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Saturday, 19 May, 2012
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वो जब याद आए बहुत याद आए
Sunday, January 15, 2012, 09:10 hrs IST
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Mohammed-Rafi
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जब तक लोग प्यार करना, प्यार में डूबना और उसमें खोए रहना जारी रखेंगे, तब तक मोहम्मद रफी सुने जाते रहेंगे...यह कहना है शाहिद रफी का। ये मोहम्मद रफी साहब के सबसे छोटे बेटे हैं। रफी साहब अलग-अलग तरीके से हजार बार आई लव यू बोल सकते थे। दिलीप कुमार से लेकर ऋçष्ा कपूर तक, फिल्म में हीरोइन को मनाने में इन्होंने अभिनेताओं की मदद की है। अपने गीतों के जरिए सबके दिलों पर राज करने वाले मोहम्मद रफी उस्ताद मेहदी हसन की गजल गुनगुनाया करते। उनका पसंदीदा गीत दुलारी फिल्म का सुहानी रात ढल चुकी...था। मोहम्मद रफी के जीवन के कुछ अनछुए पन्ने, पलट रहे हैं उनके बेटे शाहिद रफी...

दिल जो न कह सका, वही राज-ए-दिल
कहने की रात आई...
बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि 1980 में अपने पिता की मौत के बाद शाहिद रफी ने 1998 से 2005 के बीच अपने तीन बड़े भाई शईद, खालिद और हामिद को खो दिया। ये सभी लंदन में रहते थे। तीन बहनों में सबसे बड़ी परवीन भी लंदन में ही रहती हैं। नसरीन मुम्बई में अपना बूटीक चलाती हैं और यासमीन का घर उनके पड़ोस में ही है। शाहिद स्वीकार करते हैं कि उनके पिता ने उनके जीवन और कॅरियर दोनों को बना दिया। शाहिद शो होस्ट करते हैं और वहां मोहम्मद रफी साहब के गाने गाते हैं। इन्होंने मोहम्मद रफी एकेडमी लॉन्च की है और जल्द ही मोहम्मद रफी की बॉयोग्राफी लॉन्च करने की प्लानिंग है। शाहिद स्वीकार करते हैं कि उनके पिता ने कभी गाने के लिए अपने बेटों को प्रोत्साहित नहीं किया।

वह चाहते थे कि हम उनसे बेहतर करें, वह हमें औसत या सामान्य दर्जे का नहीं बनाना चाहते थे। शायद इसलिए कि वह जानते थे कि उनके बच्चों की तुलना उनसे जरूर की जाएगी। जिस तरह रफी साहब गाते थे आज की जनरेशन के गायक भी वैसा नहीं गा पाते। वह कहते हैं, "हमें उनकी हरकत लेने में तकलीफ होती है।" शाहिद अपनी बात जारी रखते हैं, अब्बा की आवाज की कॉपी करना आसान नहीं है। फिल्म आई मिलन की बेला के उनके गाए गीत तुम कमसिन हो नादान हो नाजुक हो... के हर शब्द में आपको इमोशन का अलग शेड देखने को मिलेगा। आश्चर्य की बात है कि बॉलीवुड के गीतों की दुनिया के सरताज ने संगीत की कहीं से कोई फॉर्मल टे्रनिंग नहीं ली। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिए तकरीबन 4500 गीत गाए।

चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे
फिर भी कभी अब नाम को तेरे
आवाज मैं ना दूंगा...
लाहौर में अपने मुहल्ले में गा रहे एक फकीर को देखकर रफी के मन में गाने की इच्छा प्रबल हो उठी। उस फकीर के हाथ में इकतारा था, जिसे बजाते हुए वह सूफी गीत गा रहा था। अब्बा को उसकी आवाज बहुत अच्छी लगी। वह उससे इतने प्रभावित हुए कि उसके गाने की नकल करते हुए उसके पीछे चलने लगे। वह फकीर एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया और अब्बू भी उसी पेड़ के नीेचे बैठकर सुनते रहे और शाम को घर लौटे। घर लौटकर भी वह वही सब गाने और बताने लगे, जो उन्होंने सुना।

लेकिन उनकी दादीमां गाने-बजाने के खिलाफ थीं। रफी साहब जब 15 साल के थे, तब लाहौर में स्वर्गीय के.एल. सहगल साहब के शो में गए। रफी साहब उनके बहुत बड़े फैन थे। इस शो के दौरान अचानक लाइट चली गई। अंधेरा होते ही ऑडियंस बेचैन हो गई। तभी किसी ने अब्बा को गाने का सुझाव दिया, अब्बा गाने लगे...ऑडियंस में कम्पोजर श्याम सुन्दर भी बैठे हुए थे। अब्बा का गाना सुनने के बाद उन्होंने मेरे अंकल से कहा,"इस लड़के को मुम्बई लेकर आओ"। अब्बा का पहला असाइनमेंट श्याम सुन्दरजी की 1944 में रिलीज पंजाबी फिल्म गुलबलचो का था। उनकी पहली हिन्दी फिल्म भी श्याम संदर की ही फिल्म गांव की गोरी थी, जो 1945 में आई, लेकिन रफी साहब के हिस्से प्रसिद्धी आई 1947 में प्रदर्शित श्याम सुन्दर की ही फिल्म जुगनू से।

इस फिल्म के लिए इन्होंने यहां बदला वफा... का गीत गाया, जिसमें इनका साथ मरहूम नूरजहां ने दिया। इसके बाद से लगातार तीन दशक तक रफी गाते रहे। उन्होंने लगभग हर कम्पोजर के साथ काम किया। मरहूम कम्पोजर नौशाद साहब उनकी प्रतिभा का पूरी तरह इस्तेमाल करते थे। शाहिद बताते हैं, अब्बा ने अपने मस्ती भरे गीत जैसे फिल्म गंगा जमुना का गीत- नैन लड़ गए हैं ... फिल्म संघष्ाü का गीत- मेरे पैरों में घुंघरू ..., रोमांटिक सॉन्ग जैसे फिल्म लीडर का- एक शहंशाह ने बनवा के...,और आध्यात्मिक गीत जैसे बैजू बावरां का- दुनिया के रखवाले...। मदन मोहनजी ने हीर-रांझा में ये दुनिया ये महफिल...में उनसे बहुत अच्छे तरीके से टेप किया। इस गाने का हर अंतरा अलग और राग पर आधारित है।


तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नजर न लगे
चश्मे बद्दूर
मुखड़े को छुपा लो आंचल में कहीं मेरी नजर न लगे
चश्मे बद्दूर...
शाहिद कहते हैं, "कोई भी सेलिब्रिटी अब्बा से मिलने घर नहीं आती थी। हमारे लिए वह केवल हमारे अब्बा थे। प्यार से बात करने वाले जमीन से जुड़े इंसान। बेशक हम उनसे बहुत डरते भी थे, जैसे ही वह घर में आने वाले होते थे हम "अब्बा आ गए..." जोर से चिल्लाते हुए अपने कमरों में चले जाते और वह अम्मी बिलकिस बानो से पूछते, "बच्चे मेरे साथ बैठते क्यूं नहीं हैं?" हालांकि अब्बा हमारे साथ बहुत समय बिताते थे। हमारे साथ कैरम खेलते, पंतग उड़ाने का उन्हें बहुत शौक था। वह नौशाद साहब के साथ पतंग उड़ाया करते और हम उनकी फिरकी पकड़ते। वह अक्सर नौशाद साहब के साथ बांद्रा के जिम में बैडमिंटन खेला करते। लोनावाला के बंगले में हमारा परिवार वीकएंड पर बहुत मस्ती करता। अक्सर रविवार को अब्बा हमें कोई सरप्राइज देते। वह खुद गाड़ी चलाते और हमें घूमाने ले जाते, कभी हमारे साथ स्विमिंग करते।

अम्मी अब्बा की प्रसिद्धी को बहुत ही सहज ढंग से लेतीं। अम्मा-अब्बू की जब शादी हुई, उस समय अब्बू प्रसिद्ध नहीं थे। दूसरे वह उनकी बुद्धिमत्ता को पूरी तरह नहीं जानती थीं। फिर भी अब्बा हमेशा कहते, "मेरी कामयाबी में मेरी बीवी का हाथ है।" अम्मा अब्बू के साथ तड़के ही जाग जातीं, नमाका अदा करने के बाद अब्बू रियाज में लग जाते। अपने संघष्ाü के दिनों में जब अब्बा भिंडी बाजार में रहते थे, जहां से सुबह चार बजे उठकर वह चौपाटी पर जाते और घड़ा बजाते हुए रियाज करते। कहना चाहूंगा कि अम्मा और अब्बू के बीच बहुत अच्छा तालमेल था।

जब कभी अब्बा अपसेट होते, अम्मा बिना कहे ही समझ जाती थीं कि वह किस बात को लेकर परेशान हैं। अब्बा पूरी तरह पारिवारिक व्यक्ति थे। वह कभी सामाजिक नहीं बने, ना तो उन्हें शराब का शौक था, ना ही महिलाओं में उनकी दिलचस्पी थी। हर चीज से उनकी एक निर्घारित दूरी रही। यहां तक कि फिल्म फेयर समारोह में शरीक होने के बाद भी सीधे घर आते। किसी भी समारोह में डिनर के लिए वह तभी रूकते अगर उनका परिवार वहां होता। अम्मी को चिढ़ाते हुए वह कभी-कभी फिल्म ससुराल का गाना गाते, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नजर ना लगे...।

बाबुल की दुआएं लेती जा,
जा तुझको सुखी संसार मिले
मयके की कभी ना यााद आए,
ससुराल में इतना प्यार मिले...
प्रोफेशनल लाइफ में भी विवादों से दूर रहते। यहां तक कि वह अपनी गायक मित्र मंडली के साथ भी कभी रॉयल्टी के लिए प्रोड्यूसर्स से नहीं उलझते थे। उन्हें लगता था कि उनके काम के लिए जो पैसा उन्हें म्यूजिक डायरेक्टर्स द्वारा दिया गया है वह पर्याप्त है। शाहिद अपनी बात जारी रखते हैं, "हालांकि कम्पोजर एस डी बर्मन के साथ अब्बू की कुछ मतभेद हो गए थे, मगर बाद में सब सुलझ गया और अब्बू ने ज्वैल थीफ के लिए सुपर हिट गीत दिल पुकारे आरे आरे...दिया। मैं कहना चाहूंगा कि अब्बू और किशोर दा के बीच कोई दुश्मनी नहीं थी। किशोरदा अब्बू के लिए कहा करते, "हम गायक अपने गले से गाते हैं, लेकिन रफी साहब दिल से गाते हैं" कम बोलने वाले रफी साहब कभी-कभी अपना दर्द संगीत के जरिए बयां करते । शाहिद कहते हैं, "अब्बा की आवाज में दर्द था। परवीन बाबी से अब्बा का गहरा लगाव था, वह उनके जिगर का टुकड़ा थीं, फिर भी उनकी शादी में बिदाई के दौरान अब्बा नहीं रोए, जबकि कम्पोजर रवि साहब के साथ फिल्म नील कमल के गाने बाबुल की दुआएं लेती जा...के दौरान आखिरी अंतरे में अब्बा फूट-फूटकर रो दिए।

वो जब याद आए, बहुत याद आए
गम-ए-जिंदगी के अंधेरे में हमने
चिराग-ए-मोहब्बत जलाए-बुझाए...
अब्बा ने अपने पीछे संगीत का भंडार ही नहीं, अच्छाइयों का खजाना भी छोड़ा है। उनके सीधे हाथ को पता नहीं होता था कि उनका उल्टा हाथ क्या कर रहा है। उनकी मृत्यु के कुछ दिन बाद किसी गांव से एक आदमी आया और अब्बू से मिलने के लिए कहा। जब उन्हें बताया गया कि वह अब जीवित नहीं है, तो वह बोला, "ओह, इसलिए मदद के तौर पर उनकी तरफ से पैसे आने बंद हो गए।"अहमदाबाद का उनका एक फैन उनकी कब्र से मिट्टी उठाकर ले गया, जिससे अपने घर में मूर्ति बनाकर वह उनकी पूजा करता। हर रविवार को बहारी व्यक्तियों को भी वहां जाने की छूट होती है। लोग वहां दुआ मांगते...उनका कहना था कि उनकी दुआएं पूरी भी होतीं। शाहिद आगे कहते हैं, "अब्बू ने ज्यादातर भजन गाए हैं, जैसे दुनिया के रखवाले... और मन तड़पत... बैजू बावरा के लिए। दुख के सब साथी ...फिल्म गोपी के लिए, मन रे तू काहे ना...चित्रलेखा के लिए, इन सभी गीतों को उन्होंने पूरी श्रृद्धा से गाया।

तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है
कि जहां मिल गया
एक भटके हुए राही को कारवां मिल गया...
शम्मी कपूर कि लिए फिल्म जंगली में याहू... गीत गाकर 60 के दशक में अब्बा याहू कपूर की आवाज बन गए। स्टार्स की एनर्जी के साथ उनके गायन का बहुत बारीकी से मेल हो जाता था। इसके बाद शम्मी साहब ईवनिंग इन पेरिस, प्रिंस, बह्मचारी, छोटे सरकार आदि फिल्मों मेंं शम्मी साहब के गीतों को आवाज दी। शम्मी साहब अब्बा की हर रिकॉर्डिग के दौरान मौजूद रहते। केवल एक गाना आसमान से आया फरिस्ता... के दौरान के शम्मी साहब नहीं थे। लेकिन जब उन्होंने यह गाना सुना, तो चकित रह गए, क्योंकि यह बिलकुल उसी अंदाज में गाया गया था जैसा वह चाहते थे।

उन्होंने अब्बा से पूछा कि आपने कैसे मैनेज किया तो अब्बा बोले, "मुझे क्या करना था, शम्मी एक टांग इधर फेंकेगा...एक टांग उधर फेंकेगा, यही सोचकर मैंने गा दिया।" सत्तर से अस्सी के दशक में आर डी बर्मन और किशोर कुमार को बहुत पॉपुल्ौरिटी मिली। उनके अधितर गीत सुपर स्टार राजेश खन्ना के लिए होते। इस दौरान रफी साहब का कॅरियर उतार पर था। हालांकि इस बीच भी उन्होंने फिल्म यादों की बारात के लिए चुरा लिया है तुमने जो दिल को... फिल्म हंसते जख्म के लिए, तुम जो मिल गए हो...और लोफर के लिए, आज मौसम बड़ा बेईमान है...आदि गीत दिए। सरगम, लैला मजनूं और कर्ज के उनके गीत श्रोताओं के दिलो दिमाग पर छा गए।

तेरी दुनिया से दूर, चले होके मजबूर,
हमें याद रखना
जाओ कहीं भी सनम, तम्हें इतनी कसम,
हमें याद रखना...
शाहिद बताते हैं, "अपनी जिंदगी के आखिरी दिन 31 जुलाई 1980 को सुबह के समय घर पर ही अब्बा ने एक बंगाली फिल्म के गीत के लिए रियाज किया। इसी दौरान उन्हें सीने में दर्द की शिकायत हुई, पर उन्होंने किसी से कहा नहीं और ट्रायल पूरा किया। इसके बाद दवाई लाने के लिए बोले। अम्मा को लगा कि उन्हें ज्यादा तकलीफ हो रही है, क्योंकि उससे पहले भी उन्हें हार्ट अटैक आ चुका था। अम्मा ने देखा कि उनके नाखून नीले पड़ते जा रहे हैं।

उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टर्स ने उनका चेकअप किया उन्हें ड्रिप लगाई...इस सबसे उन्हें गुस्सा आ रहा था, अम्मा ने उन्हें समझाया, "डॉक्टर्स जो कर रहे हैं आपकी सेहत के लिए कर रहे हैं...आप आराम कीजिए। तब वह बोले अच्छा, तुम कहती हो तो आराम कर लेता हूं।" फिर डॉक्टर्स ने सबको कमरे से बाहर कर दिया। पांच मिनट बाद ही पता चला कि अब्बा नहीं रहे। अपने पीछे वह अपनी यादें और गाने छोड़कर बहुत दूर चले गए।

-उर्मिला
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