एक वक्त था, जब हर हिंदी फिल्म मुख्य कथा सूत्र के साथ साथ एक हास्य कथा भी चलती थी। फिल्म में हास्य कथा होना जरूरी मानने की वजह से हास्य कलाकारों को खास महत्व दिया जाता था। जो हास्य कलाकार अपनी कुछ विभिन्न श्ौली बना सके, उन्हें तथाकथित सामाजिक फिल्मों में तो मान मिला ही, साथ ही उन्हें प्रमुख भूमिका में लेकर छोटे बजट की फिल्में भी बनीं।
पारिश्रमिक पुरस्कार, प्रचार और प्रसिद्धी हर दृष्टि से कई हास्य कलाकार अनेक नायकों से भी कहीं आगे रहे। ऎसे ही हास्य कलाकारों में एक थे भगवान। आज वे नहीं हैं, मगर उनकी मोहक और मनोरंजक अदाएं दर्शकों के दिलों में आज भी जिंदा हैं। यहां पेश हैं हास्य फिल्मों और हास्य कलाकारों पर भगवान के कुछ खास विचार जो उन्होंने 80 के दशक में एक साक्षात्कार के दौरान व्यक्त किए थे।
एक जमाना था, जब फिल्मों को सिर्फ व्यवसाय के रूप में नहीं लिया जाता था। न्यू थिएटर्स, बॉम्बे टॉकिज, फिल्मिस्तान वगैरह ऎसे बैनर थे, जो उद्देश्यपूर्ण फिल्में बनाते थे। उन दिनों हास्य कलाकारों को, जो महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी जाती थीं वह सिर्फ दर्शकों को हंसाने के लिए नहीं, उनका अपना महत्व होता था। वे भूमिकाएं दर्शकों का मनोरंजन करने में भी कामयाब होती थीं और दर्शकों पर थोपी हुई भी नहीं लगती थीं। एक समय ऎसा भी आया, जब हीरो और कॉमेडियन साथ-साथ चलने लगे।
दोनों को एक ही फिल्म में समान महत्व की भूमिकाएं मिलने लगीें। इस दौर में जॉनी वाकर भी थे और महमूद भी। जॉनी वाकर, महमूद और जगदीप जैसे कलाकारों का अपना एक दर्शक वर्ग तैयार हो गया। देखते ही देखते कॉमेडियन हीरो से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया। दौर कुछ ऎसा चला कि कई बार हीरो की डेट्स नहीं मिलने पर हीरो का दृश्य भी कॉमेडियन ही करने लग गए। इससे हीरो नाराज हो गए, स्वाभाविक भी था। हीरो ने ऎसे कॉमेडियन के साथ काम करने से इनकार करना शुरू कर दिया। परिणाम स्वरूप हीरो और कॉमेडियन के स्थान पर दो हीरो एक साथ आने लगे। इस दौर में कॉमेडियन ने अधिक उत्साह में ओवर एçक्ंटग करनी शुरू कर दी, जिससे दर्शकों का साथ मिलना भी बंद हो गया। इस तरह हास्य कलाकारों का युग प्राय: समाप्त हो गया।
अब शुरू हुआ प्रपोजल फिल्मों का बनना। नई फिल्मों में दो या अधिक हीरो को लेना था। लिहाजा हीरो प्रधान फिल्में लिखी जाने लगीं। रोमांस, मारामारी, कॉमेडी सभी कुछ हीरो करने लगे। इस तरह की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट हो गई। फिर आ गया हीरो प्रधान फिल्मों का जमाना। आजकल फिल्में कहां बनती हैं, आजकल तो प्रपोजल बनते हैं। प्रपोजल का उद्देश्य होता है पैसा कमाना।
बड़े-बड़े हीरो और हीरोइनों को साइन करते ही फिल्म बनाने के लिए पैसा मिल जाता है। एक हीरो और एक कॉमेडियन को साइन करने से फिल्म के लिए जितना पैसा मिलेगा, उससे कहीं ज्यादा पैसा मिलेगा दो नामांकित हीरो को साइन करने से। इस तरह आर्थिक लाभ के लिए कॉमेडियन का महत्व कम कर दिया जाता है।
आजकल की फिल्में तो एक पुलाव की तरह हैं, जिसमें बादाम पिस्ता हीरो और हीरोइन हैं। इस पुलाव में अलग-अलग मसाले डाले जाते हैं, जिसमें से एक मसाला है हास्य कलाकार। इससे ज्यादा वह कुछ नहीं रह गया है।
-टी. खत्री
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