गहमागहमी चल रही थी। आज शिक्षक दिवस का मौका था। शिक्षक महोदय सभी के आर्कषण के केन्द्र थे। नाना प्रकार के चैनल्स इस मौके को कवर कर रहे थे। सभी शिक्षकों को देश के भविष्य का निर्माता बताते-बताते नहीं थक रहे थे। श्रीमान शिक्षक जी का इंटरव्यू चल रहा था। "तो शिक्षक महोदय, आप बताएं शिक्षक का भूतकाल में क्या उल्लेखनीय योगदान रहा?" "जी भूतकाल में शिक्षक ने जनगणना में अभूतपूर्व योगदान दिया। उसने निपुणता से आंकड़े इकटे किए।" "तो शिक्षक की वर्तमान उपलब्घि क्या रही?"
"जी, पहले तो वो चाइल्ड केअर प्रोग्राम की डयूटी में घर-घर गया। फिर डिजायर के लिए मंत्री जी के दरवाजे पर भटका।" "तो शिक्षक का भविष्य क्या है?"
"जी शिक्षक का भविष्य आर्थिक गणना करना है। अगर जाति के आधार पर गणना हुई तो उसे भी बखूबी करवाएगा।" "तो शिक्षक के ऊपर बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं? तो आगे वो क्या-क्या करेगा?"
"जी, उसके लिए बहुत कुछ बाकी है। वो प्रत्येक पोलियो ड्रॉप्स बच्चों के गले में उतारकर ही दम लेता है।" "जी, शिक्षक समाज को नई दिशा देता है। वो शहर में होने वाली रैलियों का सूत्रधार है। साक्षरता रैली का संचालन उसके हाथ में है तो नशामुक्ति रैली का झंडा भी वो ही पकड़ता है। जनसंख्या दिवस पर भी बेचारा सड़कों पर ही रहता है।" "और शिक्षक का लोकतंत्र से कोई संबंध है?"
"उसके बिना लोकतंत्र अधूरा है। वो ही देश के चुनावों को सम्पन्न कराता है। यदि वो नहीं हो तो देश में न जाने कैसे चुनाव हों।" "शिक्षक इतना सजग है तो फिर तो मां-बाप को बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। केवल खिलाया-पिलाया और बस...।" "आप कैसी बातें कर रहे हैं। शिक्षकों का मुख्य कार्य बच्चों को खाना बनाकर या बनवाकर खिलाना ही है। बच्चों के एक समय भोजन की जिम्मेदारी उसी के कंधे पर है। वो बच्चों को भांति-भांति की वैरायटी बनाकर खिलाता है। कभी दाल-बाटी तो कभी दलिया, चावल।" "आश्चर्य की बात है। मामूली बजट में बच्चों को खिला देता है।" "जी हां, साहब। बहुत मितव्ययी, बच्चों के साथ वो भी खा लेता है।"
"उसमें गजब की प्रतिभा है। वो बाबुओं में सर्वश्रेष्ठ बाबू है, क्योंकि सभी वेतन बिल वो ही बनाता है। रसोइयों में सर्वश्रेष्ठ रसोइया है, क्योंकि पोष्ााहार का चार्ज उसी के पास है, डाकियों में सर्वश्रेष्ठ डाकिया है क्योंकि वो डाकों को पहुंचाने का काम करता है। सर्वेयरों में सर्वश्रेष्ठ सर्वेयर है, क्योंकि साल भर वो नाना प्रकार के सर्वे सम्पन्न करता है। वह धनी है, क्योंकि वो चार टयूशन अतिरिक्त पढ़ाता है। उसकी महिमा का कोई ओर है न छोर।" सभी लोग शिक्षक महिमा के अद्भुत बखान से चमत्कृत हो गए। इतनी असाधारण प्रतिभा, विलक्षण व्यक्तित्व। सभी जय कर उठे।
जैसे मंदिर प्रांगण में कपूर सुगंधित होकर कण-कण में फैल जाता है। उसी तरह कॉन्फ्रेंस हॉल में शिक्षक महिमा के इस रूप से सब हतप्रभ थे। सभी नमन कर उठने की तैयारी कर ही रहे थे कि एक पत्रकार पूछ बैठा "माफ कीजिए एक अंतिम प्रश्न और कर रहा हूं।" वे संभल गए, "कहिए।" "जी, आपने विद्यार्थिंयों को अध्ययन कराने के संबंध में तो कुछ कहा ही नहीं।" वे मौन हो गए। उनके चेहरे पर असमंजस के भाव थे।
सभी पत्रकार बोल उठे। तो उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ी।,"जी, अब मैं क्या कहूं। शिक्षक को इतने काम के बाद पढ़ाने का समय ही कहां मिलता है। कबीरदास जी कह गए हैं, जिस तरह तालाब के पानी के बीच रहकर भी कमल की पत्तियों को जल छू नहीं पाता, वैसे ही शैैक्षणिक महासागर में रहने के बाद भी वो शिक्षा रूपी जल से दूर ही रहता है। केवल पढ़ाने के कार्य को छोड़कर वो सभी कर्तव्यों का पालन भली-भांति कर रहा है।" शिक्षक की महिमा सुन हॉल तालियों से गूंज उठा। सभी लोग पुन: कह उठे। "जय हो," और फिर इसके अलावा उनके पास कुछ कहने को था भी नहीं।
शरद उपाध्याय
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