एक शख्स में कई शख्सियत- बुद्धिजीवी संगीतकार, उत्कृष्ट गायक, संवेदनशील कवि, अभिनेता, लेखक, निर्देशक, समाज सेवक और न जाने कितने रूप और इन तमाम रूपों का केवल एक नाम "डॉक्टर भूपेन हजारिका"। पांच नवंबर को दूसरी दुनिया की ओर कूच कर गए भूपेन दा का नाम हिंदी सिने जगत में लोक संगीत के लिए शीष्ाü पर रहेगा। उन्होंने अपने संगीत के जरिए असम की मिट्टी की जो सोंधी खुशबू कायनात में घोली थी, उसकी महक सालों साल बरकरार रहेगी।
च नवम्बर की शाम को मंुबई के कोकिलाबेन अस्पताल में महान गायक भूपेन हाजारिका जीवन की लड़ाई हार गए। 86 साल के भूपेन दा पिछले काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और अंतत: किडनी के दगा देने से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी बीमारी के शुरू से ही उनकी दोस्त कल्पना लाजमी उनके साथ थीं, जिनके नाम अपनी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा वह कर गए। भूपने दा का जिक्र चलते ही उनके संघष्ाü और उपलब्घियों की ढेर सारी यादें ताजा हो जाती हैं। शुरूआत एक छोटे से किस्से से...।
वष्ाोü गीत गए। कभी नोबल पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध लेखक पर्ल बॅक ने अरूणाचल और असम की सीमा में स्थित एक गांव सदिया के युवक से कहा था, एक अंग्रेज को सुबह आठ बजे आने को कहो, तो सुबह पौने आठ बजे मेरे घर के आस-पास चक्कर लगाने लगेगा। वो ठीक आठ बजे मेरे घर का कॉल-बेल बजाएगा। यदि मैं तुम्हें आने के लिए कहूं, तो तुम साढ़े नौ बजे मेरे घर आओगे। तुम लोगों का तनावहीन व्यवहार मुझे बहुत पसंद है। यू आर नॉट बिकम स्लेव ऑफ टाइम। पुराने और पाश्चात्य व्यक्ति के बीच में यही एक बड़ा फर्क है। वैसे ज्यादा देरी करने से काम करने में कुछ असुविधा होती है, इस बात को भी ध्यान में रखना।
जिस समय पर्ल बॅक ने यह बात उक्त युवक से कही थी, उस समय यह युवक किसी तरह से अपने दिन व्यतीत कर रहा था। कभी बहुमंजिला इमारत का लिफ्ट चलाकर, कभी स्विमिंग पुल के किनारे बैठकर जूते पॉलिस कर, तो कभी तैराकी के शौकीन लोगों के कपड़े सम्भाल कर। तब यह युवक कोलंबिया विश्वविद्यालय से मॉस कम्युनिकेशन को लेकर शोध कर रहा था।
वो विश्वविद्यालय के मेस में ही रहता। घर से पिता जो पैसे भेजते थे, उससे किसी तरह दो वक्त का खाना जुटता था। उसकी दोनों आंखों में ढेर सारे सपने हैं। नए दिन गढ़ने का, अपने लिए कुछ करने का। बहुत छोटी उम्र में मां से कहा था- चिंता मत करना, एम.ए. तो पास करूंगा, उससे ज्यादा कुछ करूंगा। आगे चलकर अपनी कही गई इन बातों को संगीतकार डॉक्टर भूपेन हजारिका ने पूरे विश्व में अपनी ख्याति फैलाकर साबित भी कर दिखाया था। आज वो हमारे बीच नहीं हैं। काफी दिनों तक अस्वस्थता की हालत में वेंटीलेटर में रहे, मगर इस दौरान भी यह सुनने को मिला था कि लताजी का गाना बजने पर उनके शरीर में एक हलचल होती थी।
उनका जीवन उनके गांव सदिया से शुरू होता है। पूर्व भारत में स्थित सदिया तब बहुत पिछड़ा हुआ गांव था। उनके पिता नीलकांत हजारिका तब सदिया के कमिश्नर साहब की पत्नी को असमिया भाष्ाा सिखाते थे। वहीं के एक स्थानीय स्कूल में वो शिक्षण का कार्य भी करते थे। वहीं 8 सितम्बर 1926 में भूपेन का जन्म हुआ। घर पर उनकी शुरूआती शिक्षा-दीक्षा हुई।
मां के गले की आवाज अjुत थी। छोटे भूपेन उस समय मां से बंग संगीत सुनते थे। वो भी अपनी मां के साथ गला मिलाकर गाते थे। कुछ दिनों बाद पिता को गुवाहटी के कॉटन कॉलिजिएट स्कूल में नौकरी मिली। वहां के सोनाराम स्कूल में पहली बार तीसरी क्लास में भूपेन भर्ती हुए। वैसे बीच में साल भर के लिए उन्हें धूबरी में जाना पड़ा था। उस समय प्रमथेश बडुवा धूबरी में अपनी फिल्म मुक्ति की शूटिंग के सिलसिले में आए थे। प्रमथेश उनके पिता के अच्छे मित्र थे, इसलिए भूपेन को उन्हें बहुत करीब से देखने का मौका मिला था।
ख्ौर, धूबरी के बाद वो लोग फिर गुवाहटी वापस आ गए थे। तब तक गुवाहटी के कॉटन कॉलिजिएट स्कूल में उनकी पढ़ाई भी शुरू हो गई थी, साथ में शुरू हो गया था गायन और चित्रकारी भी। इस बीच यहां के आईपीटीए के दो सदस्य विष्णुप्रसाद आभा और ज्योतिप्रसाद अग्रवाल से इनका परिचय हुआ। इनके सानिध्य में रहकर किशोर भूपेन के दिलोदिमाग में आम आदमी के गीत-संगीत की बात छा गई थी। इस उम्र में ही आम आदमी के लिए कुछ करने की बात वो सोचने लगे थे। 1940 में उन्होंने मेट्रिक पास किया।
फिर अचानक उन्हें ऎसा लगा कि वो असम में और पढ़ाई जारी नहीं रखेंगे। यह सोचने के बाद ही वो तत्काल कोलकाता चले आए। 1942 में कोलकाता के डलहौजी में जापान ने बम गिराया। एक दहशत से कांप उठा कोलकाता। अनगिनत लोगों की तरह भूपने दा भी बनारस चले आए। यहां उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। उस समय यहां के आचार्य पंडित जवाहरलाल नेहरू और उपाचार्य सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन थे। राधाकृष्णनजी की क्लास में गीता का व्याख्यान सुनने का सौभाग्य भूपेन को भी मिला। यही नहीं उस्ताद बिस्मिल्ला खान के घर के पास के रास्ते पर खड़े होकर शहनाई पर उनकी भ्ौरवी सुनने का सौभाग्य भी उन्हें मिला।
बाद में भूपेन दा ने इस बात को कबूल किया था कि बनारस ने एक झटके में उनकी जिंदगी का रास्ता बदल दिया था, मगर तब तक उनके घर के हालात बहुत बदल चुके थे। पिताजी नौकरी से रिटायर हो गए थे। 145 रूपए पेंशन मिलता था। तब दस भाई-बहनों में सबसे बड़े भूपेन को बाध्य होकर गुवाहटी आना पड़ा था। उन्होंने बी. बरूआ कॉलेज में अध्यापन शुरू किया।
शुरूआती वेतन था 125 रूपए प्रतिमाह। कुछ दिन बाद ही उन्हें गुवाहटी रेडियो में मौका मिल गया। साल पूरा होने से पहले ही उनका तबादला दिल्ली हो गया। वहीं उनका परिचय डॉक्टर नारायण मेनन के साथ हुआ। उनकी मदद से उन्हें अमेरिका में मॉस कम्युनिकेशन पर शोध करने की स्कॉलरशिप मिल गई। घर की हालत अच्छी नहीं थी। ऎसे में नौकरी छोड़कर फिर से पढ़ाई शुरू करने में बड़ा जोखिम था। उनके अंदर शायद छिपा हुआ था किसी यायावर का मन।
12 सितम्बर 1949 को वो अमेरिका चले गए। कोलंबिया विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया। यहीं पर अचानक पर्ल के साथ उनका परिचय हुआ। भूपेन को उनका घनिष्ठ सानिध्य मिला। यहीं पर उन्होंने पॉल राबसन से सीखा मिसीमिपी नदी को कोसते हुए एक गाना, वल्र्ड मैन रिवर, यू डोंट सी नथिंग...। बस उन्हाेंने लिख डाला, विस्तीर्ण दु पारे, असंख्यो मानुषेर हाहाकार सुने, निशब्दे निरवे ओ गंगा तुमी, ओ गंगा बहिचो केनो... ( विस्तृत फैले हुए दो किनारे, असंख्य लोगों की वेदनापूर्ण हाहाकार सुनकर भी ओ गंगा तुम नि:शब्द होकर बहती हो क्यों...)। वैसे तब तक शांतिनिकेतन में पढ़ी-लिखी बरोदरा की लड़की प्रियवंदा से भूपेन का परिचय हो गया था।
प्रियवंदा रहती थीं न्यूयॉर्क में। उन दोनों की शादी 1940 में हुई। अब यह अलग बात है कि यह शादी ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी थी। तब अमेरिका से लौटते समय अफ्रीका भी घूमकर लौटे थे भूपेन दा। जहाज से प्रशांत महासागर का रूप देखकर वो भावुक हो गए। लिख डाला, सागर संगमे सातार केटेचि कतो, कखनो तो होई नेई क्लांत...(सागर-संगम में कितनी बार तैरा हूं, पर कभी भी थकान महसूस नहीं किया ..)। कभी एक इंटरव्यू में भूपेन दा ने कहा था, मेरी अंतिम यात्रा में मेरे इस गाने को ही बजाया जाए। यही मेरी जीवन यात्रा का गाना है। भूपेन दा ने अपने जीवन में बहुत कम गाने गाए। लेकिन जो गाने गाए हैं, वो श्रोताओं के दिल को छू गए। उस दौर के सारे धाकड़ संगीतज्ञों हेमांग विश्वास, सचिनदेव बर्मन, हेमंत मुखर्जी का प्यार उन्हें मिला। उन्हीं दिनों वो गण नाटय संघ के साथ जुड़ गए। अपने गानों को लेकर वो विश्व भ्रमण कर चुके थे।
कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर के एकमात्र प्रिय अमिय कुमार चक्रवर्ती से भी भूपेन दा को बहुत मदद मिली। दो-दो बार लौटाकर तीसरी बार उन्होंने पkश्री सम्मान ग्रहण किया था। फिल्मों का निर्माण किया, फिल्मों में संगीत दिया। चमेली मेमसाहब के संगीत के लिए उन्हें राष्ट्रपति से सम्मान भी मिल चुका है और कभी कम्युनिष्ट होने की वजह से उन्हें अपने निवास स्थान से भी दूर होना पड़ा था, जबकि इसमें उनका कोई दोष्ा नहीं था। ख्ौर, उन्होंने ऎसी बातों को भी ज्यादा तवज्जो नहीं दी। हमेशा गलत बातों के खिलाफ वो मुखर रहे। जीवन के अंतिम दिनों में भी अन्याय के विरोध में उनकी आवाज बलिष्ठ थी।
बस, बढ़ती उम्र और बीमारी ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया था। अस्पताल में कैद होने से पहले जुहू के एक फ्लैट में वो बेहद नीरव जिंदगी व्यतीत कर रहे थे। यहां उनकी लोकल गार्जियन थीं रूदाली की निर्देशिका कल्पना लाजमी। बाद में गुवाहटी के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज करा रहे भूपेन दा ने अपनी ज्यादातर सम्पति कल्पना लाजमी के नाम कर दी थी। जीवन का क्या, मगर जब तक वह होश में रहे, गुनगुनाकर नई धुन बनाते रहे। अब नई सुर रचना के संसार में वो एक पर्यटक की तरह कर्णप्रियता की तलाश करते रहेंगे। एफएम टीम की ओर से भूपेन दा को भावभीनी श्रद्धांजलि।
-असीम चक्रवर्ती
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