सन्1974 में प्रदर्शित निर्माता एफसी मेहरा की फिल्म मनोरंजन न सिर्फमनोरंजक है, बल्कि उद्देश्यपूर्ण भी है। इस फिल्म का निर्देशन शम्मी कपूर ने किया था। बतौर निर्देशक यह उनकी पहली फिल्म थी। शम्मी कपूर ने अपने सम्पूर्ण अभिनय कॅरियर में एक खास तरह के अभिनय का सिक्का जमाया था। लेकिन मनोरंजन के द्वारा उन्होंने एक प्रतिभाशाली निर्देशक होने का परिचय भी बखूबी दिया। एक निर्देशक और चरित्र अभिनेता के रूप में भारतीय सिनेमा के इस विद्रोही कलाकार की यह पहली फिल्म भारतीय दर्शकों के लिए विष्ाय की नवीनता और प्रस्तुत करने के ढंग के कारण काफी हद तक एक विद्रोही फिल्म है।
दुनिया के सबसे पुराने पेशे जिस्म बेचने के विष्ाय पर भारत में कितनी ही फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन मनोरंजन के पात्र उन सब फिल्मों से बिल्कुल अलग और ज्यादा विद्रोही नजर आते हैं। यूं तो फिल्म की कहानी प्रसिद्ध फ्रांसीसी ड्रामे- इरमाला ड्यूस से ली गई है, जिसके आधार पर अंग्रेजी में सफल फिल्म भी बन चुकी है, लेकिन पटकथा-लेखक अबरार अल्वी ने इस ड्रामे को काफी सफलता के साथ भारतीय रूप दिया है। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ हवलदार संजीव कुमार का जब पहली बार मुम्बई ट्रांसफर होता है, तो पहले ही दिन उसकी ड्यूटी मनोरंजन स्ट्रीट में लगाई जाती है, जहां जवान जिस्मों की खरीद-फरोख्त का खुला कारोबार होता है। हवलदार रतन मनोरंजन स्ट्रीट पर फैले हुए इस अवैध और अनैतिक कारोबार को खत्म करने के लिए होटल मौज पर छापा मारता है और जिस्म बेचने वालियों की एक खेप पुलिस गाड़ी में भरकर थाने पहुंचता है। अपने कारनामें पर गर्वित रतन जब इंस्पेक्टर के सामने जाता है, तो उसे मालूम होता है कि इंस्पेक्टर साहब भी होटल मौज की मौज उड़ाने वालों में शामिल थे। इंस्पेक्टर को हवलदार की इस गुस्ताखी पर गुस्सा आता है और वह रिश्वत लेने के आरोप में रतन को नौकरी से बर्खास्त कर देता है। इस दौरान रतन मनोरंजन-स्ट्रीट की एक जिस्म बेचने वाली लड़की निशा (जीनत अमान) को दिल दे बैठता है। पुलिस की नौकरी से निकाल दिए जाने के बाद रतन मनोरंजन-स्ट्रीट पहुंचता है। वहां उसकी भेंट निशा की कमाई खाने वाले दलाल (देव कुमार) से होती है। उसे निशा का रतन से मेलजोल बढ़ाना एक आंख नहीं भाता। दोनों में मुकाबला हो जाता है और वह हार जाता है। निशा रतन के साहस और बहादुरी से प्रभावित होकर उसके साथ जीवन बिताने और अपनी सारी आमदनी उसके हवाले करने के लिए तैयार हो जाती है। रतन मनोरंजन-स्ट्रीट का शेरू दादा बन चुका है और वह किसी भी कीमत पर निशा को इस गंदी जिंदगी से निकालने की चेष्टा करता है। इस काम में उसकी सहायता करता है धूप-छांव रेस्टोरेंट का मालिक धूप-छांव (शम्मी कपूर)। शेरू नवाब बुलंद अख्तर बनकर निशा से मिलने लगता है। लेकिन एक अवसर पर शेरू को इस दोहरी जिंदगी से घृणा हो जाती है और वह एक नदी में नवाब बुलंद अख्तर का चोला फेंक आता है। शेरू पर नवाब साहब के कत्ल का इल्जाम लगता है। धूप-छांव की मदद एक बार फिर शेरू को इस कानून के चुंगल से निकालती है। अंतत: रतन को पुलिस की नौकरी फिर मिल जाती है और निशा और रतन सदा के लिए एक हो जाते हैं।
फिल्म के तीनों केंद्रीय पात्र- संजीव कुमार, जीनत अमान और शम्मी कपूर ने पर्दे पर गजब का अभिनय प्रस्तुत किया है। भोले-भाले और नेक हवलदार रतन वक्त के हाथों मजबूर दादा का जीवन बिताने वाले शेरू और निशा से मुलाकातें करने के लिए नवाब बुलंद अख्तर के वेश में संजीव कुमार ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का अच्छा प्रदर्शन किया है। जीनत अमान किस कोटि की अभिनेत्री हैं, उसके प्रमाण में मनोरंजन पेश की जा सकती है। संक्षिप्त से लिबास में छुपने से ज्यादा प्रकट होता हुआ उसका सुंदर शरीर, उनकी अदाओं का अल्हड़पन चरित्र के बिल्कुल अनुकूल है। शम्मी कपूर को धूप-छांव की भूमिका में दर्शक एक अर्से तक याद रखेंगे। रिश्वतखोर कॉन्सटेबल असित सेन और लड़कियों के दलाल की भूमिका में पेंटल ने दर्शकों को खूब हंसाया है। अबरार अल्वी के संवाद तीखे और चुस्त हैं। आनंद बख्शी के गीतों की धुनें संगीतकार आरडी बर्मन ने मधुर बनाई हैं। फिल्म के गीत आज भी सदाबहार हैं।
संक्षेप में मनोरंजन अपने नाम के अनुरूप दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है। इस घुटन और संघष्ाü के युग में यह फिल्म सारे इंसानों के लिए एक सुखद झोंके के समान थी, है और रहेगी। -ठाकुरदास
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