ुवा पीढ़ी के चहेते हीरो का नया कमाल। पिछले दिनों प्रदर्शित शाहिद की फिल्म "बदमाश कम्पनी" का प्रचार कुछ इसी अंदाज में किया गया। ऎसे प्रचार वाक्य से दूर देखें तो इस फिल्म का कटु सच यह है कि बॉक्स ऑफिस में इस फिल्म ने अपने बदमाश हीरो को उनके चहेतों की नजरों बदनाम कर दिया। हिंदी सिने जगत की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि यहां हिट के सच को ही सर्वाधिक कबूल किया जाता है। इस दृष्टि से देखें, तो शाहिद का फिल्म कॅरियर काफी लड़खड़ाता दिखाई पड़ रहा है। "विवाह" (2006) के बाद की प्रदर्शित उनकी दूसरी जबरदस्त हिट फिल्म थी "जब वी मेट । इन दोनों ही फिल्मों में उनकी इमेज और लुक्स का काफी मेक-ओवर हुआ था। इसके बाद हाल फिलहाल की "पाठशाला" और "बदमाश कम्पनी" तक वो लगातार दर्शकों द्वारा खारिज किए जा रहे हैं। हां, इन फिल्मों ने उन्हें फैशन आइकॉन के रूप में जरूर स्थापित किया है। शाहिद इस बात पर मुस्कुरा पड़ते है, "ऎसी कोई बात नहीं है। "विवाह" के बाद लगातार छह माह तक मैं सिर्फ ऑफर वापस करता रहा हूं। उस दौरान एक भी स्क्रिप्ट मुझे पसंद नहीं आई थी। सभी को जीवन में वैरायटी की जरूरत पड़ती है। "विवाह" में मेरे रोमांटिक लवर बॉय का रोल क्लिक होने का यह मतलब नहीं था कि मैं हर फिल्म में वैसा ही करता रहता। ऎसा कोई वादा मैंने किसी प्रोड््यूसर-डायरेक्टर से नहीं किया था। उन दिनों तो एक निर्देशक ने हद ही कर दी थी - शाहिद "विवाह" में जैसा शॉट था, मैं बिल्कुल उसी तरह का शॉट लूंगा।" मेरा तो एकदम पारा चढ़ गया था। मैंने तुरंत उन्हें ना कर दिया। एज एन एक्टर आई हेट रिपीटेशन। इसके बाद की अपनी सारी फिल्मों को लेकर मैं बहुत संतुष्ट हूं। मैंने अपनी फिल्मों को लेकर काफी हद तक प्रयोग किया है। मुझे पता है कि यदि मैं इस तरह की फिल्में नहीं करूंगा, तो मेरा कॅरियर अधूरा रह जाएगा।" चूंकि इस तरह से प्रयोगधर्मी होना कहीं न कहीं शाहिद के लिए घातक साबित हो रहा है। शाहिद से बातचीत पर आधारित एक रिपोर्ट... फोकस में रहने वाला हीरो... यूं तो शाहिद अपने कॅरियर को लेकर बहुत सचेत रहते हैं। उन्हें कहां रूकना होगा, इस बात से वो अच्छी तरह से वाकिफ रहते हैं। "कमीने" में शर्ट खोलना पड़ेगा जानकर भी सिक्स पैक बनाने के रेट रेस में खुद को उन्होंने शामिल नहीं किया था, बल्कि अपना मसल्स मैन लुक बनाने के लिए उन्होंने एक साल का समय लिया था। इस एक साल में उन्होंने अपने पसंदीदा डिश को छूकर भी नहीं देखा था। उनका जान से प्यारा चॉकलेट बॉक्स भी फ्रिज के एक किनारे शाहिद के सपर्श को तरसता रहता था। उन दिनों हफ्ते में पांच दिन उन्होंने हर दिन वर्जिश करके जमकर पसीना बहाया था। इसके बाद ही उन्होंने सिक्स पैक के गिमिक से निकल कर अपनी मांसपेशियां तैयार की थीं। उनकी यह सारी मेहनत "कमीने" को बड़ी सफलता दिलाने में नाकाम रही।
कौन रोक रहा है आगे बढ़ने से... "बदमाश कम्पनी" के बड़े-बड़े पोस्टर अब कहीं नजर नहीं आ रहे, मगर इनमें उन्हें देखकर एक बारगी यकीन होता है कि यह वही शाहिद है, जो कभी हेल्थ ड्रिंक के एड का बढ़ता हुआ बच्चा था या "इश्क-विश्क" का बिखरे हुए बालों वाला चॉकलेटी बॉय। प्यार में अलगाव या कॅरियर में मिली सफलता, इनमें से कौन-सी बात ने शाहिद को इतना परिणत किया है, इसका जवाब तो शाहिद ही दे सकते हैं। पर प्रचार की भाष्ाा में बोलें, तो वो अभी आगे बढ़ रहे हैं। हर फिल्म में उनका एक नया लुक नजर आ रहा है। टीनएजर के मन को संयत रखना भी उन्हें खूब आता है। "पाठशाला" के रिलीज के दौरान उन्होंने एक शो में बच्चों को समझाया था," मेरी यह फिल्म सिर्फ तुम्हारे लिए ही है।" लेकिन अहमद खान जैसे लोग जब ऎसी फिल्म की स्क्रिप्ट लिखते हैं या फिर परमीत सेठी जैसे गुमशुदा कलाकार कैमरे के पीछे फिल्म की बागडोर संभालते हैं, तो वह फिल्म खुद-ब-खुद बच्चे क्या, हर वर्ग के दर्शकों से बहुत दूर चली जाती है। शायद यही वह वजह है, जिसके चलते शाहिद आगे बढ़ने की जगह पीछे जाते जा रहे हैं। इसके लिए कुछ हद तक शाहिद भी जिम्मेदार हैं। सीधी-सी बात है ऎसी फिल्में शाहिद को आगे बढ़ने में मदद करेंगी, इसमें संदेह है।
सेल्फ हेल्प इज द बेस्ट हेल्प "अपने कॉन्फिडेंट को बराबर बनाए रखिए। देखिएगा, हर समस्या हल हो जाएगी। मैंने तो हर मोड़ पर इसका अच्छा परिणाम देखा है।" अपनी सफलता को शाहिद कुछ इस ढंग से व्यक्त करते हैं। सेल्फ ट्रेनिंग पर उनका दृढ़ विश्वास है। रात को सोने में कितनी भी देरी हो, हर दिन रात को सोने से पहले हॉलीवुड की एक फिल्म जरूर देख लेते हैं। इसके बाद अपनी पर्सनल डायरी में नोट करते हैं कि इस फिल्म से उन्होंने क्या सीखा। उन्होंने अपने पसंदीदा म्यूजिक सीडी और डीवीडी को एकत्र कर घर पर एक विशाल कलेक्शन बनाया है। हिंदी के गंभीर अभिनेता से लेकर फिल्म मेकर तक के लिए शाहिद एक मोबाइल फिल्म डायरेक्टरी की तरह हैं। वो हंस कर बताते हैं,"किसी विशेष्ा फिल्म के बारे में कुछ तथ्य जानना होता है,तो एक्टर से लेकर प्रोड््यूसर तक मुझे फोन करते हैं। मैंने कहा ना... मैं बहुत इजीली मिल जाता हूं।"
घर-परिवार कभी पापा पंकज कपूर के साथ उनका एक अघोçष्ात "शीत युद्ध " चल रहा था। बहुत दिनों तक बाप-बेटे के बीच बातचीत बंद थी। इतना ही नहीं "किस्मत कनेक्शन" के सेट पर बेटे की शूटिंग देखने के लिए पंकज कपूर आए थे, पर कुछ देर बाद ही शाहिद ने निर्देशक को कहलवा भेजा कि वो पापा को सेट से बाहर जाने के लिए अनुरोध करें। उनकी मौजूदगी की वजह से उनकी एकाग्रता में बाधा पड़ रही है। पंकज तत्काल सेट छोड़कर चले गए। इस प्रसंग का जिक्र चलने पर शाहिद का स्वर बहुत संयत हो जाता है,"मैं इस बारे में कुछ नहीं बोलना चाहता हूं...ना ही यह चाहता हूं कि इस बारे में मुझे कोई कोट करे।" खैर यह प्रसंग बदल चुका है, शाहिद अब पिता के साथ एक फिल्म "मौसम" कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ मां नीलिमा अजीम के साथ जरूर उनका रिश्ता अभी भी कुछ अच्छा नहीं चल रहा है।
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