भारतीय सिनेमा के विकास में निर्माता-निर्देशक व अभिनेता सोहराब मोदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने सामाजिक और ऎतिहासिक दोनों तरह की फिल्मों का निर्माण किया। उनकी कई सामाजिक फिल्में तत्कालीन संदर्भ में काफी महत्व की थीं। लेकिन उनकी ऎतिहासिक फिल्में भारतीय सिनेमा को उनका एक विशिष्ट योगदान हैं। इनके सिद्धांतों पर समय और काल का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इनकी शुरूआत हुई 1939 में प्रदर्शित फिल्म पुकार से। इस फिल्म का उप-शीष्ाüक था-भारत की प्राचीन कीर्ति की कथा।
पुकार की पटकथा और संवाद लिखे थे कमाल अमरोही ने। नसीम बानो नूरजहां बनी थीं, तो चंद्रमोहन जहांगीर। सरदार अख्तर बनी थीं रानी धोबन और राजपूती शौर्य की प्रतिमूर्ति संग्राम सिंह बने थे स्वयं सोहराब मोदी। इसकी कहानी न्याय के बड़े घंटे के इर्द-गिर्द घूमती है। निरंकुश शासन प्रणाली होने के बावजूद फिल्म में लोकतंत्र और न्याय में आस्था दर्शायी गई थी। विष्ाय को स्पष्ट करने के लिए फिल्म में दो अलग-अलग कहानियां समांतर चलती हैं। राजा संग्राम सिंह का पुत्र मंगलसिंह ऎसी लड़की से प्यार करता है, जिसके परिवार वालों से उसके परिवार वालों की कट्टर दुश्मनी है। परिस्थितियों से विवश मंगल सिंह अपने शत्रुओं का संहार करके अपने मित्र हैदर अली के यहां शरण लेता है। संग्राम सिंह अपने पुत्र का पीछा करता है और उसे बंदी बनाकर दरबार में पेश करता है, ताकि उसे अपने किए की उचित सजा मिले। मुगलिया पृष्ठभूमि में वह सच्चा राजपूत है और उसका कहना था- न्याय अंधा नहीं है। मैं इंसाफ में विश्वास करता हूं।
इसी के समांतर दूसरी कहानी में मलिका नूरजहां के द्वारा एक दुर्घटना में गलती से रानी धोबन के पति की मृत्यु हो जाती है और रानी धोबन इंसाफ के लिए विशाल घंटे को बजाती है। अब शंहशाह जहांगीर फैसले के लिए असमंजस में पड़े हैं, क्योंकि उनकी पत्नी और राजपूत योद्धा संग्राम सिंह का पुत्र दोनों अपराधी हैं। यदि शहंशाह एक ही को दंड देते हैं, तो इससे मुगलिया प्रतिष्ठा में आंच आती है। अंत में वे अपनी पत्नी को सजा सुना देते हैं। इस पर राजा और प्रजा में तनातनी पैदा हो जाती है, लेकिन अंत में सौहार्दपूर्ण समझौता हो जाता है।
पुकार के जरिए सोहराब मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से समाज में धर्म-निरपेक्षता और लोकतंत्रीय समानता की बात उठाई थी। फिल्म की विष्ायवस्तु नैतिक मूल्यों की रक्षा को सबसे महत्व का मानती है और आदर्शो के सामने व्यक्ति विशेष्ा को गौण, लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण बात पुकार के संदर्भ में इसके जरिए कई शाश्वत सत्यों को उजागर करने की कोशिश थी। उस समय के साम्राज्यवादी शासन की बिगड़ती व्यवस्था को यह संकेत था कि शीघ्र और उचित न्याय पाना हर नागरिक का अधिकार है। पुकार जब प्रदर्शित हुई, तो उस समय स्वतंत्रता की मांग पूरा जोर पकड़ चुकी थी और सोहराब मोदी ने इस संदर्भ में इसके जरिए राष्ट्रीय आकांक्षाओं के महत्व को रेखांकित किया। सेंसर के कठोर पंजों से बचने के लिए भी सम्भवत: उन्होंने इस विष्ायवस्तु को चुना। यह उनकी अत्यंत लोकप्रिय फिल्मों में से एक है। -ठाकुरदास खत्री
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