15वां विश्व संस्कृत सम्मेलन 5 से 10 जनवरी तक दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित हुआ। 1972 में भारत में पहली बार जब विश्व संस्कृत सम्मेलन का आयोजन हुआ था तो दबी जुबान से उस समय यह भी पूछा गया था कि क्या संस्कृत के पास इतने लोग बचेंगे हैं कि यह सम्मेलन 10-20 वर्षो बाद भी आयोजित हो सकेगा?
पर तब से आज तक न केवल भारत बल्कि जापान, अमेरिका और जर्मनी जैसे अनेक देशों के साथ ही यह समेलन पूरी गरिमा के साथ 15 बार आयोजित हो चुका है। इस बार के सम्मेलन में 5 जनवरी की सुबह उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने "संस्कृत भारत की आत्मा है" कहा तो जैसे सारा सभागार मन और तन की तालियों से गूंज उठा।
संस्कृत को लेकर किए जा रहे कामों में ओर तेजी एवं अभिरूचि को बढ़ाने के आग्रह के साथ ही मनमोहन सिंह ने समाज को संस्कृत के लिए आगे आने को कहा। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की ओर से आयोजित इस सम्मेलन की खासियत यह रही कि इसमें संस्कृत की मूल धारा में यकीन रखने वाले हजारों लोग देश के कोने-कोने से अपने खर्चे पर पहुंचे।
भारत के 1200 संस्कृतज्ञों के साथ ही भारत से बाहर के 200 से ज्यादा विदेशी विद्वान भी संस्कृत को विश्व भाषा बनाने के भविष्यकालीन स्वप्न के साथ अपनी धुन संस्कृत से मिलाने यहां पहुंचे। अमेरिका के जॉर्ज कॉर्डोना, इटली से आए फिलीयोना एवं नीदरलैंड के हूबेन तो संस्कृत को ही जी रहे हैं और उसे ही विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लक्ष्य को सिद्ध करने में लगे हैं।
बहुत से विष्ायों को समेटे इस सम्मेलन में 100 से भी अधिक संस्कृत ग्रंथों का लोकार्पण हुआ। संस्कृत विद्वानों के साथ ही रचनात्मक कार्यकर्ताओं के अलावा सम्मेलन में उन लोगों के लिए भी दरवाजे खुले थे, जो संस्कृत को बिना जाने-पढ़े भी उसको अपनाना चाहते हैं। सम्मेलन संस्कृत के साथ ही उसकी वैश्विक स्थिति पर विचार का सबसे बड़ा केंद्र रहा।
विचार मंथन के अलावा संस्कृत की क्रांति फैलाने का काम शायद ही इस सम्मेलन से बेहतर कोई करता होगा। 15वें विश्व संस्कृत सम्मेलन के इतने बेहतर होने के बाद भी कुछ कसक लोगों के मन में थी, जो उनके चेहरे से झलकती एवं जुबान से फिसलती नजर आ रही थी कि क्यों न इसमें संस्कृत पत्रकारिता को भी जोड़ा जाता? सम्मेलन के संयोजक प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी इस सम्मेलन को अनंत संभावनाओं की एक परंपरा ही मानते हैं। सम्मेलन में घोष्ाणा हुई कि 16 वां विश्व संस्कृत सम्मेलन बैंकॉक में 2015 ई. में होगा। हलचल शास्त्री कोसलेन्द्रदास
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