करीब 13 साल बाद उसकी किस्मत ने कम बैक किया है। इतने सालों तक वह सिनेमा, सितारे और जिंदगी की आपाधापी में इधर-उधर दौड़ता रहा। 16 साल के फिल्मी सफर में सफलता कम, विफलता ज्यादा मिली। इस दौरान उसे कई अच्छे मौके मिले... और मान-सम्मान भी, मगर जो ऊंचाई उसे 1997 में मिली थी, वैसी ऊंचाई उसे अब जाकर नसीब हुई है। जी हां, हम बात कर रहे हैं मनोज बाजपेयी की। आलोचक मानते हैं कि मनोज ने अपनी धूमिल पड़ती किस्मत को करारा जवाब दिया है, जबकि उनके समकालीन "दुश्मन" का कहीं अता-पता नहीं है। इतना ही नहीं वर्षोü पहले फिल्म सत्या से मिला भीखू म्हात्रे का टैग भी पीछे छूट गया है... अब मनोज नए टैग वीरेंद्र प्रताप सिंह से सुर्खियों में हैं। उनके इस चरित्र में महाभारत के दुर्योधन का अक्स है, जो कभी भी किसी का प्रिय नहीं रहा, मगर राजनीति और सिनेमा का नया दुर्योधन तारीफ बटोर रहा है। सवाल यह उठता है कि इसके लिए प्रशंसा किसकी होनी चाहिए मनोज बाजपेयी की, जिन्होंने इस पात्र को जिया है या फिर निर्माता प्रकाश झा की, जिन्होंने इस पात्र को गढ़ा है। नि:संदेह दोनों ही प्रशंसा के हकदार हैं, मगर दर्शकों के लिए वह सर्वश्रेष्ठ होता है, जो परदे पर उसका मनोरंजन करता है और शायद यही वजह है कि राजनीति में आला दर्जे के कलाकारों के रहते हुए मनोज बाजपेयी ने अपने उम्दा अभिनय से एक बार फिर दर्शकों की आंखों का तारा बन गए हैं। एक कहावत है- डूबते को तिनके का सहारा... मगर मनोज के डूबते कॅरियर के लिए राजनीति नौका साबित हुई है। मनोज बाजपेयी के स्टारडम और निजी जिंदगी के बारे में जानिए, खुद उन्हीं की जुबानी... शट अप... एक फिल्म पत्रकार, मनोजजी क्या मैं आपको हिंदी फिल्मों का जेम्स बॉन्ड कह सकता हूं? यह सुनकर मनोज अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ कहते हैं, आप खुद को भ्रम में रखना चाहते हैं, तो बेशक ऎसा कह सकते हैं। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं एक बहुत ही फन लविंग इनसान हूं। मैं केवल काम के वक्त गंभीर होता हूं और पैकअप होते ही, मस्ती शुरू! लाइफ में फन मुझे इतना पसंद है कि मेरी पत्नी को दिन में कई बार मुझे "शट अप" कहना पड़ता है। न कोई सही है, न गलत... अब तक तो सबको पता चल चुका है कि राजनीति में मेरा वीरेन्द्र प्रताप सिंह का पात्र दुर्योधन से प्रभावित है। असल में महाभारत में युद्ध के लिए दुर्योधन के विरोध को मुख्य वजह माना जाता है। यहां तक की भगवान श्रीकृष्ण भी उसको समझाने में असमर्थ रहे। दुर्योधन रहस्यमय व्यक्तित्व का मालिक था। दुर्योधन के अपने नजरिए से वह जो भी कर रहा था एक दम सही था और यही महाभारत की असली खूबसूरती है। राजनीति भी इसी कारण सफल है। हर कोई अपने नजरिए से एकदम सही है और अपना कर्म कर रहा है। कोई सही या गलत नहीं... सभी अपना धर्म निभाने के लिए तत्पर हैं। हम कलाकारों ने अपना कर्म किया और प्रकाश झा ने कर्म और धर्म दोनों निभाए। असल में प्रकाश झा ने एक्टर्स की मेगा लाइन क ो बहुत ही अच्छी तरह से हैंडल किया। अजय देवगन, कैटरीना कैफ रणबीर कपूर, अर्जुन रामपाल और नाना पाटेकर जैसे धुरंधरों को एक साथ लेकर बिना किसी अड़चन के तय समय में काम पूरा करना बहुत बड़ी बात है। हमने तय समय से एक दिन भी एक्स्ट्रा शूटिंग नहीं की थी। शूटिंग के दौरान हम छोटे से होटल में एक साथ रहते थे। कभी लगा नहीं कि यह फिल्म यूनिट है, सभी फैमिली मैम्बर्स की तरह रहते थे। हम एक-दूसरे के साथ खूब मजाक करते। जाकर किसी के भी कमरे का दरवाजा खटखटा देते और वहां से चले जाते। हममें में कोई भी डेली ड्रिंकर नहीं था, इसलिए हमारी शाम जाम के नाम नहीं होती थी। हां, अक्सर शाम को नाना मटन बनाते और सबको खिलाते, जिसे खाने का मन न हो, उसे जबरदस्ती गले से नीचे उतारना पड़ता था और अगर आप तब भी नहीं खाए, तो गालियां खाओ। हम लोगों के बीच कभी तकरार नहीं हुई। उम्र और अनुभव के नाम पर कोई छोटा बड़ा नहीं था। अजय को लेकर मेरा अपना अनुभव है कि मैंने इतना सिक्योर एक्टर कभी नहीं देखा। उनके साथ काम करते हुए मैंने महसूस किया कि उनमें किसी भी तरह की असुरक्षा भावना नहीं है। वह अपने स्पेस को लेकर पूरी तरह सिक्योर रहते हैं। कमिंग अप.. मनोज की आने वाली फिल्मों में "चिटगांव अपराइजिंग"और "दस तोला" प्रमुख हैं। चिटगांव में वो क्रांतिकारी सूर्या सेन की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि मलयालम फिल्म की रीमेक दस तोला रोमांस और विश्वासघात पर आधारित है। इसमें वो सुनार की भूमिका में दिखाई देंगे। इस फिल्म के लिए मनोज ने वजन भी बढ़ाया है। मेरी हीरोइनें: वह मेरे लिए खास है जूही चावला जूही की कॉमिक टाइमिंग मुझे बेहद पसंद है। अपने समय में मिले स्टारडम को उन्होंने बहुत ही सहजता के साथ जिया है। तब्बू तब्बू में गजब का पैशन है और वो कमाल की अदाकारा हैं। इनके अभिनय में जरा भी बनावट नजर नहीं आती। हर रोल को वह दिल से जीती हैं। जब वह आपके साथ होती हैं, तो केवल आपके साथ ही होती हैं। किसी भी तरह का प्रभाव उन पर हावी नहीं रहता है।
उर्मिला मातोंडकर उर्मिला के साथ मैंने दौड़, सत्या, कौन और पिंजर में काम किया है। मैं उनका बहुत सम्मान करता हूं। वह मुझे शुरूआत से जानती हैं। वो मेरी फिल्म यात्रा का एक हिस्सा हैं, इसीलिए वह मेरे लिए खास हैं। जब वह आस-पास होती हैं, तो मैं कोई बेवकूफी भरी हरकत नहीं करता। दौड़ के दौरान मैं स्ट्रगलर था और जब वह सेट पर आती थीं, तो मैं खड़ा हो जाता था, आज भी मैं ऎसा ही करता हूं। उर्मिला फन लविंग है, किसी बात पर खिलखिलाकर हंस देना उन्हें पसंद है। मिडिल क्लास फैमिली से आकर इस इंडस्ट्री में जगह बनाना खेल नहीं है, इसलिए मैं उन्हें बहुत मानता हूं। रवीना टंडन रवीना बहुत कूल हैं। जितनी एक्ट्रैस के बारे में मैंने बात की उन सबसे कूल। शूल की शूटिंग के दौरान बिहार में हम एक सर्किट हाउस में ठहरे। हमें जब समय मिलता, खूब एंजॉय करते। वह अच्छी तरह जानती हैं कि अपने साथ और अपनी सफलता को कैसे एंजॉय किया जाता है। प्रीति जिंटा प्रीति नैचुरल एक्ट्रैस हैं। उनका व्यवहार बहुत दोस्ताना है। सबके साथ आसानी से घुल-मिल जाना और दूसरों की केयर करना उनके स्वभाव में शामिल है। मुझे लगता है कि ये एक परफेक्ट बिजनेस पर्सन की क्वालिटी है। शैफाली शाह शैफाली के साथ सत्या फिल्म में काम किया। इससे पहले शैफाली रामू के साथ रंगीला में काम कर चुकी थीं। उस दौरान उनके आपसी मतभेद हो गए थे। मैं चाहता था कि सत्या मे शैफाली ही मेरी पत्नी का रोल करें, क्योकि एक्शन-रिएक्शन में उनका जबाव नहीं। सच कहूं, तो इस फिल्म में अपनी अच्छी परफॉरमेंस के लिए मैं उनका अहसानमंद हूं। कैटरीना कैफ कैट का पालन-पोषण भले ही लंदन में हुआ हो, मगर दिल से वह एकदम भारतीय हैं। कैट बहुत ही स्पष्टवादी हैं, और अगर आप भी अपनी बात साफ-साफ शब्दों में कहने वाले हों, तो उनके साथ अच्छी दोस्ती हो सकती है। अगर आप चीटिंग करेंगे, तो वह भाग खड़ी होंगी। राजनीति फिल्म में उन्होंने बहुत मेहनत की है। उनके हर डायलॉग से पहले प्रकाश झा उन्हें पूरी सिचुएशन एक्सप्लेन करते और डायलॉग समझाते। हर शाम एक हिंदी टीचर उन्हें पढ़ाने आता था। कमीने की चाहत... सत्या, अक्स, शूल और पिंजर जैसी फिल्मों में दमदार अभिनय के बावजूद मेरे काम को खास तवज्जो नहीं मिली। मैंने विशाल भारद्वाज से कमीने में खुद को कास्ट करने के लिए कहा था। इस पर उनका कहना था कि वह मेरे साथ इससे अलग और कुछ मैजिकल करना चाहते हैं। मैं नहीं जानता कि वह मैजिक कब होगा... वैसे मैं और नीरज पाण्डे भी काफी समय से एक-दूसरे के साथ काम करना चाह रहे थे, लेकिन यह तभी संभव हुआ, जब इसे होना था। मुझे दिबाकर बनर्जी की ओए लकी, लकी ओए भी बहुत पसंद आई। नहीं बदल सकता मैं... पूरे आत्मविश्वास के साथ मैं पिछले 16 सालों से खुद में कोई बदलाव किए बगैर इंडस्ट्री में टिका हुआ हूं, फिर मैं खुद को क्यों बदलूं? हां, इतना जरूर है कि जब मुझे किसी की कोई बात पसंद नहीं आती, तो मैं खुद को शांत रखने की कोशिश करता हूं और दिमाग को सकारात्मक विचारों से भरने की कोशिश करता हूं। फिर भी इस तरह की बातें कई बार मुझे रातों को सोने नहीं देती। अगर मैं ऎसा हूं, तो मैं उन लोगों की प्रशंसा करता हूं, जो मेरे इसी रूप में मुझे स्वीकार करते हैं। मेरा मानना है कि किसी के पीठ पीछे कुछ कहने से बेहतर है सलीके के साथ वही बात उसके सामने कह दी जाए। हो सकता है, मेरी इस हरकत से मुझे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा हो...सच कहूं, तो आता हुआ पैसा किसे अच्छा नहीं लगता... बशर्ते यह आपकी सोच पर हावी न हो। मेरी जरूरतें बहुत सीमित हैं, फिर भी बीमारी के समय हर किसी की तरह मैं भी चाहूंगा कि मेरा इलाज किसी बढिया हॉस्पिटल में होना चाहिए। आखिर इतनी लग्जरी का तो मैं भी हकदार हूं। रामू, तूने बहुत दिया कभी कुत्ते-बिल्ली की तहर हमारा झगड़ा नहीं हुआ। हां, कई बार मैं उनकी बातों से अहसमत होता हूं , फिर मैं अपने दिमाग को समझाता हूं कि कम से कम रामू से सहमत हो जा... हो भी क्यों न जाऊं, आखिर रामू ने मुझे बहुत कुछ दिया है। यह तो रामू का बड़प्पन है कि वो इसे मानने से ही इनकार करते हैं कि उन्होंने मेरे लिए कुछ किया है। अब हमने डिसाइड किया है चाहे हम साथ काम कर रहे हों या नहीं... एक-दूसरे से बातें करना बंद नहीं करेंगे। वैसे रामू की जितनी तारीफ की जाए, कम होगी। बेशक उनका टाइम अच्छा नहीं चल रहा है, मगर इसमें कोई दोराय नहीं कि वो हमारी इंडस्ट्री के बेहतरीन फिल्म मेकर्स में से हैं। उन्होंने फिल्म मेकिंग को एक नई भाषा दी है, साथ ही कई नई प्रतिभाएं भी। मैं, मेरी बातें... मुझे अपने पैतृक गांव में घूमना, साइकिल चलाना, बाजार में बैठना अपने रिश्तेदारों से बातें करना बहुत पसंद है। टीवी पर मैं सॉकर, क्रिकेट और फिटनेस प्रोग्राम देखता हूं। मेरी पत्नी को दर्शक नेहा नाम से जानते हैं, जो कि फिल्म करीब और राहुल से उन्हें मिला। इनका असली नाम शबाना है। शबाना हमेशा मुझे जमीन से जोड़े रखती हैं। शबाना मुझसे कहती है "बस अपना काम करो और नॉर्मल रहो"। मैं धीरे-धीरे आध्यात्मिक हो रहा हूं। पहले मैं भगवान में विश्वास नहीं करता था, जबकि अब हर रोज सुबह उठकर पूजा करता हूं। मुझे लगने लगा है कि हमारे अच्छे या बुरे कामों का फल कोई दिव्य शक्ति हमें देती है। यह परिवर्तन भी शबाना के कारण ही हुआ है। जब हम साथ होते हैं, तो हमारा ज्यादातर समय फिल्में देखने और पॉलिटिक्स की बातें करने या फिर रेस्टोरेंट में गुजरता है। शबाना पर फिल्मों में काम करने या न करने की कोई बंदिश नहीं है। उन्हें जो अच्छा लगे, वह शौक से कर सकती हैं, क्योंकि उन्हें काम रोजी- रोटी के लिए नहीं करना...उसके लिए मैं हूं ना। -प्रस्तुति: गरिमा सिंह
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