मैं कई साल से इस शो को देखता आ रहा हूं। मैं देखता था कि किस तरह देश की प्रतिभाएं अपने हुनर को दिखा रही हैं। मैं इस बात को भी अच्छे से ऑब्जर्व करता था कि जजेज इन टैलेंट्स को आगे बढ़ने का अवसर कैसे देते हैं। शायद यही वजह है कि मैंने बहुत ही सहजता से इस ऑफर को स्वीकार कर लिया।" मैंने संगीत पर आधारित दूसरे रिएलिटी शोज भी देखे हैं। उस समय मुझे बहुत बुरा लगता था, जब जज प्रतिभागी के सुर संबंधी गलती को हल्के में ले लेते थेे, साथ ही उसे अच्छे कमेंट्स देते थे ताकि वह अपसेट न हो जाए। अगर मैं उनकी जगह जज होता, तो प्रतिभागी को बताता कि वह कहां गलत था और सही क्या है। मेरा मकसद उनकी गलती को सुधारना होता, चाहे इसके लिए मुझे उनके साथ कितना ही कठोर क्यों न होना पड़ता। मेरा मानना है कि सुर भगवान की देन है, यह बात कोई खास मायने नहीं रखती कि आपको किस तरह ट्रेंड किया गया है। ट्रेनिंग से आप किसी बेसुरे को सुरीला गायक नहीं बना सकते। मैं सा रे गा मा पा में आने वाले प्रतिभागियों की क्वालिटी पर भी खासा ध्यान दे रहा हूं। हमें कुछ अमेजिंग टैलेंट मिले हैं। वे केवल सुर में ही नहीं गाते, बल्कि उन्हें ट्रेंड भी अच्छी तरह किया गया है। शो में महाराष्ट्र की एक प्रतिभागी है, जिसमें गजब की प्रतिभा है। इतनी कम उम्र में वह इतना बेहतरीन गाती है कि पहली बार जब मैंने उसे आशा भोंसले का गाया और गुलाम नबी का लिखा गीत गाते हुए सुना, तो हैरान रह गया। मैं सोचने लगा इस छोटी उम्र में यह इतना अच्छा गाती है, तो बड़ी होने पर कितना सुरीला गाएगी। इस सीजन में एक और प्रतिभागी है नामदेव। यह फिजिकली चैलेंच्ड है। वह व्हील चेयर के सहारे चलता है, पर कमाल का गाता है। इसका गाना सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। इस शो की खासियत यह है कि यहां से जो प्रतिभागी निकलता है और यदि वह वाकई टैलेंटेड है, तो उसे अपनी पहचान बनाने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। उदाहरण के तौर पर पिछले सीजन के प्रतिभागियों को ही देख लीजिए, उनमें से कई प्लेबैक सिंगिंग में पहचान बनाने में सफल रहे हैं। मेरे खयाल से एक उभरते हुए गायक के लिए सा रे गा मा पा से अच्छा कोई और मंच नहीं हो सकता। यूं तो हर चैनल में एक रिएलिटी शो चल रहा है, मगर यह अब चैनलों का धंधा बन चुका है, जो शायद ज्यादा दिनों तक न चले...जो प्रतिष्ठित हैं, वही जिंदा रहेंगे। असल में मुझे लगता है कि एक रिएलिटी शो के बाद सब खत्म, किसी को भी प्रतिभागियों से कोई मतलब नहीं रहता। प्रतिभागी मुम्बई में भटकते हुए हर उस दरवाजे को खटखटाते हैं, जहां से थोड़ी भी मदद की संभावना होती है। हर उस चौखट पर जाते हैं, जहां से कोई अवसर मिल सकता है। फिल्म इंडस्ट्री के अधिकतर लोग उन्हें मौका देने का झूठा वादा करते हैं। मुम्बई में आपको बहुत स्ट्रगल करना पड़ता है। यहां रहने के लिए बहुत पैसे की जरूरत होती है। मैं जानता हूं कि इनमें से अधिकतर प्रतिभागी स्टेज शोज कर रहे हैं। एक फिल्म के लिए गाने पर उन्हें पैसा भी बहुत कम मिलता है, जबकि स्टेज शो से ये अपना खर्च चलाने के लिए पर्याप्त पैसा कमा लेते हैं। लिहाजा हम बहुत से प्लेबैक सिंगर्स को स्टेज शो करते हुए देख सकते हैं।
|
|
|
|
|
|
|