्धा थे। गोवा और कोंकणी के इस महान सपूत ने अभी हाल ही में 85 वष्ाü की आयु में 27 अगस्त, 2010 को अंतिम सांस ली। 25 मार्च, 1925 को दक्षिणी गोवा में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. राजाराम केलकर के यहां उनका जन्म हुआ। नाना लिंगुबाबू दलवी ने कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर के नाम पर नाम रखा रवींद्र। उन दिनों गोवा पर पुर्तगाल का शासन था और पूरा गोवा मुक्ति के लिए छटपटा रहा था। पणजी में आरंभिक शिक्षा के दौरान ही 21 बरस की उम्र में रवींद्र केलकर गोवा मुक्ति संग्राम से जुड़ गए थे। कॉलेज में शिक्षाविद, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी लक्ष्मण राव सरदेसाई ने उनके भीतर देशभक्ति और जनसेवा के पौधे को पल्लवित किया।
उन्हीं दिनो स्वाधीनता सेनानी दोस्तों ने एक सरकारी स्कूल को जला डाला था। इसमें रवींद्र के पकड़े जाने की पूरी उम्मीद थी, इसलिए वो पुर्तगाली सरकार की निगाह से बचने के लिए भागकर मुंबई आ गए। यहां वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं और गांधीजी के संपर्क में आए। राम मनोहर लोहिया से उनकी पहली मुलाकात यहीं हुई और लोहिया से रवींद्र ने सीखा कि जनता को जगाने के लिए अपनी मातृभाष्ाा को माध्यम बनाकर कैसे लड़ा जा सकता है। गांधीजी के दर्शन से प्रभावित होकर वे मुंबई से काका साहेब कालेलकर के साथ वर्घा चल दिए। यहां सेवाग्राम में रहते हुए युवा रवींद्र ने काका साहेब से बहुत कुछ सीखा। काका साहेब को वे मोबाइल यूनिवर्सिटी कहते थे, जाहिर है ऎसे महान व्यक्तित्व के सान्निध्य में रवींद्र के व्यक्तित्व में बहुत कुछ जुड़ना था।
अध्ययन, मनन और जनसेवा के साथ एक पत्रिका का संपादन करते हुए रवींद्र केलकर ने छह साल वर्घा में गुजारे और 1949 में गांधी स्मारक संग्रहालय में लाइब्रेरियन के रूप में काम करने लगे। देश आजाद हो चुका था, लेकिन गोवा पर अभी भी पुर्तगाली आधिपत्य था। रवींद्र केलकर ने एक साल में ही दिल्ली की नौकरी छोड़ दी, उन्हें गोवा का मुक्ति संग्राम पुकार रहा था।
गोवा पहुंचकर उन्होंने गांधीवादी अहिंसक रास्ते से गोवा की मुक्ति के लिए संघष्ाü आरंभ किया। उन्होंने जन जागरण के लिए कलम को हथियार बना लिया और हिंदी, मराठी और कोंकणी में लेख लिखकर लोगों को गोवा की आजादी के लिए जगाने लगे। मुंबई से उन्होंने "गोमांतभारती" साप्ताहिक पत्रिका निकाली, जो रोमन लिपि में कोंकणी में प्रकाशित होती थी। 1961 में जब भारतीय सेना ने गोवा को आजाद करा लिया तो रवींद्र केलकर का संघष्ाü दूसरे रूप में आरंभ हुआ। कोंकणी भाष्ाा और सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने के लिए गोवा को महाराष्ट्र से अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए। कोंकणी को मराठी की आंचलिक भाष्ाा या बोली मानने का तर्क उन्हें स्वीकार नहीं था और इसी आधार पर वे गोवा को अलग राज्य का दर्जा दिलाना चाहते थे। उनके आंदोलन का ही परिणाम था कि भारत सरकार ने गोवा को महाराष्ट्र में शामिल करने के बजाय केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया। अब रवींद्र केलकर के लिए एक नया आंदोलन तैयार खड़ा था, कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का और गोवा को पूर्ण राज्य बनाने का। कोंकणी भाष्ाा के लिए उनका संघष्ाü और योगदान अप्रतिम है। 1962 में प्रकाशित उनकी "आमची भास कोंकणिच" अद्भुत पुस्तक है, जिसमें राह चलते लोगों से संवाद के माध्यम से वे कोंकणी भाष्ाा की अस्मिता के लिए आह्वान करते हैं। "शालेंत कोंकणी कित्याक" में उन्होंने कोंकणी का पूरा स्कूली पाठ्यक्रम बना दिया।
"कोंकणी साहित्य की ग्रंथसूची" को कोंकणी, हिंदी और कन्नड़ में पेश कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि कोंकणी का महत्व अब हर हाल में स्वीकारा जाना चाहिए। उनकी संघष्ाüशीलता को गोवा के लोगों ने अपूर्व सम्मान दिया और स्नेह से उन्हें सब रवींद्रबाबू पुकारने लगे। 1975 में साहित्य अकादमी ने कोंकणी को स्वतंत्र भाष्ाा के रूप में मान्यता दी तो कोंकणी के आत्मसम्मान को राष्ट्रीय तौर पर स्वीकारा गया। दो साल बाद उनके यात्रा संस्मरणों की पुस्तक "हिमालयांत" को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। 1987 में जब गोवा को पृथक राज्य घोçष्ात किया गया तो राज्य विधानसभा ने कोंकणी को राज्य की अधिकारिक भाष्ाा स्वीकार किया। 1990 में रवींद्रबाबू को दूसरी बार साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, इस बार गुजराती निबंधकार झवेरचंद मेघानी की पुस्तक का कोंकणी में अनुवाद करने के लिए। केलकर का संघष्ाü 1992 में फलीभूत हुआ जब कोंकणी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। कोंकणी, हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में रवींद्र केलकर की तीन दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हुई हैं। महात्मा बुद्ध, काका साहेब कालेलकर और महात्मा गांधी की जीवनियां तो बहुत ही दिलचस्प और पठनीय हैं। लेकिन कोंकणी में उन्होंने दो खण्डों में "महाभारत" का जो अनुवाद किया है वो अद्भुत है। एक तटस्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्होंने महाभारत के चमत्कारिक प्रसंगों से इतर महाभारत की जो "अनुरचना" की है, उसके सामने शायद नरेंद्र कोहली की "महासमर" कुछ भी नहीं है। 2007 में उन्हें जीवनपर्यंत साहित्य सेवा के लिए साहित्य अकादमी फैलोशिप प्रदान की गई। 2006 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार देने की घोषणा की गई जो उनकी अस्वस्थता के कारण उन्हें 2010 में दिया जा सका। इस अवसर पर उन्होंने अपने भाष्ाण में बहुत सी महत्वपूर्ण बातें कही थीं, जिनमें से एक बात बहुत ध्यान देने की है। उन्होंने कहा था, "लोगों ने आजकल क्षेत्रीय भाष्ााओं का साहित्य पढ़ना बंद कर दिया है। और दूसरी तरफ अंग्रेजी के माध्यम से हमने बोन्साई बुद्धिजीवी पैदा कर दिए हैं। बोन्साई लेखक और बोन्साई पाठक।" शोभा डे और चेतन भगत जैसे अंग्रेजीदां बोन्साई लेखक और बुद्धिजीवियों के लिए यह बात रवींद्र केलकर जैसा गांधीवादी, प्रखर योद्धा रचनाकार ही कह सकता था। ऎसे महान रचनाकार को शत -शत नमन, जिसने एक प्रांत और एक भाष्ाा को महान गरिमा और आत्मसम्मान दिया।
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