नगमों का बरसता हुआ बादल नहीं आया मौसिकी के माहिर तो बहुत आए हैं लेकिन दुनिया में कोई दूसरा सहगल नहीं आया। यह बात भारतीय सिनेमा के महान गायक और अभिनेता स्व. कुंदनलाल सहगल के बारे में संगीत-सम्राट नौशाद ने कही थी। सहगल अपने समय के सुपर-स्टार थे, बावजूद इसके उनमें रत्तीभर का भी अभिमान नहीं था। वे एक सीधे-सादे और भले मानुष्ा थे, जो हर किसी का गम बाटने के लिए सदा तैयार रहते थे। उनके होठों पर गीत और दिल में दर्द विराजता था। यहां पेश है इस लाजबाव विभूति के निजी जीवन के कुछ खास प्रेरक प्रसंग...
जब लड़की को साड़ी भेंट की... घटना उस समय की है, जब कुंदन लाल सहगल फिल्म लाइन में नहीं आए थे और फेरी लगाकर साडियां बेचा करते थे। वे जितनी साडियां बेचते, उस हिसाब से उन्हें कमीशन मिलता। तेरह-चौदह साल की एक लड़की रोज उन्हें रोकती और एक खास साड़ी का दाम उनसे पूछती। इसी तरह कई दिन बीत गए, आखिर एक दिन सहगल ने उससे पूछा, क्या बात है? रोज तुम एक ही साड़ी की कीमत पूछती हो, लेकिन खरीदती कभी नहीं।
यह सुनकर उस लड़की की आंखें भर आइंü, उसने कहा, "मुझे यह साड़ी बहुत पसंद है, पर हम गरीब हैं, 15 रूपए की साड़ी कभी नहीं खरीद सकते। उस जमाने में 15 रूपए बहुत मायने रखते थे, लेकिन सहगल से उस लड़की की व्यथा देखी नहीं गई। उन्होंने वह साड़ी उसे थमा दी और व्यापारी को अपनी कमाई में से 15 रूपए भर दिए। वह दिन उनके उस काम का आखिरी दिन था। वे खुद मुसीबतकादा थे उन दिनों, मगर उनकी भावना जिंदा थी।
जब उस्ताद लगे सीखने... संगीत में कुंदन लाल सहगल का कोई गुरू न था, उन्होंने जो भी सीखा, स्वयं सीखा। एक बार लोगों ने जिद की कि सहगल किसी उस्ताद से शास्त्रीय संगीत सीख लें, वे मान गए। एक बड़े ही नामी उस्ताद को लाया गया। तय हुआ कि उस्ताद रोज एक घंटा उन्हें सिखाया करेंगे, मगर बाद में यह देखकर लोग ताज्जुब में पड़ गए कि सहगल उन उस्ताद को "राधे रानी दे डारो ना बांसुरी मोरी..." गीत सिखा रहे हैं। उस्ताद सिखाने आए थे उल्टे सीखने लगे। शायद सहगल किसी देव लोक के गंधर्व थे, जिन्हें किसी श्राप के कारण धरती पर आना पड़ा था।
जब प्रिंस का प्रस्ताव ठुकराया... कुंदनलाल सहगल स्वाभिमानी थे, साथ ही मूडी भी। एक दफा की बात ह,ै एक प्रिंस ने उन्हें बुलाया और राजसी रोब में कहा कि तू फलां गाना मुझे सुना। बेकार का यह रोब स्वाभिमान पर चोट कर गया और उन्होंने गाने से मना कर दिया। कहा, "मैं नहीं गाऊंगा"। अब तो सब परेशान कि भला यह भी कोई बात हुई। लोगों ने सहगल साहब को मनाने की बहुत कोशिश की, पर बेकार। वहां से लौटते समय सहगल ने देखा कि एक धोबी के घर में हो-हल्ला हो रहा है। लोग मौज-मस्ती में हैं। पता चला कि उस धोबी के लड़के की शादी है। फिर क्या था "सहगल बिन बुलाए ही उस शादी में शामिल हो गए और वहां खूब जमकर गाया।" यह थी उस कलाकार की महानता।
जब वेश्या-गुरू का ऋण चुकाया... कुंदनलाल सहगल की उस्ताद एक वेश्या थी, उसकी मौत पर उन्होंने कंधा देकर गुरू-ऋण से मुक्ति पाई थी। बात उस समय की है, जब सहगल प्रसिद्धी के शिखर पर पहुंच गए थे और कोलकाता में रहते थे। बरसात की एक रात वह भीगते हुए पैदल घूम रहे थे कि उन्हें एक कर्णप्रिय आवाज सुनाई दी, "तपिश मोरे मन की कौन बुझाए..." गाने वाली बीच-बीच में खांसती भी जाती थी। बे ऊपर पहुंचे, देखा वही बचपन वाली वेश्या गायिका है, लाहौर वाली। जिसके गीत सुनकर वह गायन की ओर आकृष्ट हुए थे। उन्होंने अपनी वेश्या-गुरू के पैर छुए और इलाज के लिए दो हजार रूपए उसके चरणों पर रखकर चले आए। जब उसे पता चला कि आगन्तुक स्वर सम्राट सहगल थे, तो वह खुशी से रो पड़ी। उसके मरने पर सहगल ने उसके जनाजे को कंधा देकर असीम गुरू-भक्ति का परिचय दिया और बार-बार रोए।
जब दोस्त की पार्टी में जमकर गाया... एक बार अभिनेता मोतीलाल ने अपने बंगले पर अपने जन्मदिन की पार्टी दी। मोतीलाल और कुंदनलाल सहगल दो शरीर एक जान थे। उन दिनों सहगल बहुत बीमार थे, इसलिए मोतीलाल ने उन्हें नहीं बुलाया। जब सहगल को इस बात का पता चला, तो फौरन बिस्तर से उतर पड़े और ड्राइवर से गाड़ी लाने को कहा। सबने उन्हें बहुत रोका, मगर वह नहीं मानें। कहा, "मेरे यार का जन्मदिन है और मैं ना जाऊं ..." मोतीलाल ने लपककर सहगल को गले लगा लिया। दोनों की आंखें भर आई। सहगल ने मोतीलाल को उलाहना देते हुए कहा, "अरे जालिम अभी तो मैं जिंदा हूं, मुझे बुला लिया होता"। मोतीलाल बोले, "तुम्हारे स्वास्थ्य को देखते हुए मैंने तुम्हें बुलाना ठीक नहीं समझा।"
गोली मार स्वास्थ्य को...सहगल ने झुंझलाते हुए कहा, मैं ठीक हूं। जरा तानपुरा लाओ, आज मेरे यार का जन्मदिन है, मैं गाऊंगा। सबने मना किया, मगर वह नहीं मानें और सुबह के चार बजे तक गाते रहे... बीच-बीच में खांसते भी जाते। जब कभी मोतीलाल उनकी नव्का देखने लगते, तो फौरन वे अपना हाथ छुड़ा लेते। वाकई, सहगल यारों के यार थे।
-ठाुकरदास खत्री
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