इमेजिन पर प्रसारित धारावााहिक "रक्त संबंध" दर्शकों को पसंद आ रहा है या नहीं, इस बारे में कुछ भी कहना अंधेरे में तीर चलाने जैसा होगा। लेकिन धारावाहिक में संध्या का मुख्य किरदार निभाने वाली श्रीति झा सुर्खियों में हैं। गौरतलब है कि कई धारावाहिकों में विविधतापूर्ण किरदार निभाने के बाद श्रीति रक्त संबंध में एक अंधी युवती को जीवंत करने में जुटी हैं। अब सवाल यह उठता है कि इस चुनौतीपूर्ण चरित्र के साथ वे कितना न्याय कर पाएंगी? क्या उन्होंने इसके लिए किसी तरह की कोई खास तैयारी की है? आदि ऎसे कई सवाल हैं, जिनका जवाब वो बिंदास अंदाज में देती हैं... संध्या के किरदार में वास्तविकता लाने के लिए आपने क्या खास तैयारी की है? मैंने इस किरदार को एक चुनौती के रूप में ही स्वीकारा। संध्या के किरदार में दर्शकों को वास्तविकता का अहसास हो, इसके लिए मैंने काफी रिसर्च किया... कई पुस्तकें पढ़ीं... नेत्रहीन लोगों की बॉडी लैग्वेज को बरीकी से समझा... उनके चलने-फिरने और काम करने के बारे में जानकारी हासिल की। ये सारी बातें मुझे मेरे किरदार को जीवंत करने में काफी मददगार साबित हुई हैं। यूं तो आपने अब तक तरह-तरह के किरदार निभाए हैं, मगर संध्या के किरदार में ऎसा क्या खास है? असल में रक्त संबंध पांच बहनों में सबसे छोटी बहन संध्या की कहानी है। वह शिक्षित और स्वतंत्र विचारधारा की मस्ती में जीने वाली लड़की है। एक हादसे में उसकी आंखें चली जाती हैं। उसके बाद संध्या की खुद को आत्मनिर्भर बनने की संघष्ाü यात्रा शुरू होती है। इतना ही नहीं, संध्या अपने पिता और बहनों के लिए भी एक उदाहरण बनती है। धारावाहिक ज्योति में आपने एक मानसिक रूप से विक्षिप्त युवती सुधा की भूमिका को निभाया था, उससे यह किरदार कितना अलग है? मेरे लिए हर भूमिका चुनौतीपूर्ण होती है। मैं किसी भी भूमिका को करने से पहले नहीं सोचती कि यह मेरे लिए बेहतर है या नहीं। इसमें दूसरी भूमिका की तरह समानता है या फिर ये उस किरदार से बिलकुल अलग है। मैं अपने किरदार को बेहतर से बेहतर बनाने और इसमें खुद को डुबोने की कोशिश करती हूं। कहना चाहंूगी कि यह भूमिका नेत्रहीन होते हुए भी एक समान्य लड़की की भूमिका है। रक्त संबध और ज्योति दोनाें धारावाहिकों में एक दम विरोधाभासी किरदार निभाने का अनुभव कैसा रहा? बेहद रोमांचक अनुभव रहा है। इससे पहले सोचती थी कि मंै सिर्फ सुधा या फिर सुहानी जैसी ही भूमिकाएं कर सकती हूं, मगर सुधा के किरदार ने मुझे एक अलग परिवेश और वातावरण में खुद को देखने का मौका दिया दिया है। सुधा व संध्या दोनों की भाष्ाा और परिभाष्ाा अलग है। फिजिकली डिसेबल किरदार मुश्किल होते हैं या साधारण किरदार...? फिजीकली डिसेबल चरित्र को करना आसान नहीं होता है, क्योंकि इस प्रकार के किरदारों को निभाने से पहले आपको शरीरिक और मानसिक रूप से तैयार होना पड़ता है, इस तरह के किरदार निभाना मेरी नजर में ज्यादा मुश्किल होता हैं। इस सीरियल से जुड़ी कोई यादगार घटना...? इस सीरियल के सेट पर गुजरा हर पल यादगार है। पूरी यूनिट एक परिवार की तरह है। सभी को-स्टार बेहद हेल्पफुल हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वो सभी बहुत अच्छे इनसान हैं। 9एक्स पर आपके दो धारावाहिक अंगद और जिया जले अचानक बंद हो गए... इधर ज्योति से भी आप एकाएक गायब हाें गर्ई, कोई खास वजह? वे मेरे शुरूआती कॅरियर के धारावाहिक थे। बंद होने पर बुरा तो लगा, लेकिन उनको बंद नहीं किया गया, बल्कि चैनल ही अर्थिक मंदी के शिकार हो गए। रही बात ज्योति की, तो उधर से जब कोई कॉल नहीं आई, तो मैं रक्त संबध में व्यस्त हो गई। -कुसुम शर्मा
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