कलकत्ता में एकाएक फोन आया रात के एक बजे, यह खबर कन्फर्म करने के लिए कि क्या मोहम्मद रफी की वाकई में मृत्यु हो गई है। मैं स्तब्ध-सा रह गया। फिर मैंने रफी साहब के यहां फोन किया। इतने में एक और फोन आया कि खबर सच्ची है। तब भी विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने पत्नी को आवाज दी, वह बोली नहीं। ऊपर जाकर देखा, तो वह खिड़की के पास खड़ी रो रही थी मुझे खुद रोना आ रहा था। मेरा सारा परिवार मोहम्मद रफी का बहुत बड़ा प्रशंसक है। रफी साहब से मैंने बहुत कुछ सीखा। हालांकि वे मेरे से चार साल छोटे थे। वे मुझे अपने बडे भाई की तरह मानते थे। उनके साथ हमेशा हंसी मजाक चलता रहता था। हम दोनों में परफेक्ट अंडरस्टैंडिंग रहती थी। एक दूसरे को नीचा दिखाने की या दबाने की प्रवृत्ति कभी नहीं उपजी, जो एक पेशे के लोगों में अक्सर हो जाती है। रफी साहब के गीतों का अपना स्कूल था, अपना घराना। उनकी गायकी का अंदाज अनोखा था, जो कभी दुबारा पैदा नहीं हो सकता। फिर उनकी रेंज देखिए। न किसी की आंख का नूर हूं..(लालकिला), दिन ढल जाए हाय रात न जाए...(गाइड) जैसे गीत सिर्फ रफी के ही बस के थे। मैं उनकी रेंज का मुकाबला कभी नहीं कर सकता। मोहम्मद रफी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे गाने को आत्मसात कर लेते थे। गाने को अपने व्यक्तिगत योगदान से ऎसा मूड दे देते थे कि भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ता था। संगीत निर्देशक ने अगर कमजोर धुन भी बनाई है, तो वे अपने गले से गीत को पॉलिश कर देते थे, इसलिए उनकी आवाज उनके गीत आज भी उतने ही मधुर हैं, जितने बरसों पहले थे। रफी साहब की जो जगह है, वह यूनिक है। उसे कोई छीन नहीं सकता। उनकी नकल करने वाले भले ही आ जाएं, पर नकल तो नकल ही होती है असली चीज नहीं। रफी में अच्छे इनसान के अलावा एक बहुत बड़ा गुण था- अपने पेशे के प्रति पूरी श्रद्धा। वे रोज सवेरे उठकर रियाज करते थे। उनके निधन से संगीत के एक पूरे युग का अंत हो गया और मुझे लग रहा है, मेरा भाई मुझसे अलग हो गया है। प्रस्तुति-ठाकुरदास खत्री
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