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Saturday, 19 May, 2012
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संगीत मेरी रग-रग में है...
Sunday, January 22, 2012, 09:54 hrs IST
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अक्सर कहा जाता है कि किसी भी उभरते हुए कलाकार के लिए फिल्म संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना पाना या लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसी महान पाश्र्व गायिकाओं की जोड़ी के बीच से ब्रेक-थ्रू कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन करीब 30 साल पहले कम उम्र की खनकती हुई आवाज वाली एक ऎसी गायिका का इस श्रेत्र में पर्दापण हुआ, जिसने बहुत जल्द न सिर्फ अपनी एक अलग पहचान बनाई, बल्कि एक खास मुकाम भी हासिल किया। आज भी वे फिल्मों में नियमित रूप से गा रही हैं और सफलतम पाश्र्व गायिका हैं। नाम है कविता कृष्णमूर्ति। आइए कविता से जानते हैं उनके निजी जीवन की कुछ खास बातें और फिल्मों में आने की कहानी...

मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूं। खास उत्तर भारतीय ढंग से। मेरे आस-पास का वातावरण और परिवेश सभी कुछ उत्तर भारतीय था। दरअसल मेरे माता-पिता दक्षिण भारतीय जरूर हैं, मगर चाची ने मुझे गोद ले लिया था। वे मेरे पिता के दोस्त थे और बंगाली थे। लिहाजा मेरे पालन-पोष्ाण का ढंग आधा बंगाली और आधा दक्षिण भारतीय रहा। मैंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत श्री बलराम पुरी से सीखा। इसके अलावा गौतम मुखर्जी और अन्य गुरूओं से भी सीखने का सौभाग्य मिला। मैंने गकाल नहीं सीखी, ना ही कभी गकाल गायकों की लीक पर चलने की कोशिश की। मैं पाश्र्व गायिका बनना चाहती थी। गजल गायक अक्सर टाइप्ड और सीमित हो जाते हैं और मैं सिर्फ गकाल या भजन नहीं, हर तरह के गीत गाना चाहती थी।

मुझे मुम्बई आने की प्रेरणा हेमा मालिनी की मां से मिली। श्रीमती जया चक्रवर्ती और मेरी चाची अच्छी सहेलियां थीं। चीजें और घटनाएं खुद-ब-खुद घटने लगीं। बात है 1970 की, जब मैं कॉलेज में थी। तबसे मैं मन्ना डे और हेमन्त दा के साथ स्टेज पर संगीत मंडली के लिए गाती थी। उसके बाद आरोही कार्यक्रम द्वारा मुझे दूरदर्शन पर गाने का मौका मिला। इसके बाद 1976-77 में लोगों ने मुझे नोटिस किया और मैंने निश्चय किया कि मैं पाश्र्व गायिका ही बनूंगी। अपनी महत्वकांक्षा को पूरा करने के लिए मैंने हर सम्भव प्रयास करना शुरू कर दिया। फिर 1982-83 में फिल्म प्यार झुकता नहीं के बाद से मुझे खूब लोकप्रियता मिली, लेकिन अगर सही-सही देखा जाए, तो मैं गायन के क्षेत्र में काफी समय से हूं और मैंने रेडियो जिंगल्स भी गाए हैं, आज भी गाती हूं।

मेरा पहला हिन्दी गीत 1977 में कादम्बरी फिल्म के लिए था, जिसमें मैंने शबाना आजमी के लिए प्ले बैक किया था। यह गाना मौलिक नहीं था, बल्कि लताजी का गाया हुआ आएगा आने वाला... शीष्ाüक मशहूर गीत था। इसके बाद 1979-80 में मैंने लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल के लिए मांग भरो सजना फिल्म का एक गाना गाया। इसी बीच मैंने लताजी के लिए कई गाने भी डब किए, लेकिन फिल्म में लताजी के ही गाने रखे गए। उसके बाद 1982-83 में मुझे लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल द्वारा स्वरबद्ध किया एक गीत गाने को मिला, फिल्म प्यार झुकता नहीं के लिए । यह गीत था- तुमसे मिलके ना जाने क्यूं, और भी कुछ याद आता है... और उसके बाद से मुझे नियमित रूप से गाने मिल रहे हैं। मेरे पास जो भी गीत आता है, मैं उसे गा देती हूं। यह मालूम करना मेरे लिए सम्भव नहीं होता कि वह गाना किसी के द्वारा रिजेक्टेड है या नहीं। मैं किसी भी आर्टिस्ट के लिए प्ले बैक देने को तैयार हूं, चाहे वह नया हो या पुराना। हालांकि मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने श्रीदेवी के लिए काफी गीत गाए। कुछ लोग किसी खास आवाका को पसंद करते हैं, तो कुछ गीत के शब्दों और संगीत पर अधिक ध्यान देते हैं, लेकिन गांव में रहने वाली आम जनता गीत की प्रस्तुति या आवाज को कोई खास महत्व नहीं देती। गाने वाली चाहे कविता हो या रीता या सुनीता... उनका ध्यान गीत के बोल, संगीत और पूरी बंदिश की ओर ज्यादा रहता है, इसलिए कई बार मशहूर गाने अंजान गायकों द्वारा गाए जाने पर भी उन्हें पसंद आते हैं।

पुराने जमाने में उस वक्त का मशहूर गीत- लागा चुनरी में दाग...सही मायनों में गायक का गीत था। आज ऎसा सिर्फ आंशिक रूप से ही सच है। व्यक्तिगत रूप से मुझे तो सीखे हुए, मझे हुए प्रशिक्षित गायक ही पसंद हैं। मैं यह भी मानती हूं कि भाष्ाा किसी भी गायक के लिए बाधक नहीं होती। भिन्न भाष्ााओं में गीत गाना न सिर्फ रोचक होता है, बल्कि यह गायक के अनुभव जगत को विस्तार भी प्रदान करता है। मैं लुप्त होना नहीं चाहती। बहुत महत्वाकांक्षी हूं मैं। संगीत मेरी रग-रग में, मेरी हर सांस में रचा बसा है। मैं जरूर चाहूंगी कि मैं यहां एक लम्बे अरसे तक बनी रहूं। मैं न नम्बर एक होना चाहती हूं, ना ही यह चाहती हूं कि लोग मुझे भूल जाएं, मैं विस्मृत कर दी जाऊं । अपनी एक अलग पहचान बना सकूं, मेरे गाए गीतों का अलग ही प्रभाव हो, यह मेरी इच्छा है।

-ठाकुरदास खत्री
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