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Tuesday, 07 February, 2012
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संत परंपरा को बदनाम न करें
Saturday, August 28, 2010, 09:56 hrs IST
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भारत में भगवा आतंकवाद है, यह खोज पी. चिदंबरम ने की है और यह भी कि चिदंबरम सिर्फ जाने-माने वकील ही नहीं हैं, अपितु भारत सरकार के गृहमंत्री भी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि चिदंबरम ने यह खुलासा किसी प्रश्न के जवाब में नहीं किया, अपितु देशभर के राज्य पुलिस प्रमुखों के दो दिवसीय सम्मेलन में स्वप्रेरणा से किया है। भगवा आतंकवाद पर तो चर्चा बाद में करेंगे, लेकिन यह जानना जरूरी है कि क्या भारत के गृहमंत्री पुलिस अधिकारियों के गले यह बात उतारने की कोशिश कर रहे हैं कि अब पुलिस अधिकारी किसी रूप में भगवा की बात करने वाले लोगों को आतंकवादी के रूप में देखने की कोशिश शुरू कर दें।
इसी से जुड़ा हुआ दूसरा प्रश्न है कि भगवा आतंकवाद को अस्तित्व में लाकर वे अपना कौनसा राजनीतिक ऎजेंडा पूरा कर रहे हैं? प्रश्न यह उठता है कि भारत में भगवा आतंकवाद की बात क्यों और कहां से शुरू हुई? दरअसल इस प्रश्न की जड़ में एक मूल प्रश्न है कि हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होता है? जब देश की जनता ने संसद पर और मुंबई में हुए आतंकी हमले में अफजल गुरू और कसाब का नाम आने के बाद और अदालत द्वारा उन्हें दोषी पाए जाने के बाद यह प्रश्न पूछना शुरू किया, तो इस प्रश्न का जवाब देश के मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम समाज ने देने की बजाय, देश की सद्भावना बनाए रखने वाले सर्वस्पर्शी दल कांग्रेस की गठबंधन सरकार ने देना उचित समझा। मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और दयाशंकर पांडेय का नाम आने के बाद तो अंधे के हाथ बटेर लग गई। पूरी सरकार और उसके सहयोगी दल यह सिद्ध करने में लग गए कि आतंकवादी सिर्फ मुसलमान ही नहीं होता, हिंदू भी होता है।
अपनी इस दलील को पुष्ट करने के लिए सरकार ने दो और प्रकरणों को जनता के सामने रखा। इनमें एक गोवा में सनातन संस्था से जुडे लोगों का कारनामा है और दूसरा दिनेश गुप्ता का। कहा जा रहा है कि भगवा मानसिकता के लोग देश की आंतरिक सुरक्षा व सद्भावना को बिगाड़ने में लगे हैं। चिदंबरम जिस भगवा आतंकवाद की बात कर रहे हैं, उसका मतलब क्या है? क्या वे भारत में सनातन काल से चली आ रही संत परंपरा को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं? या फिर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे संगठनों व कार्यकर्ताओं को आतंकवादी कह रहे हैं? या फिर वे ये कहना चाहते हैं कि भारत में मंदिर जाने वाले हर व्यक्ति से भारत की एकता और अखंड़ता को खतरा है? या उनको लगता है कि देश में पनप रहे मुस्लिम आतंकवाद, नक्सली आतंकवाद का जवाब देने की बजाय "भगवा आतंकवाद" की बात को स्थापित करना उनकी पार्टी के राजनीतिक हित में है।
वे शायद यह भूल गए हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी लगभग हर सभा में यह पूछते नजर आते थे कि आज की सभा में कितने मुस्लिम भाई आए हैं? वे कहते थे कि भारत की आजादी की जितनी जरूरत हिंदुओं को है, उतनी ही यह मुस्लिमों के लिए भी आवश्यक है, अत: हर हिंदू भाई का कर्तव्य है कि वह अपने साथ एक मुस्लिम भाई को अवश्य ही लेकर आए, लेकिन कितने मुसलमान महात्मा गांधी के साथ आए? उस समय भी मुसलमान महात्मा गांधी की अपील को इसलिए अनसुना कर देते थे, क्योंकि उनका यह विश्वास था कि कांग्रेस हिंदू नेताओं की पार्टी है, उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है। देश का बंटवारा कर देने के बाद भी क्या वर्ग विशेष के लोगों का यह चरित्र बदला? क्या आज भी इस वर्ग के लोग कांग्रेस को अपना मानते हैं? आज भी हर राज्य में उनकी अपनी गणित है। दरअसल, वोट की राजनीति और तुष्टीकरण की नीति के चलते केन्द्र सरकार भगवा ध्वज को ही आराध्य मानने वाले करोड़ों भारतीयों को भगवा आतंकवादी कहने में गर्व महसूस कर रही है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जिन्हें आप आतंकवादी साबित करने की धमकी दे रहे हैं, उन्हें इस देश पर मर-मिटने के लिए किसी शासक के प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं होती। ये वे लाखों लोग हैं, जो सिर्फ एक ही आशा के साथ भगवा ध्वज को प्रणाम करते हैं कि एक सुबह ऎसी होगी, जब भारत विश्व का सिरमौर होगा।
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं)
ऎसे नहीं छिपेगी अपनी नाकामी
भारत सरकार के गृहमंत्री चिदंबरम साहब ने देश के शीर्ष अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्हे भगवा आतंकवाद को लेकर चेताया है। इससे सवाल उठता है कि क्या देश में इस किस्म का कोई आतंकवाद फल-फूल रहा है? इसे भगवा नाम दिए जाने के क्या निहितार्थ हैं? ऎसे सवालों पर सोचा जाना चाहिए।
हम देख रहे हैं कि अमेरिका अपने बहुप्रचारित मत इस्लामी आतंकवाद को वापस ले चुका है। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुस्लिम देशों में यह कहते फिर रहे हैं कि वे आम मुस्लिम को आतंकवादी नहीं मानते। भारत में भी शुरू से इस शब्दावली का विरोध हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने कहा था कि यह सही है, हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं है, लेकिन जो आतंकवादी पकड़े जाते हैं, वे मुस्लिम हैं। इसके बावजूद मुस्लिम आतंकवाद की शब्दावली को अनुचित ठहराया जाता रहा है। सांप्रदायिकता को लेकर अब तक दुनिया मे अनेक अध्ययन हुए हैं। इनमें पाया गया है कि कोई एक सांप्रदायिकता सदैव अपने लिए खाद-पानी विरोधी सांप्रदायिकता से जुटाती है। ऎसे मे जब हम किसी खास संप्रदाय को मदद पहुंचा रहे होते हैं या उस पर प्रहार कर रहे होते हैं, तो दूसरी सांप्रदायिकता की प्रतिक्रिया को नजर अंदाज नहीं कर सकते।
यदि भगवा आतंक कोई बहुत बड़ा खतरा है, तो तय मानिए इसका विपरीत आतंक भी उससे कोई कम खतरा नहीं होगा। दूसरा ऎसा कहकर आप इस्लामी, सिख या कश्मीरी आतंकवाद जैसे जुमलों के प्रयोग को कैसे रोक सकते हैं? गृहमंत्री चिदंबरम के इस उद्बोधन का दो अन्य पहलुओं से विश्लेषण किया जा रहा है। एक तो वे ऎसा कहकर तथाकथित भगवा बिग्रेड को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के तमाम अनुसंगी संगठन शामिल हैं। चिदंबरम की पार्टी कांग्रेस सोचती है कि भगवा नाम देकर वह भाजपा से संबद्ध अतिवादी समूहों को हिंदुओं से अलग कर देती है। वामपंथी दल और लालू प्रसाद यादव जैसे लोग भी प्राय: इस शब्दावली का प्रयोग करते पाए जाते हैं। क्या भगवा का हिंदू समुदाय से ऎसा उच्छेदन संभव है? उत्तर हो या दक्षिण भारत, जहां-जहां मंदिर संस्कृति फैली है, वहां भगवा ध्वज लहरा रहे हैं। क्या ये सब भाजपा के अनुसंगी संगठनों के गढ़ हैं।
हम क्यों एक व्यापक प्रतीक को थोडे से संगठनों की मिल्कियत मान रहे हैं। क्या हम आम हिंदू को यह समझा सकते हैं कि भगवा से हमारा आशय कुछ खास है। इस संदर्भ में यदि चिदंबरम या उनकी पार्टी की सोच यही है, तो उनकी रणनीति कोई फायदे में नहीं है। बयान के दूसरे पहलू में इसे नक्सलवादी आंदोलन से निपटने में गृहमंत्री की विफलता से जोड़कर देखा जा रहा है। चंूकि कथित लाल आतंक (नक्सली हिंसा) से वे ठीक से नहीं लड़ पा रहे हैं। इसलिए इस मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए कथित भगवा आतंक की बात करने लगे हैं और चूंकि यह कोई वास्तविक समस्या तो है नहीं। चिदंबरम साहब को बड़ी हसरत से यह पोर्टफोलियो दिया गया था। उन्होंने कई योजनाएं बनाईं और नए निर्णय करने का संकेत दिया। अब इतना समय तो गुजर ही चुका है कि हम उनके काम का असर देख सकें।
देश के सामने खड़ी समस्याएं उतनी ही विकराल हैं। यहां तक कि गुजरात में हुई 2002 जैसी घटनाओं की अन्यत्र किसी राज्य मे पुनरावृत्ति नहीं हो, उसे लेकर बनने वाला सांप्रदायिकता विरोधी विधेयक अभी तक संसद में नहीं आ पाया। मुंबई पर आतंकी हमले के समय पुलिस की अंदरूनी साजिशें उजागर नहीं हुई। बटाला मुठभेड कांड की असलियत सामने नहीं आई। विभिन्न झूठे आरोपों में महीनों हिरासत मे रखे गए मुस्लिम युवाओं को लेकर पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। पूर्वोत्तर मे महीनों राजमार्ग बंद रहते हैं और गृह मंत्रालय कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। गृहमंत्री ने दस साल से अनशन कर रहीं शर्मिला से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। उन्हें समझ नहीं आता कि कश्मीर के हालात से कैसे निपटा जाए। वहां पत्थर फेंकने वालों को वे क्या नाम देंगे? आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। वह मानवविरोधी जघन्य कृत्य है और सभ्यता के विरूद्ध अपराध है। ऎसा तब भी है, जब यह स्वयं राज्य के द्वारा किया जाता है और तब भी जब अमेरिका द्वारा किया जाता है।
राजाराम भादू
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
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