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मुसाफिर जाएगा कहां...
Monday, December 12, 2011, 13:01 hrs IST
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गाइड का एक गाना था- वहां कौन है तेरा, मुसाफिर जाएगा कहां...। वह गाना आज देव साहव पर पूरी तरह सही उतर रहा है। देवानंद इस दुनिया से चले गए, लेकिन जिंदगी को रोमांस की तरह जीने वाले लोग पूछ रहे हैं कि उन्हें जाने की इतनी हड़बड़ी क्यों थी और जाने के लिए लंदन का रास्ता क्यों चुना? क्या मुम्बई उन्हें रास नहीं आ रही थी?

सवालों का जबाव देने के लिए कोई नहीं है। हर कोई अपने-अपने स्तर पर कयास और अनुमान लगा रहा हैं। जिस मुसाफिर को जाना था, वह किसी को बिना बताए चुपचाप चला गया। किसी को भनक तक नहीं लगने दी। निश्चित रूप से उन्हें अपनी जिंदगी के खत्म होने का पूर्वाभास हो गया था, इसलिए अपने बेटे के अलावा किसी अपने को साथ लंदन नहीं ले गए। वे नहीं चाहते थे कि उनकी मौत पर कोई रोए। वे कहा भी करते थे कि लोग उनकी जिंदगी को याद रखें, मौत को नहीं। देव साहव ने जिस जिंदादिली के साथ जिंदगी का साथ निभाया, वैसा उदाहरण विरले ही मिलता है। वे हर पल को जीते थे... और अतीत के पन्नों को जल्दी पटलते नहीं थे। अगर पलटते भी थे, तो सिर्फ खूबसूरत लम्हों की चर्चा करते थे। अट्ठासी साल की उम्र में जो जोश-खारोश उनमें था, वह नौजवान पीढ़ी को चुनौती देने जैसा था। लेकिन मौत तो मौत होती है, जो किसी को भी नहीं बख्शती। जीवन का यह एकमात्र ऎसा सत्य है, जहां सबको पहुंचना पड़ता है। इसके लिए कोई क्षमादान भी नहीं। देवसाहब ने क्षमा की अर्जी कभी नहीं दी, मगर उन्होंने जिंदगी का जो मतलब समझाया, वह मौत को लजाने जैसा है। जिंदगी से रोमांस करो...यह उनका फलसफा था। लेकिन वह जिस तरह गए, उससे तो यही लगता है कि आखिरी वक्त उन्होंने मौत को भी जीने का अंदाज सिखा दिया। शायद मौत को भी उनका गाना याद आ रहा होगा "अभी ना जाओ छोड़कर कि अभी भरा नहीं..."।

कभी-कभी लगता है कि अगर देवानंद ने अपने पिता के सुझाव पर किसी बैंक में क्लर्क की नौकरी या नेवी जॉइन कर ली होती, तो क्या होता? दरअसल यहीं आकर लगता है कि जीवन संयोगों का नाम है। नौकरी के लिए कई जगह उन्होंने आवेद किया था, मगर हर जगह रिजेक्ट हो गए। तब उन्होंने अपनी अटैची उठाई और फ्रन्टियर मेल में सवार होकर मुम्बई के लिए निकल गए। जब घर से निकले थे, तब उनकी जेव में मात्र 30 रूपए थे, लेकिन कुछ ही साल में उन्होंने कामयाबी की जो सीढियां चढ़ी... वह उस समय 30 करोड़ लोगों के पसंदीदा स्टार बन गए। हिन्दी सिनेमा में त्रिमूर्ति बन गई-देवानंद, दिलीप कुमार और राजकपूर की तिकड़ी। तीनों ने लंबे समय तक राज किया। यह अलग बात है कि तीनों ने किसी भी फिल्म में एक साथ काम नहीं किया। लेकिन तीनों को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नहेरू बहुत प्यार और सम्मान देते थे।

देव साहब में हमेशा नौजवानी दिखाई पड़ती थी, इसलिए उनके स्वभाव में हमेशा विद्रोह की गूंज सुनाई देती थी। वे इमरजेंसी में सरकार के प्रखर विरोधी बने और 1977 में नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया का गठन कर देश की राजनीतिक तस्वीर बदलने की कोशिश की। उनकी राजनीतिक समझ इतनी परिपक्व थी कि अटल बिहारी बाजपेयी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में उन्हें बस यात्रा में पाकिस्तान अपने साथ लेकर गए। देवआनंद ने लाहौर से ग्रेजुएशन किया था और उनके चाहने वाले लोग वहां भी मौजूद थे। बाजपेयी को लगा कि उनकी शांति यात्रा में देवआनंद बहुत बड़े मददगार बन सकते हैं।

देवानंद के कितने रूप और नाम थे, इसकी कल्पना भी आज नहीं की जा सकती। स्टाइल आइकॉन, रोमांटिक हीरो, टे्रंड सेटर, एनर्जेटिक, एवरग्रीन, चार्मिग प्रिंस, जिंदादिल, लवर बॉय, यंगेस्ट स्टार, लाइव वायर आदि। अगर सही मायने में आंकें, तो आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने देश को विकास के जो सपने दिखाए, उसी से मिलते-जुलते देवानंद ने भी नौजवानों को दिखाए। स्वप्न को जमीन पर उतारने के सपने। सन् 1917 में रूसी क्रांति के बाद लेनिन ने कहा था कि हमारे लिए सिनेमा सभी कलाओं से अधिक महत्वपूर्ण है। सिनेमा सिर्फ लोगों के मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि सामाजिक शिक्षा संवाद स्थापित करने तथा हमारी विशाल जनसंख्या को एकसूत्र में बांधने का एक सशक्त साधन है। इसके ठीक 30 साल बाद भारत को जब आजादी मिली, तब लेनिन की बात यहां भी यथार्थ रूप लेने लगी। देव, दिलीप, राज ने अमली-जामा पहनाना शुरू किया। देव साहव ने शहरी युवाओं का प्रतिनिधित्व किया। उनके बारे में तरह-तरह के मिथ कायम हुए। खासकर लड़कियों के उन पर जान छिड़कने के। कहना ना होगा कि स्टारडम की जो ऊंचाई देवानंद ने कायम की, वह आज भी बरकार है। जब भी रोमांटिक हीरो की चर्चा होती है, तो सबसे पहले सबकी आंखों में देवसाहब का ही चेहरा घूमता है। उनकी अदाओं और स्टाइल की सबसे ज्यादा नकल हुई। देवानंद कभी चुनौती से घबराते नहीं थे। उनके अंतिम दस साल को उनके बुरे स्वप्न के रूप में देखा जाता है, मगर उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। काम के प्रति लगन और उत्साह उनका रूटीन था। कहते भी थे कि जिस दिन वे खाली बैठ जाएंगे, उस दिन वह मर जाएंगे, इसलिए हमेशा व्यस्त रहे। वे कभी निगेटिव बात नहीं करते थे। फिल्म के हिट-फ्लॉप को वह कभी बहस का मुद्दा नहीं बनाते। वे किसी की आलोचना भी नहीं करते। खुद को बहुत प्यार करते और सम्मान देते थे। उनमें आत्ममुग्धता थी, मगर दूसरों को नकारने की शर्त पर नहीं।

वे खोजी थे। सुबह -सुबह ढेर सारे अखवार, पत्रिकाएं पढ़ते। दुनिया को बहुत करीब रखना चाहते थे। वे ज्ञान-पिपासु थे। हर रोज खबरों में नई कहानी ढूंढने की कोशिश करते। वे नए टैलेंट के पारखी भी थे। जब भी मौका आया, उन्होंने नए चेहरों को अपनी फिल्मों में मौका दिया। उन चेहरों में जीनत अमान, जाहिदा, टीना मुनीम, मिंक, ऋचा शर्मा, जैकी श्रॉफ तो हैं ही साधना, शत्रुघ्न सिन्हा, शेखर कपूर , शबाना आकामी, विजय आनंद आदि भी शामिल हैं।

आज जब प्रेम-सम्बंधों को लोग अपनी अपनी तरह से भुनाने की रणनीति बनाते रहते हैं देवानंद सुरैया के साथ सम्बंध को न तो बदनाम किया, ना सार्वजनिक। देव साहब ऎसे पवित्र प्रेमी थे कि सुरैया ने इनकार किया, तो दर्द को पी गए और कल्पना कार्तिक से विवाह रचाकर सुरैया को भी विवादों से बचा गए। गुरूदत्त से इनकी दोस्ती की हमेशा मिसाल दी जाती है। इन्होंने उस दोस्ती को निभाया। हिन्दी सिनेमा के 75 साल पर जब इनसे श्रेष्ठ फिल्मों के बारे में पूछा गया, तो इन्होंने पूरी ईमानदारी और बिना लाग लपेट के गंगा जमना, आवारा के साथ साथ दीवार और अमर अकबर एंथोनी का नाम लिया। यह उनके ईमानदार और उदार चरित्र का उदाहरण है।

पर्दे और निजी जीवन को उन्होंने अलग-अलग जिया। पर्दे की ऊंचाई से कभी बौराए नहीं, ना ही निजी जीवन की उदासी को कभी जाहिर होने दिया। उन्होंने अपने जीवन को जिस महत्वपूर्ण गांठ में बांधा, उसे वे खुद भी नहीं खोज सके। फिल्मों में आने वाला उनकी तरह का हर एक्टर उसी गांठ में बंधने की कोशिश करता रहा, क्योंकि उसी में आनंद मिलता था। सिनेमा को आनंद का माध्यम मानने वाले इस स्टार का नाम इसीलिए देव आंनद था। इस दुनिया में आने वाला हर शख्स मुसाफिर की तर होता है, जो खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है, मगर कुछ ही ऎसे लोग होते हैं, जो अपनी छवि और यादों को छोड़ पाते हैं, उनमें से एक थे देवाानंद। वे नहीं हैं। कॉमेडी सर्कस वालों ने वेशक इनकी मिमिक्री कर मजाक उड़ाने की कोशिश की हो, लेकिन देवानंद की जो स्टाइल 30-40-50 साल पहले थी, उसे ही आज की पीढ़ी अपना रही है। भला ऎसे में उनको कौन भुला सकता है।
-आनंद भारती
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