इस 15 अगस्त को कालजयी फिल्म "शोले" के प्रदर्शन के पूरे 35 साल हो जाएंगे। जी हां, 15 अगस्त 1975 को यह फिल्म प्रदर्शित हुई थी। हालांकि फिल्म में देशभक्ति से संबंधित कुछ भी नहीं था, मगर निर्माता जीपी सिप्पी का मकसद व संदेश वही था। सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज 35 साल बाद भी शोले के प्रति दर्शकों का क्रेज वैसा ही है, जैसा इसके रिलीज के दौरान देखा गया था। इतना ही नहीं, इससे जुड़ी यादों का पुलिंदा भी बहुत भारी है। कलाकार, यूनिट मेंबर के साथ-साथ दर्शकों तक के पास कहने के लिए "शोले" के किस्से मौजूद हैं। एफएम की इस विशेष पेशकश में प्रस्तुत है फिल्म से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें और कलाकारों की अपनी- हिंदी सिनेमा में देशभक्ति और देश-प्रेम पर कई फिल्में बनी हैं, जिनमे कुछ चलीं तो कुुछ बुरी तरह पिटी हैं। कुछ बेहतरीन फिल्मों ने तो ऎतिहासिक रिकॉर्ड भी कायम किए हैं, जैसे "आनन्द मठ", "शहीद", "हकीकत","उपकार","आंखें","हिंदुस्तान की कसम","गर्म हवा","पूरब और पश्चिम","क्रांति","मंगल पाण्डे","सरफरोश" आदि। आज इस विषय पर न के बराबर फिल्मे बन रही हैं और जो बन रही हैं, उनमें भी वह बात, वह भावना नहीं, जो पहले की फिल्मों में थी। वह जुनून नहीं, जो दर्शकों के अंदर जोश पैदा कर दे। आखिर इसकी वजह क्या है? इस संदर्भ में पेश है कुछ मशहूर फिल्मकारों की राय... मनोज कुमार मैंने देश-भक्ति पर बहुत-सी फिल्मे बनाई हैं और आगे भी बनाने का विचार है, मगर अस्वस्थता की वजह से संभव नहीं हो पा रहा है। मैं इसे सदाबहार विषय मानता हंू। इस विषय का प्रस्तुतिकरण बहुत महत्वपूर्ण है जिस पर सब कुछ निर्भर करता है। अगर पूरी लगन और ईमानदारी से फिलम बनाई जाए, तो इस विषय पर बनी फिल्म हमेशा चलेगी। आज इस विषय पर अगर कम फिल्में बन रही है, तो इसका कारण यह है कि आज का फिल्मकार जोखिम उठाने से डरता है। दर्शकों की पसंद-नापसंद को नजर-अंदाज करके सबसे पहले वह अपना बचाव पक्ष तैयार करता है। ऎसे में उसे वैसे ही फिल्में बनानी पड़ती है, जैसी दर्जनों निर्माता बना रहे होते हैं। रमेश सिप्पी मेरे खयाल से आज देश-भक्ति बिकाऊ नहीं है, इसीलिए इस विषय पर बनने वाली फिल्मों की संख्या नगण्य है। इसकी एक वजह हमारे यहां नकल करने का चलन भी है। अनुकरण करने में माहिर फि ल्मकार लीक से हटकर फिल्मे बनाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते। इसके लिए मैं यहां के उस समीकरण को भी दोषी मानता हंू, जिसके अंतर्गत दर्शकों को प्राथमिकता बनाम वितरकों की पसंद बनाम निर्माताओं की प्रस्तुति का बोलबाला चलता है। जाहिर है, देश-भक्ति पर आधारित फिल्में उक्त समीकरण पर अक्सर सही नहीं बैठतीं, इसलिए फिल्मकारों का ऎसे विषय से परहेज करना स्वाभाविक है। सुभाष घई आजादी के बाद देश-भक्ति विषयों पर अनगिनत फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें अधिकांश को दर्शकों ने नकार दिया। इसका कारण है, एक ही बात को बार-बर सामने लाना, जबकि इस विषय को और भी कई रूपों में दिखलाया जा सकता है। मैं सोचता हंू कि अगर देश-भक्ति फिल्मों को थोड़ा अलग हटकर बनाया जाए, तो उसके दर्शक भरपूर हैं। ऎसी फिल्मों के लिए सरकार को भी थोड़ी सहूलियत देनी होगी, क्योंकि इन फिल्मों के न चलने का खतरा अवश्य बना रहेगा। इस तरह के विषय वाली फिल्मों को खरीदने में वितरक भी संकोच करते हैं। अत: विकल्प के रूप में उसे टैक्स-फ्री अवश्य किया जाए। वितरकों की अरूचि के कारण यदि इस तरह की फिल्में प्रदर्शित नहीं हो पाईं, तो निर्माता ऎसी फिल्में कभी नहीं बनाएगा। जेपी दत्ता देश-भक्ति की फिल्में आज पसंद नहीं की जातीं, यह मानने को मैं कतई तैयार नहीं। मैं तो इसे ऎसा विषय मानता हंू, जो कल भी बिकाऊ था और आज भी है । जब भी ऎसी फिल्में बनती हैं, दर्शकों की भावनाएं उमड़ पड़ती हैं। हां, देश-भक्ति की सभी फिल्में हिट होंगी, यह सोचना भी गलत है। इसकी वजह यह है कि ऎसी फिल्म के प्रति संवेदनशीलता ज्यादा होती है। लिहाजा, देश-भक्ति पर आधारित फिल्म बनाते समय ज्यादा सावधान रहना पड़ता है। देश-भक्ति पर फिल्म बनाना रूमानी फिल्मों से ज्यादा कठिन है। यही कारण है कि ज्यादातर निर्माता ऎसे विषय पर फिल्म बनाने से कतराते हैं वरना ठीक-ठाक बने, तो आज भी हमारे पास देश-भक्ति फिल्मों के पर्याप्त दर्शक मौजूद हैं। तेरा क्या होगा कालिया... गोरखपुर, (उत्तर प्रदेश) के एक अत्यंत फिल्म प्रेमी दर्शक राजेंद्र यादव सिनेमा हाल में इस फिल्म को सौ से ज्यादा बार देख चुके हैं। वीडियो में यह संख्या एक हजार से ज्यादा बार हो चुकी है। उन्हें इस बात का अफसोस है कि पिछले कई साल से थिएटर में यह फिल्म दोबारा रिलीज नहीं हुई। अब यह चर्चा अप्रसंागिक है कि उन्हें "शोले" का एक-एक संवाद मुंह जुबानी याद है। पेशे से व्यवसायी राजेंद्र यादव बताते हैं,"मेरे लिए यह बताना बहुत मुश्किल है कि यह फिल्म मुझे क्यों पसंद है। मैंने जब यह फिल्म पहली बार देखी थी, मेरी उम्र बारह या तेरह साल रही होगी। आज इस बढ़ती उम्र में भी वीडियो पर इसे कम-से-कम एक बार जरूर देख लेता हूं। इसके वीडियो कैसेट, गानों और संवाद का सीडी-कैसट, लॉन्ग प्ले रिकॉर्ड, वीसीडी, डीवीडी आदि सभी कुछ मेरे संग्रह में मौजूद हैं। मुझे पूरा यकीन है कि ऎसा संग्रह इस देश के हजारों सिने प्रेमी के पास मौजूद होगा।" अभिनेता बीजू खोटे ऎसी बातों की सत्यता पर सहज रूप से यकीन करते हैं। ढेरों फिल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाओं में नजर आने वाला यह चरित्र अभिनेता आज तक "शोले" के अपने किरदार कालिया को भूल नहीं पाया है। सबसे आश्चर्यजन बात है कि पूरी फिल्म में मुश्किल से चंद संवाद बोलने वाले इस पात्र को सिने प्रेमी भी भूल नहीं पाए हैं। "शोले" के बाद बहुत बदला सिनेमा आज "थ्री इडियट््स" को अब तक की सबसे बड़ी कमाई वाली फिल्म कहा जा रहा है। क्या "थ्री इडियट््स" या कोई दूसरी बड़ी हिट फिल्म "शोले" जैसी यादें छोड़ पाएगी। "शेाले" सहित दर्जनों फिल्मों को प्रचार का जामा पहना चुके बुजुर्ग प्रचारक आरआर पाठक इस चर्चा को सिरे से ही खारिज कर देते हैं। इसमें उनका अपना तर्क होता है, "इन वष्ाोंü में सिनेमा में बहुत बदलाव आया है। "शोले" के साथ इतनी सुखद यादें जुड़ी हुई हैं कि वो शायद ही कभी धूमिल हो पाएं, क्योंकि वर्तमान या भविष्य में सिनेमा की कोई भी चर्चा "शोले" के बिना अधूरी होगी।" ट्रेड पंडित कोमल नाहटा इसे समय का एक बड़ा बदलाव मानते हैंं। वो कहते हैं,"इस फिल्म की सफलता हमेशा स्मरणीय रहेगी। आप यह क्यों भूल जाते हैं कि इस फिल्म ने कई सेंटर में सौ हफ्ते का सफर तय किया था। आज तो बड़ी से बड़ी हिट फिल्म का भी सारा खेल आठ नौ हफ्ते में सिमट जाता है। सिल्वर जुबली, डायमंड जुबली शब्द तो जैसे सिनेमा के शब्दकोश से हटते जा रहे हैं। सारी सफलता का आकलन कुल कमाई से किया जा रहा है। जाहिर है ऎसी फिल्मों की यादें भी क्षणिक बन गई हैं। कोई भी अच्छी फिल्म रिलीज होती है तो मल्टीप्लेक्स वाले उसे पंद्रह से पच्चीस शो में चलाकर एक ही हफ्ते में मुनाफा कमा लेते हैं। अब किसी को भी फिल्म की जुबली का क्रेज नहीं रहा है। "दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे" जैसी फिल्में तो सिर्फ अपवाद हैं। थियेटरवालों के पास ऎसी लॉन्ग रन में खींचने वाली फिल्में ही नहीं हैं। सभी बढ़ते तकनीक के साथ सिनेमा के इस बदलाव को कबूल कर लिया है, पर इससे सिनेमा की यादें बहुत सीमित हो गई हैं, अब कोई भी पुरानी फिल्मों को नई हिट फिल्मों के आगे याद नहीं करता है।"
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