Daily News
Saturday, 19 May, 2012
 |   |   |   |   |   |   |   |   |   |   | 
पोषण को तरसते बालक
Tuesday, January 31, 2012, 09:22 hrs IST
Email Print Comment min  max | Bookmark and Share
Left
editorial-special-article
Left
हाल ही सिटीजन्स अलायंस एगेंस्ट मॉलन्यूट्रीशन के अनुरोध पर नंदी फाउंडेशन की कुपोषण संबंधी रिपोर्ट "हंगामा" को जारी करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुपोषण को "राष्ट्रीय शर्म" करार दिया। उन्होंने कहा कि जीडीपी में वृद्धि के बावजूद देश में कुपोषण का स्तर चिन्ताजनक है। नौ राज्यों में सर्वेक्षण के दौरान 112 जिलों में 73 हजार घरों से संपर्क किया गया।

इस सर्वे के तहत बच्चों व माताओं से पूछताछ की गई। सर्वे की ताजा रिपोर्ट ने इसी सच्चाई पर फिर से रोशनी डाली है कि पांच साल तक की उम्र के 42 फीसदी बच्चों का वजन उनकी आयु में जितना होना चाहिए, उससे कम है। 59 फीसदी बच्चों की लंबाई सामान्य से कम है। त्रासद बात यह है कि सेव चिल्ड्रन की रिपोर्ट "ए फेयर चांस ऑफ लाइफ" में बताया गया था कि हर साल 260 लाख बच्चे जन्म लेते हैं, जिनमें से लगभग 18.3 लाख बच्चे अपने पांचवें जन्म दिन तक पहुंचने से पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं। इनमें से आधे बच्चे तो एक महीने के अंदर मौत के शिकार हो जाते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि ज्यादातर गांवों में आंगनबाड़ी केन्द्र तो हैं, पर आशा सहयोगिनियों के पद बरसों से खाली पडेे हैं। प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं का अभाव और डॉक्टरों की कमी है। सर्वे ने आंगनबाडियों की कार्यप्रणाली की पोल खोल कर रख दी। सर्वे में शामिल गांवों में से 96 फीसदी में आंगनबाड़ी केन्द्र खुले हुए थे, लेकिन इनमें से सिर्फ 61 फीसदी ही पक्के भवन में चल रहे थे। 61 फीसदी आंगनबाडियों में ही सूखा राशन दिया जा रहा था, जबकि 50 फीसदी आंगनबाडियों में ही सर्वे वाले दिन बच्चों को भोजन उपलब्ध करवाया। यह योजना अच्छे नतीजे नहीं दे पाई। प्रधानमंत्री ने कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) पर्याप्त नहीं है।

उन्होंने कहा कि "हमारे सकल घरेलू उत्पाद में प्रभावशाली वृद्धि के बावजूद देश में कुपोषण का यह स्तर अस्वीकार्य रूप से अधिक है।" अमत्र्य सेन जैसे अर्थशास्त्री और अनेक सामाजिक कार्यकर्ता भी भारत की इस विडंबना की तरफ लंबे समय से ध्यान खींचते रहे हैं। आंगनबाड़ी कार्यक्रम कुपोषण से निपटने का एक प्रमुख जरिया है, लेकिन अब सिर्फ इस पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता।

दरअसल, कुपोषण कोई अलग समस्या नहीं है। यह गरीबी, अशिक्षा एवं बेरोजगारी के ऊंचे स्तर का ही एक प्रतिफल है, इसलिए जरूरत बहुआयामी पहल की है। प्रधानमंत्री ने जो "हंगामा" रिपोर्ट जारी की, वह वाकई हंगामा करने वाली थी। इस रिपोर्ट में राजस्थान के भी दस जिलों का बाल-कुपोषण का सच सामने आया। बांसवाड़ा, बारां, बाड़मेर, भरतपुर, धौलपुर, जैसलमेर, झालावाड़, करौली, कोटा व डूंगरपुर जिलों में बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। ज्यादातर में इलाज के लिए प्रशिक्षित डॉक्टर तक नहीं हैं।

बाड़मेर में तो महज 10 फीसदी और जैसलमेर में 16 फीसदी गांवों में ही प्रशिक्षित डॉक्टर मौजूद हैं। महिला एवं बाल विकास विभाग के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो कई जिलों में पांच वर्ष तक के बच्चों में कुपोषण का प्रतिशत 50 और इससे भी अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक बारां जिले में 40, बाड़मेर में 39, भरतपुर में 40, धौलपुर में 44, डूंगरपुर में 41, जैसलमेर में 35, झालावाड़ में 48, करौली में 41 और कोटा जिले में करीब 36 प्रतिशत बच्चे कम वजन के मिले हैं।

इन जिलों में रिपोर्ट के आधार पर राजस्थान में 40 से 45 फीसदी बच्चों को कम वजन वाला और कुपोषण का शिकार माना गया है। विभाग की नवम्बर माह 2011 की रिपोर्ट में प्रदेश में बच्चों में कुपोषण का औसत आंकड़ा 40.37 प्रतिशत आया है। सिरोही में कुपोषित बच्चों की संख्या 57 प्रतिशत तक है। भीलवाड़ा में 53 प्रतिशत, प्रतापगढ़ और उदयपुर में 52 प्रतिशत तथा जालौर में 49 प्रतिशत है।

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कुपोषण रोक पाने में सरकार की विफलता को न केवल सार्वजनिक तौर पर स्वीकारा है, बल्कि कुपोषण को "राष्ट्रीय शर्म" बताकर एक नई बहस को न्यौता दिया है। प्रधानमंत्री की यह स्वीकारोक्ति साहसिक तो है, लेकिन व्यवस्था में आए विकारों को दूर कौन करेगा? केवल स्वीकार कर लेने मात्र से ही व्यवस्था में सुधार नहीं हो जाता है।

कुपोषण को लेकर प्रधानमंत्री की चिंता वास्तव में चिंता बढ़ाने वाली है। उनकी चिंता पर गंभीरता से चिंतन-मनन होना चाहिए। हम स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें यह तो सुनिश्चित करना ही होगा कि बच्चों को शुद्ध दूध और पौष्टिक आहार पर्याप्त मात्रा में मिले। कुपोषण बच्चों व महिलाओं में व्यापक स्तर पर फैला हुआ है। योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट पहले ही इसका खुलासा कर चुकी है। आयोग की रिपोर्ट का आकलन है कि देश के एक तिहाई लोग और करीब आधे बच्चे कुपोषण का शिकार हैं।

इस ताजा सर्वेक्षण का खास सबक यह है कि कुपोषण के मामले को हमें अब गंभीरता से लेना होगा और इसके लिए नई योजनाएं और रास्ते निकालने होंगे। सर्वाधिक कुपोषणग्रस्त जिलों या इलाकों को लक्षित करके प्राथमिकता से काम करना होगा। हमारे देश में कुछ समुदाय और वर्ग काफी बदहाल हैं और कुपोषण की समस्या के निवारण के लिए चलाई जाने वाली योजनाएं और कार्यक्रम संसाधनों की कमी का सामना कर रहे हैं। योजनाओं व कार्यक्रमों में अनेक प्रकार की खामियां हैं और कुप्रबंधन भी एक बड़ी समस्या है। संयुक्त राष्ट्र ने कुपोषण के अंत के लिए वर्ष 2015 की डेडलाइन घोषित कर रखी है, लेकिन हमारे देश के हालात को देखते हुए यह लक्ष्य पाना मुश्किल है। इसके बावजूद कुपोषण की समस्या से निजात पाने के लिए सभी को ठोस प्रयास करने होेगे।

डॉ. ज्ञान प्रकाश पिलानिया
(लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
More Stories Top News
editorial news जंग पर हावी चुनावी चिंता
editorial news सरकार की नीयत में खोट
editorial news पहले अपना हित देखें
editorial news जड़ से उखड़ती राजनीति
editorial news विचारों की गुलामी क्यों
editorial news धड़ेबंदी में गौण हो गई मर्यादा
editorial news सरहद पे खड़ा दरख्त
editorial news आधी आबादी की उपेक्षा
editorial news वामपंथ की ओर रूझान
editorial news सोच से बदलेंगे हालात
Copyright © Daily News. All rights reserved.