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Tuesday, 07 February, 2012
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पढ़ना आगे बढ़ना दोस्त मिलकर
Sunday, September 05, 2010, 10:42 hrs IST
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वो जमाना गुजर गया जब शिक्षक और शिष्य का संबध पैर छूकर ही शिक्षा लेने का था, अब तो बदलाव हो रहा है और ऎसा होना ठीक भी है कि दोनों के बीच दोस्ताना हो, ज्यादा से ज्यादा सीनियर जूनियर या फिर बडे भाई और छोटे भाई या दीदी और छोटी बहन का सा रिश्ता हो, और इसमें बुराई भी क्या है! आखिर मकसद तो नई पीढ़ी को जिंदगी की चुनौतियों के लिए तैयार करना ही तो है...

चौथाई सदी गुजर गई होगी अब तो...जब मैं तीसरी-चौथी क्लास का स्टूडेंट रहा होऊंगा... जाड़े की एक थराथराती सुबह, कोहरे से दो-दो हाथ करते हुए जैसे ही प्राइमरी स्कूल के भुतहा लगने वाले कमरे में पहुंचा, बिना किसी दुआ-सलाम, हाल-चाल के हाथ पर फटाक से स्केल बज गई...बड़े हीरो बने घूम रहे हो, होमवर्क करके नहीं लाए हो ना...। ये थे घिर्राऊलाल...। नाम तो कुछ और ही होगा, लेकिन बच्चों को घसीट-घसीटकर (अवधी में घिर्राकर) पीटते थे, इसलिए उन्हें अपन सब के सब घिर्राऊलाल ही कहने लगे थे... और इसके बारह साल बाद... बीए में सचमुच छैलाबाबू बनने के समय, एक दिन जब एक्स्टेंपोर कंपीटीशन में जबान लड़खड़ा गई, पांव कांपने लगे, अल्फाज दिमाग का साथ छोड़, हाथ छुड़ाकर भाग निकले, तो सामने से बस एक मुस्कान तैरती हुई आई और सारा काम बन गया...ये मुस्कराहट थी शैलेंद्र संभव की... हिंदी टीचर... खैर, जब शील्ड को माशूका की तरह सीने से लगाए हॉल से बाहर निकला, तो मिठास से सना एक ही वाक्य कानों तक पहुंचा... ये हुई ना बात! डरते क्यों हो मेरे मिट्टी के शेर...। मस्त रहा करो।

अब मैं कोई सेलिब्रिटी नहीं, ना ही मेरे ये दोनों गुरूजी किसी भी पkश्री, श्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित गुरू कम नेता हैं, जो आप ये दास्तान और सुनना चाहें..., लेकिन मेरे जैसे लद्धड़ (बोले तो कमजोर) और घिर्राऊ मार्का शिष्य व शैलेंद्र जैसे ममतामयी शिक्षक पूरी हिंदी पट्टी के शैक्षणिक जगत के ज्यादातर चेला-गुरू परंपरा के प्रतीक हैं..., यानी एक नुकीले पत्थर की तरह जोर-जबर में यकीन करने वाला, तो दूसरा-मिसरी घोलकर शिष्य को सही राह पर ले जाने वाला...।

यूं, ये सवाल उठ सकता है कि गुरू की याद पांच सितंबर को ही क्यों आती है? पूरे साल क्या इनकी जरूरत नहीं होती, मन में, दिमाग के किसी कोने में मास्टरजी की इमेज क्यों फ्लैश नहीं होती? सो दिन विशेष पर ही किसी की बात क्यों हो, पूरे समय उनकी महानता-काम की चर्चा क्यों ना की जाए, ये बड़ी बहस का मुद्दा है और फिलहाल, इसमें ना फंसते हुए मैं तो यही कहूंगा गुरू, तभी राह दिखा पाते हैं, जब वो बड़े भाई जैसे भरोसेमंद और मजबूत हों...ऎसे गुरू अंधकार से बाहर नहीं निकाल पाते, जो गुरू घंटाल होते हैं, ना ही ऎसे मास्टर साहब, कोई राह दिखा पाते हैं, जो बस नाजुक दोस्त की तरह हां में हां मिलाते हैं...।

सो आप कहेंगे, मटुक छाप गुरू क्या हैं? और वो शाहरूख की कौन-सी फिल्म थी, शायद-"मैं हूं ना", जिसमें वो साहब सुष से लव-लेर सुनना चाहते हैं...तो ऎसों के बारे में फि ल्मियाना अंदाज में ही डॉयलॉग सुना दें- ये सब गुरू जैसे पेशे पर धब्बा ही हैं, लेकिन इतने से तो हल निकलने वाला नहीं है। फिर कहें क्या...समझें क्या...। समझने वाली बात ये है कि जैसा समाज है, लोग हैं, रिश्तों का उलझाव है, वैसे ही आजकल के गुरू भी हो गए हैं।

वैसे भी, मास्टरी सबसे सुविधाजनक पेशा मान लिया गया है, जहां रहकर कोचिंग, ट्यूशन, छुियां जैसी सौगात आसानी से हासिल की जा सकती है, वहीं जब चाहें तब राजनीति करने निकल पड़ें। यकीन नहीं होता, तो देश के कई बड़े नेताओं को देख लीजिए...जो अध्यापक थे, या फिर अब भी हैं... लेकिन आराम से एमएलए, एमपी बन रहे हैं।

...अब उठता है बड़ा सवाल...हमें ऎसे ही गुरू चाहिए थे, जो टीचिंग जैसे नोबेल प्रोफेशन को अपनी कुंठाएं शांत करने, ख्वाहिशें परवान चढ़ाने में इस्तेमाल करें? ऎसे में प्रतिप्रश्न भी खड़ा होगा-क्या ऎसे ही स्टूडेंट होते हैं, जो अपनी अध्यापिका को प्रपोज करने का मौका भी नहीं छोड़ते। सवाल बहुत हैं, कन्फ्यूजन भी हजार हैं, लेकिन इन सबका जवाब वही है- हर पेशा और पेशेवर समाज के उलझाव से अछूता नहीं है और उसका असर ही अध्यापन जैसे पेशे पर भी दिख रहा है...। और हल-वही, गुरू बड़े भाई जैसा ही हो।

हिंदी साहित्य में हाल ही जिन नौजवानों ने खासा हस्तक्षेप किया है, उनमें विनीत कुमार का नाम खास है, तो लगे हाथ उनकी बात सुन लेते हैं। चर्चित ब्लॉगर विनीत कुमार किसी एफएम चैनल पर दिन भर चली एक बकवास का हवाला देते हुए अपने ब्लॉग पर निजी स्कूल की अध्यापक का तजर्बा साझा करते हैं- बच्चे कैसे पहले से कई गुना स्मार्ट हो गए हैं, ऎसे बहाने बनाते हैं कि आप चाहेंगे कि आपको भी ऎसे ही बच्चे मिलें...। बीते बरस के शिक्षक दिवस पर विनीत को निजी रेडियो ने ऎसा-ऎसा धमाल सुनाया कि उन्हें जान तेरे नाम का गाना...माना कि कॉलेज में पढ़ना चाहिए...रोमांस का भी एक लेर होना चाहिए, याद आ गया...। बात बस विनीत की ही नहीं, जो बताते हैं कि आजकल बच्चे (यानी हर उम्र के छात्र-छात्राएं) कुछ ज्यादा ही मुखर हो गए हैं। वो गुरूजी को एक सिम्पैथी बॉक्स की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं, हर युवा के दिमाग में ये सवाल पनपने लगा है कि प्राइमरी से स्कूल और फिर कॉलेज तक जाते हुए गुरू का रंग-रूप-चेहरा किस कदर बदले, कितना बदले और ये रिश्ता कैसे परवान चढ़े... कैसा हो?

गुजरे साल दस्तक के 41वें अंक में राजेश्वरी की एक कविता छपी थी- शिक्षक! मेरे बच्चे को रट्टू तोता मत बनाना / उसे अक्षर बताना / शिक्षक! मेरे बच्चे को लूट की तरकीब मत बताना... आज वो बहुत याद आ रही है क्योंकि ये कविता नहीं, चिंता है, हर पिता-मां की, जो स्कूल-कॉलेज में अध्यापन के गिरते स्तर और शिक्षक-स्टूडेंट संबंधों के उलझाव में उलझा है।

आइए, इसी सिलसिले में कुछ खबरों पर नजर डाल लेते हैं...
मोहाली के नया गांव में 10 साल की एक लड़की के यौन शोषण के आरोप में स्कूल का वाइस प्रिंसिपल गिरफ्तार।
गुस्साई भीड़ ने भांडुप के किंग जार्ज हिल्स स्कूल के आरोपी अंग्रेजी अध्यापक की पिटाई की, शिक्षक ने छात्राओं के अश्लील एमएमएस बनाए थे...
धर्मनगरी कुरूक्षेत्र में छात्राओं के साथ शिक्षकों ने छेड़छाड़ की
और हां...कुछ आंकड़े भी देखने की जरूत है...
19 फीसदी प्राइमरी स्कूलों में केवल एक अध्यापक है।
10 फीसदी प्राइमरी स्कूलों में ब्लैक बोर्ड नहीं है।
25 फीसदी प्राइमरी स्कूल अध्यापक अपने काम से गैरहाजिर रहते हैं।
हो सकता है, पाठक कहें कि बात तो रिश्तों की हो रही थी, जो आमतौर पर स्कूल (यानी हाईस्कूल) और कॉलेज में (ग्रेजुएशन, पीजी) के दौरान पनपते-बढ़ते हैं, फिर प्राइमरी पढ़ाई के समय हुए क्राइम की बात क्यों, उसके आंकड़े क्यों...इन पर नजर डालना इसलिए जरूरी है...क्योंकि शुरूआती स्तर पर जो विचलन शुरू होता है, वही पूरे परिदृश्य पर असर डालता है।

सरकार की महत्वाकांक्षी योजना शिक्षामित्र पर ग्रहण-सा लग चुका है। गांवों के पंच-सरपंचों के रिश्तेदार इस योजना में ऎसे टीचर बन रहे हैं, जिन्हें स्कूल जाने की जरूरत नहीं, इच्छा नहीं है। ऎसे ही देश के हजारों गांवों-कस्बों में अब भी दलित गुरू को उचित सम्मान नहीं मिलता। उत्तरप्रदेश के बहुतेरे स्कूलों में मुख्यमंत्री मायावती की उस योजना के परखचे उड़ा दिए गए हैं, जिसमें वो दलित महिला के हाथों का पकाया भोजन मिड डे मील में परोसने की ताकीद कर चुकी हैं।

हमारा मंसूबा, मंतव्य और इरादा ये नहीं कि राजनीतिक-सामाजिक छुआछूत और समीकरणों की व्याख्या करें, लेकिन समस्या की जड़ें तलाशनी तो जरूरी हैं। अगर शिक्षक स्वार्थी, अपराधी और आलसी नजर आ रहे हैं, तो क्या इसकी सारी वजह उनका अवसर-पसंद, अवसरवादी होना है? बेशक नहीं!
ढर्रे पर थमी, रटी-रटाई, नोट्स बनाने, पर्चियां तैयार करने और कॉपी में कट-पेस्ट कर ज्ञान-वमन करने की पद्धति पर चर्चित लेखक महेश पुनेठा एक लेख में सवाल खड़ा करते हैं-स्कूलों को सृजनशीलता की कब्रगाह तो नहीं बना रहे हैं? हालांकि वो भी मानते हैं कि आज के माहौल में ना शिक्षक के लिए सृजनशील होने की परिस्थितियां हैं और ना बच्चों के लिए, पुनेठा का तर्क भी वही है कि बाजारवादी व्यवस्था मनुष्यों के पृथरण और अमानुषीकरण के जरिए उनकी सृजनात्मक शक्तियों को कुंठित कर रही है।

डरा-धमकाकर जिस स्कूली शिक्षा की नींव बच्चे के कोमल मन पर पड़ती है, वो कॉलेज तक पहुंचते हुए अगर शिक्षक को भी काहिल और अवसरवादी या फिर प्रेमी-प्रेमिका समझने, मानने की समझदारी पैदा कर दे, तो इसमें किसका दोष कहेंगे? शिक्षक मटुकनाथ जैसे होने लगें? छात्राओं का एमएमएस बनाने लगें, तो क्या पढ़ाने के पेशे पर ही सवाल खड़े कर दिए जाएं? साफतौर पर ये बात माननी होगी कि बहुत-से शिक्षक अब गुरू नहीं रहे...लेकिन उन्हें ऎसा बनने-बनाने की प्रेरणा और फोर्स तरी-पसंदगी के नाम पर भटके हुए समाज से ही मिल रही है। उन अभिभावकों की भी कम गलती नहीं, जो अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर रट्टू तोता बनाकर, इंजीनियर और डॉक्टर की शक्ल में ढाल देना चाहते हैं। ऎसे ही कुछ पुराने लोगों का भी कम योगदान नहीं, जो शिक्षक रहते हुए बाकी सब कुछ बन गए, भले ही टीचर नहीं रहे। शिक्षकों को दोष देते हुए हम ये क्यों भुला देते हैं कि हम बच्चों को मास्टर बनने की प्रेरणा नहीं देते।

ये सब कुछ जानने के बाद समझना मुश्किल नहीं कि टीचर के बारे में सोचते वक्त स्टूडेंट के चेहरे पर मुस्कान कम क्यों उभरती है, खीझ या फिर किसी और किस्म की लालसा ही जगह क्यों पाती है? बच्चे भी जानते हैं, ये गुरू भगवान वाली किस्म के नहीं हैं और अध्यापक भी समझ चुके हैं कि बात उतनी सीधी-सादी और गौरवमयी नहीं रही, जितनी पुराने जमाने में थी।

इन हालात में शिक्षक दिवस मनाने का भी तभी मतलब निकलेगा, जब टीचर अपने पेशे की जिम्मेदारियां समझें, छात्र उनका यथोचित सम्मान करें, समाज भी समझे कि गुरू पेड सरकारी नौकर भर नहीं है...और गुरू बदलते वक्त की जरूरत के मद्देनजर छात्र-छात्राओं के साथ दोस्त जैसा नहीं, पर बड़े भाई या दीदी जैसा व्यवहार जरूर करें।
लेखक टीवी पत्रकार हैं

चण्डीदत्त शुक्ल
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