आखिरकार पाकिस्तान की पोल सबके सामने खुल ही गई। स्वीडिश संगठन विकिलीक्स ने अतिगोपनीय दस्तावेजों के आधार पर दावा किया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई अफगान तालिबान को वर्षो से बढ़ावा दे रही है। अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ जंग के नाम पर पाकिस्तान को हर साल एक अरब डॉलर से अधिक राशि मुहैया करा रहा है, लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ उन्हीं आतंकी धड़ों के खिलाफ हो रहा है, जो पूरी दुनिया के लिए खतरा हैं। लीक हुए दस्तावेजों द वार लांग्स में युद्ध प्रभावित देश में संयुक्त बलों की ओर से बहुत से निर्दोष नागरिकों की हत्या की भी जानकारी है। दस्तावेजों में कहा गया कि आईएसआई के प्रतिनिधि तालिबान के आतंकवादियों से सीधे संपर्क बनाकर उनकी अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सैनिकों को मारने में मदद करते थे। इन प्रतिनिधियों ने अफगानिस्तान के नेताओं को मारने की भी योजना बनाई थी। 19 जून, 2006 को जारी हुए एक दस्तावेज में खुलासा किया गया है कि आईएसआई के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर क्वेटा में तालिबान नेताओं से भी मुलाकात की। दस्तावेज के मुताबिक बैठक में आईएसआई ने तालिबान पर इस बात का दबाव डाला कि वह कंधार के एक जिले मारूफ पर हमला करे। लीक दस्तावेजों में से कुछ में कहा गया कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ने अलकायदा के साथ भी हमलों की योजना बनाई। हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि आईएसआई को अलकायदा से सीधे जोड़ना ठीक नहीं है। अन्य दस्तावेज में कहा गया कि आईएसआई के पूर्व और वर्तमान कार्यकर्ता पेशावर के पास के मदरसों में जाकर आत्मघाती हमलों के लिए लड़ाकों की भर्ती करते थे। वहीं इन दस्तावेजों में अफ-पाक संघर्ष में पाकिस्तान के दोहरे रूख को लेकर अमेरिका की खीझ को भी प्रदर्शित किया है। अमेरिका के जनप्रतिनिधियों और नागरिकों को लंबे समय से आईएसआई की भूमिका पर संदेह है। दूसरी ओर ओबामा प्रशासन न केवल लगातार इस्लामाबाद को अपना अहम सहयोगी बता रहा है, बल्कि उसे दी जाने वाली सहायता में भी निरंतर बढ़ोतरी कर रहा है। यह देखना होगा कि इस खुलासे के बाद वाशिंगटन का पाकिस्तान के प्रति रूख क्या रहता है। भारत शुरू से यह कहता रहा है कि पाकिस्तान अमेरिकी सहायता का दुरूपयोग कर रहा है। पाकिस्तानी मूल के आतंकी डेविड कोलमेन हेडली ने भी पूछताछ में जो जानकारियां दी हैं, उनसे भी यह साबित होता है कि पाकिस्तान के सरकारी प्रतिष्ठानों और मौजूदा खुफिया एजेंसियों की आतंकवादियों से साठगांठ है। विकिलीक्स के खुलासे पर तो ओबामा प्रशासन और पाकिस्तानी हुक्मरानों की प्रतिक्रिया आना बाकी है। हेडली की कबूलनामे का तो पाकिस्तान ने खंडन कर दिया, लेकिन विकिलीक्स के खुलासे को झुठलाना उसके बूते में नहीं है। अब अमेरिका भी शायद उसके प्रति इतना कृपालू नहीं रहे। गौरतलब है कि हेडली से पूछताछ के बाद ही अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन पाकिस्तान को खूब खरी-खरी सुना चुकी हैं। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के कुछ लोग ओसामा बिन लादेन और मुल्ला उमर के ठिकानों के बारे में जानते हैं। हालांकि क्लिंटन की इस बात का पाकिस्तान ने खंडन किया था। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने चुनौती दी है कि यदि किसी को इस बारे में कुछ जानकारी है, तो उसे पाकिस्तानी अधिकारियों को सूचना देनी चाहिए। यह संभव है कि वे भविष्य में भी इसी रूख पर कायम रहें। गौरतलब है कि विकिलीक्स पहला स्रोत नहीं है, जिसने पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान अर्थात सेना और आतंकवाद के बीच रिश्तों के तथ्य उजागर किए हैं। बेनजीर भुट्टो की हत्या की जांच करने वाला संयुक्त राष्ट्र पैनल पहले ही यह काम कर चुका है। पैनल का निष्कर्ष था- भुट्टो को कई क्षेत्रों से खतरा था। इनमें अलकायदा, तालिबान, स्थानीय जिहादी संगठन और कुछ ऎसे तत्व शामिल हैं, जिनका संबंध पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठानों से है। पैनल ने पाकिस्तानी अधिकारियों से अपील की कि वे बेनजीर की हत्या की गंभीर, विश्वसनीय जांच सुनिश्चित करें, ताकि यह पता चल सके कि किसने इस घटना की साजिश रची और किसने इसे अंजाम दिया। पैनल ने पाकिस्तान में राजनीतिक हत्याओं की सघन जांच की आवश्यकता पर भी बल दिया। पैनल ने सरकार से खुफिया एजेंसियों की पूरी समीक्षा की भी अपेक्षा की तथा पुलिस सुधारों की जरूरत रेखांकित की, ताकि वह लोकतांत्रिक तरीके से कार्य और मानवाधिकारों की रक्षा कर सके। बेनजीर भुट्टो उस पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की मुखिया थीं, जो आज सत्ता में है, बावजूद इसके पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने संयुक्त राष्ट्र पैनल की इस रिपोर्ट पर ऎतराज जताया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को लिखे पत्र में कहा कि पाकिस्तानी सेना, आईएसआई तथा तथाकथित सरकारी प्रतिष्ठान पर पैनल द्वारा की गई टिप्पणी केवल सदस्यों का अपना विचार है। यह तथ्यों और सबूतों पर आधारित आधिकारिक निष्कर्ष नहीं है। कुरैशी की इस बात का जवाब देते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने तीन सदस्यीय पैनल के निष्कर्षो का पूरी तरह बचाव किया और कहा कि पैनल ने उस जिम्मेदारी का सही तरह से निर्वहन किया, जो उसे दी गई थी। इस पैनल की अध्यक्षता संयुक्त राष्ट्र में चिली के पूर्व राजदूत हेराल्डो मुनोज ने की थी। बान की मून ने कुरैशी के इस दावे को भी गलत ठहराया कि पैनल की रिपोर्ट इसलिए विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि इसमें तीसरे देशों से कोई ठोस सूचना नहीं जुटाई गई है। बान की मून ने कहा कि पैनल ने उसी दायरे में काम किया, जो उसके लिए संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तानी सरकार की आपसी सहमति से निर्धारित किया गया था। उपरोक्त घटनाक्रम यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि पाकिस्तान में सिविल सरकार किस तरह सेना के प्रभाव में रहती है और कैसे उसे सेना तथा आईएसआई की आलोचना को गलत ठहराने के लिए मजबूर किया जाता है। यह हैरत की बात है कि पाकिस्तानी सरकार को यह सब तब भी करना पड़ रहा है, जब बात सत्ताधारी दल के तत्कालीन अध्यक्ष, राष्ट्रपति की पत्नी और देश की सबसे लोकप्रिय नेता की हत्या की है। तालिबान, लश्कर और दूसरे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने के प्रति पाकिस्तानी सेना की अनिच्छा के पीछे यह धारणा विद्यमान है कि जब अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान से चली जाएंगी, तब पाकिस्तानी सेना को इन तत्वों की सहायता से अपनी भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में मदद मिलेगी। केवल भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान इनकी मदद से अन्य देशों को भी नुकसान पहुंचा सकेगा। पाकिस्तानी सेना को यह पूरा यकीन है कि अमेरिका अफगानिस्तान को छोड़कर चला जाएगा। एक तथ्य यह भी है कि पाक सेना इन तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के परिणाम से भी चिंतित है। पाकिस्तान से आई खबरें बताती हैं कि पाकिस्तानी सेना ने स्वात और दक्षिण वजीरिस्तान में जो अभियान चलाए, वे सफल नहीं रहे। तालिबान आतंकियों ने इन स्थानों पर फिर से अपने कब्जे कायम कर लिए। पाकिस्तानी तालिबान की तुलना में हक्कानी गुट और लश्करे तैयबा पाकिस्तानी सेना तथा सिविल सोसाइटी पर कहीं अधिक खतरनाक पलटवार कर सकते हैं। यह आवश्यक है कि अब अमेरिका पाकिस्तान से यह साफ-साफ पूछ ले कि उसमें जिहादियों का दमन करने की इच्छा और सामथ्र्य है अथवा नहीं? यदि उसमें यह क्षमता और इच्छा नहीं है, तो अमेरिका को ऎसी रणनीति अपनानी ही होगी, जिससे पाकिस्तान में फल-फूल रहे आतंकवाद को पूरी तरह कुचला जा सके। यदि अमेरिका ऎसा करता है, तो भारत उसका हंसी-हंसी साथ देने को तैयार हो जाएगा। हालांकि अमेरिका जिस तरह से अफगानिस्तान में फंसा हुआ है, उसे देखते हुए इसकी संभावना कम ही है कि वह पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक होगा। के. सुब्रह्मण्यम (लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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