अमेरिकी टीवी सुपर स्टार और एंकर ओप्रा विनफ्रे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के घर उनकी पोती को देखने पहुंची तो उन्होंने अभिषेक बच्चन से आश्चर्य से पूछा कि इतने बड़े होकर भी आप अपने माता-पिता के साथ कैसे रहते हैं? हिंदुस्तान में इतनी उम्र के बच्चे भी मां-बाप के साथ कैसे रहते हैं, आश्चर्य होता है तो अभिषेक ने पलट कर सवाल पूछा था कि आपके मुल्क में बच्चे मां बाप के साथ क्यों नहीं रहते हैं, यह जानकर आश्चर्य होता है, अचरज होता है कि बच्चे मां-बाप का साथ कैसे छोड़ देते हैं। दोनों के सवाल-जवाब में एक ही स्थिति पर आश्चर्य का जिक्र था। उसकी वजह संस्कृति और सभ्यता में फर्क है, जिसे कल्चरल डिफरेंस कहा जाता है। अलग-अलग मुल्कों में रिश्तों को निभाने का तरीका और हमारे सामाजिक बंधनों को अपनाने, स्वीकार करने के तरीके में फर्क इसलिए आता है, क्योंकि हमारी संस्कृति उसे नया स्वरूप देती है।
ओप्रा ने हिंदुस्तान में रहकर बहुत से विषयों पर बात की, अपनी राय रखी, उस पर बाद में बात करेंगे। पहले उस खबर का जिक्र करना चाहता हूं, जिसने देशभर में ज्यादातर लोगों को सोचने, समझने पर विवश कर दिया और बहुत से लोगों ने उस पर नाराजगी जताई। नार्वे में एक हिंदुस्तानी माता-पिता के बच्चों को उनसे अलग इसलिए कर दिया गया, क्योंकि वहां के स्थानीय प्रशासन को लगा, उनके पड़ोसियों ने समझा कि मां-बाप अपने बच्चों पर ज्यादती कर रहे हैं। शिकायत यह थी कि मां-बाप अपने बच्चों को अपने हाथ से खाना खिलाते थे और गोद में सुला रहे थे, जिसे वहां फोस्र्ड फीडिंग कहा गया था और माना गया था कि मां-बाप बच्चों के साथ ना केवल जबरदस्ती कर रहे हैं, बल्कि उनके विकास में बाधक भी बन रहे हैं, इसलिए बच्चों को मां बाप के साथ नहीं रखा जा सकता, सो सरकार ने उन्हें उनसे अलग कर दिया।
मां-बाप को इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी, कानूनी लड़ाई भी लड़ी, भारत सरकार ने भी उनका साथ दिया, लेकिन अब भी बच्चे माता-पिता को सौंपने के बजाय उनके चाचा को सौंप दिए गए हैं और प्रशासन इस बात का ध्यान रखेगा कि बच्चों के लालन पालन में कोई गड़बड़ी नहीं हो। अब मां-बाप जैसे बच्चों का ध्यान रख रहे थे और बच्चों को अपने हाथ से खाना खिला रहे थे, उन्हें सुलाते थे, इस बात को गलत समझने में हिंदुस्तान भर में ना केवल अचरज जाहिर किया गया, बल्कि नाराजगी भी दिखाई दी।
हम हिंदुस्तानी तो इसे प्यार समझते हैं। मुझे तो आज तक याद है कि मेरी नानी मुझे हाथ से खिलाया करती थी। मेरी बेटी जो वक्त से पहले हुई थी, उसे मेरी मां ने ही बड़ा किया, मालिश करके, खाना खिलाकर के। और मां यानी बेटी की दादी इतना ध्यान नहीं रखती तो शायद आज वो इतनी बड़ी नहीं होती, मनोविज्ञान में एमफिल करते हुए रिश्तों और भावनात्मक व्यवहारों पर रिसर्च करने लायक नहीं होती। मेरी बेटी मजाक में कह रही थी कि पापा अच्छा हुआ कि आप नार्वे में नहीं है, वरना अभी जेल में होते, क्योंकि आज भी कभी-कभी उसे मेरे हाथ से खाना खाना अच्छा लगता है और मुझे भी अपने हाथ से उसे खाना खिलाने में मजा आता है, क्या हिंदुस्तान की सरकार इस अपराध पर मुझे जेल भेज देगी।
दो अलग-अलग संस्कृतियों के मूल्य जब टकराते हैं तो उसका नतीजा क्या होता है, इसका यह एक बेहतर उदाहरण साबित हो सकता है, फिर चाहे वो ओप्रा विनफ्रे का अभिषेक बच्चन से पूछा गया सवाल हो या फिर नार्वे के अनुरूप और सागरिका भट्टाचार्य के बच्चों का सवाल। अभी कुछ दिनों पहले सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को गोद में अपनी पोती को घर ले जाने वाले फोटोज छपे थे, टीवी पर भी देखे गए थे। अमिताभ बच्चन की बात छोडिये, हर घर में बच्चों को गोद में लिए हुए फोटो सबके पास होंगे, बल्कि हमारे यहां तो सेलेब्रिटीज और नेता लोग किसी के करीब दिखने के लिए उनके बच्चों के साथ ही फोटो खिंचवाते हैं। अभी इन दिनों चुनाव चल रहे हैं तो नेताजी कोशिश करते हैं कि वो किसी के घर पहुंच कर उसके बच्चे को गोद में लेते हुए दिखाए जाएं। यूरोप के बहुत से मुल्कों में तो बच्चों को लाने के लिए बेबी सीट चाहिए।
अस्पताल के अधिकारी बाकायदा इसे चैक करते हैं, वरना बच्चा ही नहीं देते। अमिताभ बच्चन और हमारे घरों की बात छोडिये, कृष्ण और यशोदा के प्यार से मक्खन खिलाने के चित्र और उन पर ढेर सारे गीत, चरित्र से हमारे शास्त्र भरे पड़े हैं, सूरदास के श्याम मनोहर को लेकर तो हम अपने को धन्य मानते हैं और रामचरित मानस में कैसे दशरथ की तीनों रानियां पैजनियां पहने बाल सुलभ राम के साथ कैसे आनंद मनाती हैं और हम जन्माष्टमी को कितना बड़ा पर्व मानते हैं, इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता। इसे मूल्यों का टकराव भी कहा जा सकता है, लेकिन हर मुल्क और हर संस्कृति में सोच-समझ का अपना-अपना तरीका होता है।
हर तरीके, संस्कृति और सोच-समझ के अपने अपने फायदे भी होते हैं और नुकसान भी। एक और उदाहरण है ओप्रा विनफ्रे का ही। ओप्रा ने शादी नहीं की है। ओप्रा ने कहा कि मुझे हैरानी होती है हिंदुस्तान में देखकर कि कैसे कोई एक ही व्यक्ति के साथ पूरी जिंदगी निकाल सकता है। उन्हें अरेंज्ड मैरिज को लेकर भी हैरानी होती है और यह जानकर भी कि यहां शादी पहले होती है और प्यार बाद में, लेकिन वे हिंदुस्तान को नीची निगाहों से नहीं देखती, वो यहां की सांस्कृतिक समझ और रीति-रिवाजों पर सवाल खड़े नहीं करती, सिर्फ उनसे हैरान होती हैं।
आज जब दुनिया सिमट रही है, संचार क्रांति ने ग्लोबल विलेज बना दिया है। हमें दूसरे मुल्कों की सांस्कृतिक सोच-समझ और रीति रिवाजों को जानने का मौका मिला है तो बेहतर है कि हम सब मिलकर जिंदगी को बेहतर बनाने की कोशिश करें।
विजय त्रिवेदी (लेखक एनडीटीवी इंडिया में डिप्टी एडिटर हैं)
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