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मैं एक अजर-अमर जोकर
Sunday, December 18, 2011, 11:21 hrs IST
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हंसना-हंसाना एक अच्छी बात है, मगर आदमी को अकेले रोना पड़ता है। फिल्में बनाना सपने बेचने जैसा काम है। यह काम बॉलीवुड के ग्रेट शो-मैन राज कपूर ने बखूबी किया। राज कपूर आज हमारे बीच नहीं हैं, मगर अपनी फिल्मों के द्वारा उन्होंने समाज को जो संदेश, जो विचार दिए हैं, वे आज भी अजर-अमर हैं। सिनेमा के प्रति पूर्णत: समर्पित रहे इस महान फिल्मकार के बारे में आइए जानते हैं उनके अपने कुछ खास विचार, जो उन्होंने एक साक्षात्कार के दौरान व्यक्त किए थे...

कहते हैं कि आदमी दुनिया में उघाड़ा आता है और उघाड़ा जाता है। मैं तो रहता ही उघाड़ा हूं। मेरा जीवन खुली किताब है। छिपाने को मेरे पास कुछ नहीं है। फिल्में मेरा जीवन हैं। फिल्में बनाकर मेरी आत्मा को तसल्ली मिलती है। अगर मैं फिल्में नहीं बनाता, तो इस दुनिया को ठीक तरह से नहीं जान पाता। अपने गीतों में मुझे-जीना यहां मरना यहां, इसके सिवाय जाना कहां... सबसे अच्छा लगता है। मुझे जो कुछ मिला, सिनेमा के जरिए मिला। मैं सिर्फ इसलिए हिन्दू नहीं कि हिन्दू परिवार में जन्मा।

हिन्दू होने के नाते एक महान जीवन-दर्शन मुझे विरासत में मिला है। मैं उसी सर्वव्यापी चेतना का अंश हूं, जिसे हिन्दुत्व कहा जाता है। मेरा अपना भी एक ब्रह्मांड है, जिस पर मेरा नियंत्रण है। मेरे ब्रह्मांड में मेरे अनेक विश्व हैं। मैं एक अजर-अमर जोकर हूं और लोगों का मनोरंजन मेरा धर्म है। मैं वह मुसाफिर हूं, जो एक बार ही आता है, नाच-गाकर लोगों के दिलों को खुशी से भर देता है और यह देखकर कि आप जी भरकर हंस लिए, चला जाता है।

हंसना-हंसाना सर्वोत्तम औष्ाधि है। आप हंसो, तो दुनिया भी आपके साथ हंसती है। रोओ, तो आपको अकेले रोना पड़ता है। फिल्में बनाना सपने बेचने के समान है। राजनेता भी यही करते हैं। दर्शक हीरो में आत्मछवि देखता है। हीरो के कारनामे देखकर उनकी आंतरिक पीड़ा कम होती है। इसीलिए दर्शकों को खुश करने वाले सिनेमा को पलायनवादी सिनेमा कहा जाता है। मेरा सिनेमा प्रेम का सिनेमा है। अपनी सारी मनोभावनाओं और खुशनुमा आशाओं को मैं अपनी कृतियों में उंड़ेल देता हूं और पूरा खाली हो जाता हूं।

तब मुझे बहुत अकेलापन लगता है। ईश्वर को धन्यवाद कि मैं ज्यादा पढ़ नहीं पाया और किताबी कीड़ा नहीं बना। मैं मूरख और मसखरा ही भला साधारण आदमी होने के कारण मैं आम-जन से जुड़ सका। उनके साथ हंस-बोल सका, उनके दर्द को समझ सका। मैं फुटपाथ पर बैठकर भ
ी उनकी खुशी में शरीक हो सकता हूं। यही संवेदना मुझे खूबसूरत लोगों के पास ले गई। जवानी में रूमानियत और संवेदनशीलता साथ-साथ चलती है।

मेरे बचपन की स्मृतियों में अनुभवों के खरोंचों की अमिट रेखाएं हैं। मैं मोटा था, इसलिए हर तरह के व्यावहारिक मजाक मुझसे किए जाते। कुछ सुखद धब्बों के अलावा सब कुछ दुर्भाग्यपूर्ण ही था। ये सुखद धब्बे थे समय-समय पर लड़कियों के प्रेम में पड़ जाने के। दुर्भाग्य को भुलाने के लिए मैंने वही डिफेंस-मैकेनिज्म अपनाया, जिसे दुनिया के सारे जोकर अपनाते हैं। मैं जानता था कि जितना चिढ़ोगे, उतने चिढ़ाए जाओगे और दुख भोगोगे, इसलिए मैंने अपने चेहरे पर जोकर का अदृश्य मुखौटा चढ़ा लिया।

मजाक उड़ाए जाने पर मैं ऎसे बनता, मानो उन चुटकुलों का ईजाद करने लगा, जिससे मेरे साथियो का मनोरंजन हो। मुझे भी अन्य सभी स्कूली बच्चों की तरह प्यार-मोहब्बत और मान-सम्मान की तलाश थी। मैं चाहता था कि मुझे पसंद किया जाए। मुझमें प्रेम करने और कराने की अपार क्षमता थी, इसलिए मैं एक बार, दो बार, तीन बार यानी बार-बार प्रेम में पड़ता चला गया। इन अनुभवों से मैं अपने जीवन-दर्शन की रूपरेखा गढ़ने लगा। सबकी नजरों में चढ़ने की कोशिशें करता और इसके लिए कभी-कभार कोई हास्यस्पद ऊटपटांग हरकतें भी। मैं एक के बाद दूसरी ऎसी कोई मजाकिया हरकत करता कि लोगों की ही-ही ठहाकों में बदल जाए। सीन चुराने के आरंभिक सबक मैंने इसी तरह सीखे। अपने अनुभवों के इसी खजाने का उपयोग कालांतर में मैंने अपनी फिल्मों में किया।

-प्रस्तुति: ठाकुरदास खत्री
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