राहुल गांधी क्या मनमोहन सिंह सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ जा रहे हैं? क्या वे भी सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्यों की लाइन पर चल रहे हैं? क्या वे सरकार से ज्यादा कांग्रेस संगठन को तरजीह दे रहे हैं? क्या उनके पास गरीबों के विकास का कोई वैकल्पिक रास्ता भी है? क्या वे गरीब आदिवासियों को विकास के भरमाने वाले सपने दिखाकर कांग्रेस के वोट बैंक को मजबूत करने में लगे हैं? क्या राहुल गांधी 2014 के अगले आम चुनाव के बाद खुद को ऎसे प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने में लगे हैं, जो मनमोहन सिंह से ज्यादा मानवीय है और जिसमें महात्मा गांधी का अक्स उभरता है? ये कुछ ऎसे सवाल हैं, जो राहुल गांधी के हाल के उड़ीसा दौरे के बाद सत्ता के गलियारों से लेकर कॉफी हाउसों में अचानक बहस का रूप लेने लगे हैं। राहुल गांधी ने आखिर ऎसा क्या कह दिया कि कुछ को उनमें महात्मा गांधी का अक्स दिखने लगा है। पूरा घटनाक्रम सिलसिलेवार ढंग से देखें तो ऎसा लगता है कि सारी पटकथा पहले से ही लिख ली गई थी। अलीगढ़ के किसानों की भूमि अधिग्रहण संबंधी शिकायतों को राहुल गांधी जायज बताते हैं। तभी उड़ीसा का कालाहांडी, लांजीगढ़, नियमगिरि की पहाडियों में अरबों की वेदांता परियोजना का मामला पर्यावरण मंत्रालय तक आता है। मंत्री जयराम रमेश वेदांता कंपनी को बॉक्साइट खनन की इजाजत देने से न केवल मना कर देते हैं, बल्कि वेदांता को वन एवं पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का आरोपी बताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर देते हैं। दो दिन बाद ही राहुल गांधी नियमगिरि की पहाडियों में रहने वाले ढोंगरिया आदिवासियों के बीच पहुंचते हैं। राहुल याद दिलाना नहीं भूलते कि दो साल पहले वहां गए राहुल ने आदिवासियों से वादा किया था कि वो दिल्ली जाकर उनके सिपाही की तरह काम करेंगे और उनके पूज्य पहाड़ों को मुक्त कराएंगे। राहुल गांधी कहते हैं कि गरीबों के अधिकार, सम्मान और जमीन को छीनकर विकास नहीं किया जा सकता। वो फिर गरीब हिंदुस्तान और अमीर इंडिया का मुद्दा उठाते हैं। इंदिरा गांधी का पोता (राहुल गांधी) कहते हैं कि गरीब भारत की आवाज को शक्ति देने के लिए ही वो वहां आए हैं। राहुल जानते हैं कि दिल्ली और बड़े शहरों में बैठा युवा वर्ग सीधे-सीधे सवाल उठा सकता है कि भूख, अकाल और गरीबी से जूझ रहे कालाहांडी का विकास फिर कैसे होगा? क्या आदिवासी अजायबघर की चीज है कि वो पुरातन रूप में ही रहे? क्या आदिवासियों को देश की मुख्य धारा में शामिल होने का कोई हक नहीं है? क्या आदिवासी सिर्फ नुमाइश के लिए ही है? सवालों का सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। गरीब आदिवासियों तक सरकारी विकास आजादी के साठ साल बाद भी पहुंचा नहीं है। राशन का सामान रास्ते में ही गायब हो जाता है। सड़कें बनी नहीं हंै। पेयजल योजनाओं का अभाव है। कृषि भूमि को सिंचित करने की कोई योजना नहीं है। अकाल राहत का सामान नेता-अफसर हड़प जाते हैं। सरकारी स्तर पर रोजगार देने की व्यवस्था नहीं है। ऎसे में कालाहांडी हो या लांजीगढ़ या फिर नियमगिरि की पहाडियो पर रह रहे आदिवासियों का विकास कैसे होगा? कौन करेगा? अगर कोई निजी कंपनी पौने दो अरब डॉलर की योजना लेकर आती है तो उसे भला रोका क्यों जाना चाहिए। आखिर इतना पैसा खर्च होगा तो स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। उनका जीवन स्तर कुछ हद तक सुधरेगा। राहुल गांधी जानते हैं कि ऎसे सवाल पीछा नहीं छोड़ेंगे। लिहाजा वे समग्र विकास की बात करते हैं। विकास के लिए सबको साथ लेकर चलने की बात करते हैं। उनकी राय में गरीबों के हकों को छीनना विकास नहीं है। जिस देश में सबसे अमीर और सबसे गरीब आदमी में 15 लाख गुना का फर्क हो, जिस देश में 80 फीसदी आबादी रोज बीस रूपये से ज्यादा खर्च नहीं कर पाती हो, जिस देश में पिछले कुछ सालों में खरबपतियों की संख्या दुगुनी हुई हो और गरीबों की संख्या भी डेढ़ गुना बढ़ी हो, उस देश में जरूरी है कि सरकार गरीबों के पक्ष में ज्यादा से ज्यादा योजनाएं बनाए। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट के तहत उन्हें रोजगार दे। खाद्य सुरक्षा कानून का सहारा दे। दिग्विजय सिंह और मणिशंकर अय्यर तक यही बात कह रहे हैं। कारपोरेट सेक्टर के खिलाफ इन सब के बयान आ रहे हैं। सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के एन.सी. सक्सेना से लेकर अरूणा राय, हर्ष मंदर तक यही कह रहे हैं कि गरीब भारत का निर्माण नहीं हुआ तो सारा ढांचा ही चरमरा जाएगा। एक नई तरह की समाजवादी सोच विकसित हो रही है। हैरत की बात है कि मनमोहन सिंह सरकार की समाजवादी सोच के साथ हो रही घेराबंदी खुद सरकार और कांग्रेस संगठन के ही नेता ही कर रहे हैं। जो काम वामदलों को करना था, उसे राहुल गांधी कर रहे हैं। मसलन, वेदांता के मामले में योजना आयोग के पूर्व सदस्य और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में शामिल एन.सी. सक्सेना का साफ कहना है कि गरीबों के हकों का अतिक्रमण करके अमीरों को चांदी काटने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कालाहांडी, लांजीगढ और नियमगिरि की पहाडियों का दौरा करके सक्सेना साहब ने ही कहा कि अमीर खानों से अरबों कमाते हैं, लेकिन विस्थापितों के साथ अन्याय होता है। उन्हें मुआवजा तक पूरा नहीं मिलता। उस विकास का भागीदार नहीं बनाया जाता, जमीन छिनने के बाद गरीब आदिवासी और ज्यादा गरीब हो जाता है। एक अध्ययन के अनुसार जमीन छिनने के बाद 75 फीसदी आदिवासी और ज्यादा गरीब हो गए हैं। ये नतीजे छत्तीसगढ़ से लेकर आंध्र प्रदेश और उड़ीसा के खनन उद्योग के गहन अध्ययन के बाद सामने आए हैं। सवाल उठता है कि समाजवादी भारत की पैरवी करने वाले राहुल गांधी, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश और मणिशंकर क्या सचमुच में कतार में सबसे पीछे खड़े आदमी का भी विकास चाहते हैं या फिर एक बेहद सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस का नया वोट बैंक बनाने की कवायद कर रहे हैं या यूं कहा जाए कि उस वोट बैंक को वापस कांग्रेस के झंडे तले लाने की कोशिश हो रही है, जिसे पिछले दो दशकों में क्षेत्रीय दल छीन ले गए हैं। उड़ीसा में नवीन पटनायक का बीजू जनता दल, बिहार में पहले लालू और अब नीतीश, उत्तर प्रदेश में मुलायम से लेकर मायावती और पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा। सवाल इसलिए भी उठता है, क्योंकि उड़ीसा में पिछले दो दशकों से पहले तो कांग्रेस की ही सरकार थी। तब सरकारी स्तर पर विकास क्यों नहीं हुआ? उसके लिए जिम्मेदार नेताओं और अफसरों को जवाबदेह क्यों नहीं बनाया गया? यही बात बिहार और यूपी के बारे में भी कही जा सकती है, जहां कांग्रेस एक चौथाई सदी से सत्ता से बाहर है और फिलहाल सत्ता में आने के कोई आसार भी नहीं दिख रहे हैं। गरीबों के हित के लिए बनाई गई नरेगा जैसी लगभग आधा दर्जन योजनाओं को हर साल सवा लाख करोड़ रूपये चाहिए। इसकी अमीर इंडिया से ही उगाही करनी है। अमीर इंडिया के लिए मनमोहन सिंह व प्रणव मुखर्जी की जोड़ी 9 फीसदी विकास दर चाहती है। लिहाजा अर्थव्यवस्था को और ज्यादा खोला जा रहा है, पेट्रोल की कीमतों को बाजार से जोड़ दिया गया है, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के शेयर बेचे जा रहे हैं। मनमोहन-प्रणव की जोड़ी को लगता है कि लगातार 9 फीसदी की विकास दर रहेगी तो अंतत: पैसा रिस कर नीचे गरीबों तक जाएगा। उधर राहुल को लगता है कि ऎसी कारपोरेट सोच से आम आदमी को कांग्रेस के हाथ से जोड़े रखना मुश्किल है। आम आदमी की तकलीफें बढ़ती ही जा रही हैं और उसकी आवाज सुनना जरूरी है, जहां तक नौकरीपेशा मध्यम वर्ग की बात है तो उसे इनकम टैक्स में छूट देकर कभी भी मनाया जा सकता है। विजय विद्रोही (लेखक स्टार न्यूज के कार्यकारी संपादक हैं)
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