फिल्म "काइट्स" देखने के बाद एक विदेशी पत्रकार मित्र ने बड़ी रोचक टिप्पणी की थी-"आप लोग हॉलीवुड की तर्ज पर ऎसी फिल्में क्यों बनाते हैं। बारबरा मोरी हमारे यहां की कोई बड़ी हीरोइन नहीं है, पर आपने उसे लेकर इतनी बड़ी फिल्म बना दी। वो भी एक साधारण-सी एक्शन फिल्म। हम तो आपकी फिल्म में आपके देश की बातें देखना चाहते हैं। "हम आपके है कौन" या "थ्री इडियट्स" जैसी कुछ बात होती, तो मजा आ जाता।"बात एकदम वाजिब है, आखिर ओवरसीज के दर्शक हमारी फिल्मों में विदेशी फिल्मों की झलक देखना क्यों पसंद करेंगे। उन्हें तो शुद्ध भारतीय संदर्भ में जुड़ी फिल्में ही आकçष्ाüत करेंगी। जैसा कि ट्रेड पंडित कोमल नाहटा कहते है, "ओवरसीज के एन आर आई दर्शक ही नहीं, विदेशी दर्शक भी नृत्य-संगीत और भारतीय सरोकार से जुड़ी छोटी- छोटी घटनाओं वाली फिल्मों को बहुत पसंद करते है, मगर हो यह रहा है कि प्रवासी भारतीय दर्शकों को विशेष्ा खयाल कर ऎसे सब्जेक्ट चुने जा रहे हैं, जिसकी पृष्ठभूमि में विदेशी धरती कहीं न कहीं मौजूद हो। ट्रेड गाइड के संपादक तरण आदर्श कहते हैं, "हाल फिलहाल "थ्री इडियट््स" की धमाकेधार सफलता तो यही दर्शाती है कि महज उन्हें आकçष्ाüत करने के लिए ऎसी कोशिश का कोई मतलब नहीं है।" हालांकि एन आर आई थीम पर आधारित फिल्में भारतीय दर्शकों को भी पसंद आती है। लेकिन जब विदेशीपन अतिरंजित हो जाता है, तो देशी मन उससे कटने लगता है।
प्रेम-रोग... शो मैन राज कपूर ने अपनी एक सुपर हिट फिल्म "संगम" की विदेश में काफी शूटिंग की थी। राज कपूर की एक फिल्म "प्रेम रोग" के मेक-अप मैन एस.मुर्जरत बताते हैं,"तमाम आग्रह और आर्थिक प्रलोभन मिलने के बावजूद राज साहब विदेश में शूटिंग की बात को बिल्कुल खारिज कर देते थे। वो हमेशा इस बात पर स्थिर रहे कि देश में ही ढेरों अच्छे लोकेशन हंै, फिर बेवजह विदेश में क्यों शूटिंग की जाए। हां, गानों के फिल्माकंन में जरूर उन्होंने कुछ विदेशी लोकेशन का सहारा लिया। असल में देश-विदेश के सारे विदेशी लोकेशन उनके जेहन में होती थीं, मगर विदेशी लोकेशन की बात वो एकदम अंत में सोचते थे। "प्रेम रोग" के एक गीत "भंवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राजकुंवर..." का फिल्मांकन उन्होंने इसी वजह से स्विट््जलैंड के फ्लॉवर गार्डन में किया था, क्योंकि तब उनके जेहन में ऎसा कोई लोकेशन ही नहीं आया था।" दबाव... फिल्मकार प्रकाश झा जो हमेशा देश में ही शूटिंग करना पसंद करते हैं, इस बात के प्रबल हिमायती हैं कि जब तक सब्जेक्ट की मांग ना हो, बेवजह विदेशी लोकेशन का सम्मोहन पालने का कोई औचित्य नहीं है। मैं तो भोपाल या पूर्णिया में ही अपने अच्छे लोकेशन ढूंढ लेता हूं। मैं यह मान कर चलता हूं, कि फिल्म अच्छी बनी हो, तो वह सर्वत्र पसंद की जाती है।" बात चाहे जो भी हो, मगर ओवरसीज का दबाव अब साफ नजर आने लगा है। कभी एक दर्जन से ज्यादा हिट फिल्में देश की सरजमीं पर बना चुके शौ मैन सुभाष्ा घई को अपनी फिल्मों "यादें","युवराज"आदि के लिए विदेशी लोकेशन ज्यादा लुभाने लगे हैं। यह दीगर बात है कि उनकी ये फिल्में देश ही नहीं, विदेशों में भी फ्लॉप साबित हुईं। लेकिन घई का उत्साह बदस्तूर कायम है। वो अपनी अगली फिल्म की शूटिंग भी विदेश में ही करेंगे। थोड़ा-सा फ्लैशबैक में जाए, तो कभी उनके इस उत्साह की बड़ी वजह उनकी फिल्म "खलनायक" बनी थी। संजय दत्त और माधुरी दीक्षित की मुख्य भूमिका से सजी इस फिल्म ने रिलीज से पहले जबरदस्त हाइप होने की वजह से देश की बात जाने दें सिर्फ ओवरसीज मार्केट में 10 करोड़ का बिजनेस किया था। ट्रेड पंडित इसे नब्बे के दशक की बड़ी उपलब्धि मानते हैं। मगर हाल के दौर में ओवरसीज मार्केट का पूरा गणित ही बदल चुका है। अब तो "थ्री इडियट््स" जैसी शुद्ध भारतीय परिवेश में बनी फिल्म सिर्फ ओवरसीज मार्केट में ही 105 करोड़ का व्यवसाय करती है। इसकी कुल कमाई 450 करोड़ तक पहुंच चुकी है। कारण यह है कि अब अमेरिका, लंदन और कुछ एशियाई देशों से बाहर निकल कर भारतीय फिल्मों का झंडा नित नए देशों में लहरा रहा है। कुछ फिल्म व्यवसायी इसमें और भी संभावनाएं तलाश रहे हैं। गणित... प्रसिद्ध वितरक श्रवण श्राफ कहते हैं,"ओवरसीज के मार्केट को हम आज भी पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं। हमें यह अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि यह शुरू से ही हमारी फिल्मों की कमाई का एक अच्छा जरिया रहा है। अब वक्त आ गया है, जब हमें इस मार्केट को ध्यान में रखकर फिल्म निर्माण के अपने ट्रेंड को और ज्यादा बदलना पड़ेगा।" इसे विडंबना कहेंगे कि पिछले कुछ वर्षोü से ही हमारे फिल्मवालों का ध्यान ओवरसीज की तरफ गया है वरना इससे पहले निर्माताओं का ज्ञान इस मामले में एक दम शून्य था। उस दौर में ओवरसीज के मुश्किल से एक-दो वितरक थे और एक तरह इस मार्केट पर उनका ही एकाधिकार था। करण जौहर बताते हैं, "वष्ाोüü तक उन्होंने बहुत खामोशी के साथ ओवरसीज मार्केट में अच्छी कमाई की, मगर अब हम समझदार हो
गए हैं। ओवरसीज की कमाई हमारी फिल्मों के लिए एक अतिरिक्त जरिया बनी है।"असल में सूरज बड़जात्या की फिल्म "हम आपके हैं कौन" ने ओवरसीज मार्केट में ही 50 करोड़ का व्यवसाय कर निर्माताओं के इस समझदारी को एकदम दृढ़ कर दिया था। इसके बाद से ही निर्माताऔं को खास ओवरसीज के लिए भव्य फैमिली ड्रामे का एक नया फॉर्मूला हाथ लगा। इसी दिशा में करण जौहर कुछ कदम आगे निकल गए। विदेशी लोकेशन... जहां तक परदेस में शूटिंग का सवाल है, ज्यादातर निर्माता-निर्देशक ही सब्जेक्ट की मांग का बहाना कर इस सवाल को टालना चाहते हैं, पर फिल्म मार्केट के कई अंदरूनी सूत्रों का कहना है, इसके कई कारण हैं : पहला, ओवरसीज वितरकों का दबाव। दूसरा, सितारों की रूचि। तीसरा, सहज शूटिंग प्रक्रिया। स्विट्जरलैंड, न्यूजीलैंड, मॉरीशस, बैंकॉक, लंदन, इटली आदि देश तो इस मामले में इतने संजीदा हैं कि देश के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वो यश चोपड़ा, राकेश रोशन जैसे हमारे कुछ फिल्मकारों को अपने यहां बीच-बीच में सम्मान भी करते रहते हैं। कुल मिलाकर फायदे के इस सौदे में सभी अपने-अपने ढंग से एक -दूसरे को सहयोग कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि देशी कहानी में विदेश ज्यादा हावी रहता है। आज दर्शक बहत समझदार हो गया है,उसे विदेशी चमक-दमक दिखाकर उल्लू नहीं बना सकते। यही बात ओवरसीज के दर्शकों पर भी लागू होती है। वहां दर्शक हिंदी फिल्मों में भारत को देखना चाहत है, ना कि न्यूजीलैंड... स्विट्जरलैंड को, इतनी छोटी-सी बात हिंदी फिल्ममेकर्स के समझ नहीं आ रही है। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारी फिल्मों में विदेशी छवि पूरी तरह से हावी हो चुकी है। एक्शन और रोमांटिक दृश्यों के फिल्माकंन में यह बात खुलकर देखने को मिल रही है। बावजूद इसके "थ्री इडियट्स" के निर्देशक राज कुमार हिरानी का मानना है कि फिल्में तो वही हिट होंगी, जो इस देश के संस्कार और संस्कृति से जुड़ी होंगी। आप यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारी वही फिल्में ओवरसीज में हिट होती हैं,जो हमारे यहां के दर्शकों को भी पसंद आती हैं। हमें इस बात का खयाल रखना पड़ेगा कि देश से बाहर हमारी फिल्मों के दर्शक सिर्फ अमेरिका, लंदन, ऑस्ट्रेलिया या इटली में नहीं बसते। हमें विश्व के सारे देशों के दर्शकों को अपनी ओर आकçष्ाüत करना है।" बात एकदम वाजिब है, तभी हिंदी सिनेमा ग्लोबल होने के अर्थ को अच्छी तरह से समझ पाएगा। -मुंबई से असीम चक्रवर्ती हमारी संस्कृति और कलात्मक रूचि... श्याम बेनेगल आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, सूरज बड़जात्या, राजू हिरानी जैसे हमारे कई युवा फिल्मकार विश्व फिल्म मार्केट में हमारी स्थिति लगातार मजबूत कर रहे हैं। अभी कुछ साल पहले तक ओवरसीज मार्केट के बारे में हम बहुत कम जानते थे। अब यह दीगर बात है कि मेरी कई फिल्में ओवरसीज मार्केट में खूब पसंद की गर्ई, पर इनकी मार्केटिंग कभी हम उस तरह से नहीं कर पाए, जैसा कि आज हो रहा है। एक अच्छी बात यह हुई है कि फिल्म निर्माण को लेकर हमारी धारणा तेजी से बदली है। बजट आड़े नहीं आ रहा है। हम सिर्फ बेहतर ढंग से अपने आपको पेश करने की कोशिश कर हैं। वहां यदि फैमिली ड्रामा चल रहा है,तो आम मसाला वाली फिल्में भी खूब पसंद की जा रही हैं। पिछले दिनों "थ्री इडियट््स" देखकर मेरे एक विदेशी आलोचक मित्र ने कहा,"आपके मुख्य धारा की फिल्में भी बहुत गंभीर शेप ले रही हैं। यह तो हल्की-फुल्की नहीं सीरियस फिल्म है।" यदि वो हमारी फिल्में पसंद कर रहे हैं, इसकी बड़ी वजह यह है कि वो हमारी संस्कृति और कलात्मक रूचि को हमारी फिल्मों में भी देखना चाहते हैं। यदि हमारा फैमिली ड्रामा वहां हिट हो रहा है, तो इसकी वजह भी यही है। अपनी इस कलात्मक लय को बनाए रखने के लिए हम कहीं भी लोकेशन तलाश कर सकते हैं। नेताजी पर बनी अपनी फिल्म की शूटिंग मैंने कई विदेशी लोकेशन में की थी। आगे यदि ऎसी कोई अच्छी स्क्रिप्ट सामने आई और जरूरत हुई, तो उसे फिल्माने मैं विदेश भी जाऊंगा। हम सिर्फ बेहतर सिनेमा को अपना लक्ष्य बनाएं शेखर कपूर मुझे यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि आज भी हमारे बहुत सारे फिल्मकार यह सोचते हैं कि भारतीय फिल्मों का दर्शक वर्ग सिर्फ अमेरिका या लंदन जैसे देशों में बसता है, इसलिए सिर्फ इन देशों के मार्केट का ध्यान रखना जरूरी है। अब समय आ गया है, जब हमें विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी अपना दर्शक तलाश करना पड़ेगा। मैं फिर इस बात को पूरे यकीन के साथ कह रहा हूं कि सिर्फ हमारी फिल्में ही हॉलीवुड की फिल्मों का मुकाबला कर सकती हैं। हम इस बात को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि अगले कुछ वष्ाोüü में ही मनोरंजन उद्योग खरबों रूपये से आगे निकल जाएगा और इसका 75 प्रतिशत हिस्सा एशिया से आएगा। लिहाजा अब हमें बराबर पूरी समझदारी के साथ इन सारे मौकों का पूरा लाभ उठाना चाहिए। हम सिर्फ बेहतर सिनेमा को अपना लक्ष्य बनाएं और आगे बढ़ते रहें। इसके लिए हमें किसी की नकल करने की जरूरत नहीं है, ना ही अच्छी स्क्रिप्ट का रोना रोकर बहाने बनाने की जरूरत नहीं है। देश-विदेश का साहित्य अच्छे सब्जेक्ट से भरा हुआ है। हमें सिर्फ थोड़ी-सी मेहनत करनी है। मैं जल्द अपनी "नई फिल्म "पानी" की शूटिंग शुरू करूंगा। इसकी स्क्रिप्ट पर मैं पिछले कुछ साल से काम कर रहा था। अब जाकर मेरे मन मुताबिक स्क्रिप्ट तैयार हुई है। इसके लिए ढेरों देश में रेकी (लोकेशन ढूंढना) करने के बाद मुझे अंतत: दुबई में अपना मनपसंद लोकेशन मिला है। अभी इस फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ कहना ठीक नहीं होगा, पर कोशिश यही होगी कि यह मेरी पिछली फिल्मों से ज्यादा बेहतर बने।
भव्य कैनवस देने की बात को मैं जरूर कबूल करता हूं... प्रकाश झा मुझे कभी ऎसा नहीं लगा कि मुझे एक विशेष्ा दर्शक वर्ग के लिए फिल्म बनानी चाहिए। वैसे भी मैंने कभी किसी की बताई खास थीम पर कोई फिल्म नहीं बनाई है, जो भी सीरियस सब्जेक्ट मुझे पसंद आया, मैंने उसे ही अपनी फिल्म का माध्यम बनाया। मेरी फिल्म "मृत्युदंड" पूरी तरह से गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित थी। इससे पहले "दामुल" का बैक ड्रॅाप भी मैंने गांव रखा था। "दामुल" की तुलना में "मृत्युदंड" को ओवरसीज में बहुत ज्यादा सराहना मिली थी। जाहिर है इसकी सबसे बड़ी वजह इसका सेट-अप था। यह मेरी पहली बड़े बजट की फिल्म थी। पहली बार महसूस हुआ कि यदि मुझे अपने स्टाइल की फिल्म बनानी है, तो सिनेमा के विभिन्न आय के स्त्रोत का भी पूरा खयाल रखना होगा। खासतौर से यदि आपको ग्लोबल सिनेमा में अपना मकाम बनाना है,तो भव्यता की बात को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। यह कुछ ऎसी बात हुई कि आप उन्हें अपना दाल-चावल सोने की तश्तरी में परोस कर दीजिए, मगर बिना दाल चावल खाए, वो उसका मजा कैसे समझेंगे। अपनी पिछली फिल्म की तुलना में "राजनीति" के कई दृश्यों में मैने कई बार हजारों की भीड़ दिखाई है। ये सारे दृश्य काफी महंगे हैं। सीमित बजट के दायरे में अब हम ऎसे भव्य दृश्यों के फिल्मांकन की बात सोच रहे हैं। विदेशी लोकेशन से मुझे कोई परहेज नहीं है, पर सब्जेक्ट भी तो ऎसा होना चाहिए। मेरा खयाल है, ऎसी कोई शर्त नहीं है कि विश्व बाजार में जगह बनाने के लिए हमें अपनी फिल्मों में उनके रंग-ढंग और उनकी पृष्ठभूमि को अपनाना पड़ेगा। हां,उनसे आगे निकलने के लिए भव्य कैनवस देने की बात को मैं जरूर कबूल करता हूं। ऎसा हम अपने हित के लिए करेंगे... करण जौहर इसे आप एक दिलचस्प संजोग कह सकते है कि इधर मेरी ज्यादातर फिल्मों की शूटिंग विदेश के मेरे पसंदीदा लोकेशन में हो रही है। मेरी पहली फिल्म से लेकर अब तक बहुत सारी बातें बदली है। इस बीच हिंदी फिल्मों ने ओवरसीज मार्केट में अपनी निरंतर धाक जमाई है। इसमें कोई दबाव वाली बात नहीं है। यदि आपको किसी प्रतियोगिता में रहना है, तो आपको थोड़ा लचीला होना पड़ेगा। आप यह क्यों भूल जाते है कि हिंदी फिल्में सिर्फ होम थिएटर में नहीं देखी जाती है। दर्शक चाहे देश का हो या ओवरसीज का...सारे दर्शकों की पसंद का एक ही केंद्र है-जोरदार पारिवारिक मनोरंजन। एक ऎसी फिल्म जिसे पूरा परिवार थिएटर पर जाकर देखना पसंद करें। हमें हॉलीवुड की फिल्मों के साथ किसी भी तरह के प्रतिस्पर्धा में उतरना नहीं है। हमारी फिल्मों का तेवर एकदम जुदा है, जिसकी कद्र्र पूरा विश्व करता है। अपने तई अपनी फिल्मों को ज्यादा-से-ज्यादा भव्य लुक देकर हम ओवरसीज मार्केट को और अच्छी तरह से पकड़ सकते है। ऎसा हम इस मार्केट के लिए नहीं अपने और ज्यादा हित के लिए करेंगे। ओवरसीज का खयाल रखना होगा अनुराग बसु कॉइट्स" की हीरोइन को स्पेनिश भाष्ाा बोलते देखकर सिने प्रेमियो को बड़ा अटपटा लगा था। उनकी सुविधा के लिए ही हमने हिंदी सब-टाइटल दिया था। असल में फिल्म का सब्जेक्ट कुछ ऎसा था कि हम हीरोइन को हिंदी बोलते हुए नहीं दिखा सकते थे। आखिर सब्जेक्ट की अपनी एक मजबूरी होती है। कमर्शियल फिल्मों के नाम पर मैं ज्यादा अतिरंजित करने के पक्ष में नहीं हूं। मैं मानता हूं कि इस वजह से इसमें कुछ विदेशी टच ज्यादा आ गया था, पर इसका यह मतलब नहीं कि सिर्फ ओवरसीज मार्केट को टार्गेट करके बनाया था। जल्द ही मैं एक फिल्म की शूटिंग मुंबई के छोटे-छोटे फ्लैटों में करूंगा, क्योंकि इसकी कहानी ऎसे ही फ्लैटों में रहने वाले लोगों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। जाहहिर है मैं अपने सब्जेक्ट की हत्या कर इसे किसी विदेशी लोकेशन में शूट नहीं करना चाहता हूं, पर इसके निर्माण मूल्य के साथ मैं कोई समझौता करने के पक्ष में नहीं हूं। यहां मुझे ओवरसीज मार्केट का भी खयाल रखना पड़ेगा।
|
|
|
|
|
|
|