खिलाड़ी, एतराज, हमराज, रेस जैसी सुपरहिट फिल्में देने के बाद सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों के लिए चर्चित निर्देशक जोड़ी अब्बास-मस्तान अब अपनी अगली फिल्म प्लेयर्स के साथ आ रहे हैं। इसी फिल्म को लेकर हाल ही उनसे बातचीत हुई। इस बातचीत में उभरती है प्लेयर्स की सच्ची तस्वीर...
ज्यादातर आपको मल्टीस्टारर फिल्में बनाते हुए ही देखा जाता है, क्यों? लोग कहानियां ही ऎसी लेकर आते हैं, तो उसमें क्या करें और वैसी ही कहानियां हमें पसंद भी आती हैं।
इतने सारे कलाकारों के साथ एक ही फिल्म में काम करने में परेशानी आती है कभी? ज्यादा कलाकारों के साथ शूट करने में थोड़ी परेशानी तो आती ही है। हमारी फिल्म प्लेयर्स में भी बहुत सारे कलाकार हैं और उसमें भी हमें बहुत परेशानी हुई।
प्लेयर्स जल्द ही पर्दे पर आने वाली है, फिल्म के बारे में कुछ बताएं? प्लेयर्स काफी रोमांचक फिल्म है। बहुत से टि्वस्ट एंड टर्न है। दर्शकों को अंत तक अपने सीट से बांधकर रखेगी। ये फिल्म हमने हॉलीवुड की फिल्म द इटैलियन जॉब से प्रेरित होकर बनाई है। आशा है कि दर्शकों को पसंद आएगी, क्योंकि भारतीय सोच को उसके सांचे में ढाला गया है।
आपकी ज्यादातर फिल्में हॉलीवुड से प्रभावित होती हैं और आप बाकी निर्देशकों की तरह इसे खुलेआम मानने से झुठलाते भी नहीं है? इसमें मानने वाली कोई बात ही नहीं है। असल में हमें शुरूआत में कहानी सुनते वक्त खुद भी पता नहीं होता है कि ये किसी हॉलीवुड फिल्म से प्रभावित है। काम करना शुरू कर देते हैं, तो पता चलता है और फिर बताना पड़ता है। देर-सबेर पता तो चल ही जाएगा, फिर छिपाना क्यों।
आप हमेशा एक्शन, सस्पेंस और थ्रिलर फिल्में ही क्यों बनाते हैं? बचपन से हम काफी फिल्में देखा करते थे। कुछ फिल्में ऎसी होती थीं, जिसे बार-बार देखना पसंद करते थे। सस्पेंस थ्रिलर वाली फिल्में अच्छी लगती थीं। उबाऊ नहीं लगती थीं। वही चीज ध्यान में रखते हुए हमने ऎसी फिल्में बनानी शुरू की और लोगों ने काफी सराहा भी। इन फिल्मों में अच्छे गाने होते हैं, एंटरटेनमेंट भी भरा होता है। चलती का नाम गाड़ी, तीसरी मंजिल या जॉनी मेरा नाम जैसी हिंदी की कई ऎसी फिल्में बनी हैं, जो आज भी देखी जाती हैं।
हर बार एक ही तरह की फिल्म में अलग-अलग कंसेप्ट लाना मुश्किल नहीं होता? हर बार थ्रिलर में नया कंसेप्ट या कहानी लाना बेहद मुश्किल होता है। हमारे पास बहुत-सी कहानियां आती हैं। हम जब उन कहानियों को सुनते हैं, तो दर्शक बनकर, ना कि निर्देशक बनकर। उससे हमें पता चलता है कि लोगों को ये कहानी कितनी रोमांचित करेगी, फिर उस पर हम काम करना शुरू करते हैं। हमारी कोशिश रहती है कि ऎसी फिल्म बनाएं, जिससे हम सभी प्रकार के लोगों से जुड़ सकें।
सोनम पर फिल्माया एक सीन को लेकर जहां वो मिडिल फिंगर दिखाती हैं, उस पर सेंसर बोर्ड कुछ विवाद खड़ा कर रहा है? सेंसर बोर्ड ने खुद उस सीन को मंजूरी दी है और उसमें कोई खराबी नहीं है। उस सीन के पीछे एक वजह है, वो सिचुएशनल है।
आप दोनों ने कई कलाकारों के साथ काम किया है और आपकी हर फिल्म में एक नया लुक और इमेज देखते हैं? जी! अब जैसे प्लेयर्स में सोनम का रोल भी काफी अलग है। उसे इस रूप में पहले कभी नहीं देखा गया होगा। ग्लैमरस लुक दिया है और उन्होंने अपने स्टंट्स भी खुद ही किए हैं। अभिषेक का भी किरदार बढिया है। उसने चार साल बाद कोई मेनस्ट्रीम फिल्म की है। शूट हुआ, तो अभिषेक ने खुद बोला कि इतने सालों बाद नाचकर उसे बहुत मजा आया। उसने भी काफी रिस्की एक्शन किए हैं फिल्म में। उसका स्टाइल भी बेहतरीन है।
कास्टिंग करते वक्त क्या ध्यान में रखते हैं? हम स्क्रिप्ट के मुताबिक जाते हैं। लगता है कि कोई कलाकार इस किरदार को निभा सकेगा, तो उसे लेते हैं। अब जैसे बाजीगर में शाहरूख न्यूकमर था, फिर भी हमें लगा कि वो इस किरदार को निभा पाएगा। खिलाड़ी में अक्षय का अभिनय भी बेहद पसंद किया गया, जबकि उसके पहले उनकी फिल्में ज्यादा काम नहीं कर पाई थीं, पर हमें एक विश्वास था उन पर।
आप दोनों भाईयों के बीच कभी क्रिएटिव सोच का फर्क नहीं आता है क्या? हमारे बीच भी सोच में अंतर आता है, लेकिन हम एक साथ बैठकर उसे सुलझा लेते हैं।
आप लोग शुरू से ही सिर्फ और सिर्फ सफेद कपड़ों में दिखाई पड़े, क्या वजह है इसकी? इसकी कोई खास वजह नहीं है। जब हम दोनों निर्देशक नहीं बने थे, उसके पहले से ही सफेद कपड़े ही पहनते आ रहे हैं, क्योंकि हमें पसंद है। आराम मिलता है, पर पहली बार शूटिंग के दौरान नॉर्थ पोल में सर्दी की वजह से हमने काला जैकेट पहना, वो भी अभिषेक ने दिया था हमें।
जॉनी लीवर आपकी हर फिल्म में दिखाई पड़ते हैं, लकी मैस्कॉट हैं? पता नहीं, लेकिन हम अपनी हर फिल्म में चाहते हैं कि जॉनी भाई हमारे साथ काम करें।
-मीनल आनंद
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