राजस्थान में भले ही सवा तीन साल बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। युवा तरूणाई ने जिस तरह अंगड़ाई ले ली है, उससे सत्तारूढ़ कांग्रेस की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। पौने दो साल पहले सत्ता में पहुंची कांग्र्रेस से युवा शक्ति ने मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। इसके संकेत शहरी निकायों के बाद छात्र संघ चुनाव परिणामों से साफतौर पर परिलक्षित होने लगे हैं। हालांकि कांग्रेस में अभी से डैमेज कंट्रोल के प्रयास शुरू हो गए हंै, लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के प्रयास फलीभूत कितने हो पाते हैं? हाल ही हुए शहरी सरकारों के चुनाव में कांग्र्रेस को जिस तरह का झटका लगा है, उसकी तो कांग्र्रेस ने उम्मीद भी नहीं की थी। सरकार ने सोचा भी नहीं था कि इतने कम समय में ही जनता नकारना शुरू कर देगी। एक नकारात्मक परिणाम से ही पार्टी के अंदरखाने की तूतियां बोलने लगीं। कोई जोर से तो धीरे-धीरे। बात यह कहकर ही खत्म नहीं की जा सकती कि बागियों ने गणित बिगाड़ दी। यह कहने का तो कांग्र्रेस के कर्ताधर्ताओं को हक ही नहीं है। आखिर टिकट भी उन्होंने ही बांटे थे। सचाई यह है कि जनता से जो वादे किए थे, जिसके सहारे जनता को खुशहाल जिंदगी का सपना दिखाया गया था, वो पूरे नहीं होना है। सत्ता में आने से पहले कांग्र्रेस ने पेट्रोल-डीजल पर लगे स्थानीय करों को समाप्त कर जनता को हर सुविधा सस्ते में मुहैया कराने का वादा किया था। जनता ने कांग्रेस पर भरोसा इस विश्वास पर किया था कि ऎसा हो गया, तो सच में ही महंगाई कम हो जाएगी। पौने दो साल में महंगाई घटने के बजाय इतनी बढ़ गई कि आम आदमी का जीना मुश्किल हो गया। अब उन सबसे सबक लेने और विश्लेषण का समय है। वह भी सही दिशा में व्यावहारिकता के साथ। शहरी निकाय चुनाव की हार के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि कांग्रेस का एक और झटके से सामना हो गया। छात्रसंघों के चुनाव परिणाम कांग्र्रेस के लिए खुश होने लायक नहीं रहे। जोधपुर और अजमेर में मिली आंशिक सफलता से कुछ खुश हुआ जा सकता है, लेकिन जीत के अंतर पर निगाह डालनी भी जरूरी है। कोटा में विश्वविद्यालय निर्दलीय के हाथों में चला गया और उदयपुर में एनएसयूआई सीधे मुकाबले में भी नहीं टिकी। राजस्थान विश्वविद्यालय में भी एनएसयूआई को निराशा ही हाथ लगी। दोनों ही स्थानों पर तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। इसी प्रकार राजस्थान के अन्य विश्वविद्यालयों और कॉलेज छात्रसंघ के चुनाव परिणाम भी कांग्र्रेस के पक्ष में एकतरफा नहीं गए। सरकार में आने से पहले और पौने दो साल तक लगातार युवाओं को नौकरी देने, बेरोजगारी भत्ता देने और उनके भविष्य को लेकर जो ख्वाब दिखाए गए, उसका तिलिस्म टूटने लगा है, जो कि सत्ता पक्ष के लिए आने वाले विधानसभा चुनाव का अच्छा संकेत नहीं है। भाजपा और उससे जुड़े अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लिए परिणाम बंद नलियों में रक्त प्रवाह का काम कर गए। परिणाम आते ही भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव वसुंधरा राजे और प्रदेशाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी ने साफतौर पर कहा कि युवाओं का कांग्रेस की गहलोत सरकार से मोह भंग हो चुका है। बात यह राजनीतिक हो सकती है, लेकिन इसके पीछे के सच से इनकार भी नहीं किया जा सकता है। सवाल यह है कि कल तक जो युवा कांग्र्रेस के पीछे एक उम्मीद के साथ भाग रहा था, उसने एकदम से क्यों झटका दे दिया? ऎसा पौने दो साल में क्या हो गया कि युवा खिलाफ हो गए? छात्रसंघों के चुनाव हुए। यानी पढ़े-लिखे छात्रों के चुनाव। छात्रों को सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर एकबारगी तो बरगलाया जा सकता है, लेकिन जैसे ही उसे अहसास होता है कि वह ठगा जा रहा है, तो वह बदला लेने में कसर नहीं छोड़ता। राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव परिणाम को लेकर कांग्र्रेस और उसके अग्र्रिम संगठन चाहे जो कारण गिनाएं, लेकिन सच तो यह था कि टिकट वितरण में ही गड़बड़ हुई। वैसे पैराशूटर्स को चुनाव मैदान में उतारना कांग्र्रेस के लिए कोई नहीं बात नहीं है, लेकिन इस समय इसकी जरूरत नहीं थी। जरूरत थी राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष की सीट पर कब्जा करना, ताकि जनता में एक संदेश जा सके कि युवा शक्ति अभी कांग्रेस के साथ है। छह साल पहले एनएसयूआई के राजपाल शर्मा अध्यक्ष चुने गए थे, इस बार भी सीट इसी दल के खाते में जाती, तो कांग्र्रेस के नेता कम से कम कुछ कहने की स्थिति में होते। हुआ ऎसा नहीं और परिणाम विपरीत आए। एनएसयूआई की प्रत्याशी स्पर्धा चौधरी तीसरे नंबर पर रहीं और मुकाबला किसी स्तर पर नहीं कर सकीं। किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत युवा शक्ति होती है। युवा शक्ति के छिटकने पर नुकसान तय है और हुआ भी। भाजपा के लिए परिणामों को लेकर ज्यादा उत्साहित होने की जरूरत भी नहीं है। ऎसा नहीं है निकाय और छात्रसंघों के चुनाव परिणाम उनके कारण सकारात्मक रहे हैं, यह तो एंटी इनकंबैंसी का परिणाम है। वैसे पौने दो साल में भाजपा ने कोई पहाड़ नहीं तोड़ लिया, जो इतनी खुश है। यह पौने दो साल तो लड़ाई-झगड़ों में ही बीत गए और अभी भी झगड़े थमने का नाम नहीं ले रहे। हालात किसी से छिपे नहीं हंै। आज भी पार्टी का एक बड़ा वर्ग अरूण चतुर्वेदी को प्रदेशाध्यक्ष और शैलेन्द्र भार्गव को शहर अध्यक्ष के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं है। तभी तो इनके स्तर पर जो सरकार विरोधी कार्यक्रम किए गए, उनसे उन्होंने दूरी बनाए रखी। अलबत्ता युवा तरूणाई जब भी जागती है, नए गुल खिलाती है। यह जागी हुई तरूणाई किस हद तक किसके लिए फायदे का सौदा होगी, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन यह समय आत्मविश्लेषण, समीक्षा और रणनीति बनाने का है। छात्र शक्ति को किस तरह से सकारात्मक इस्तेमाल किया जा सकता है, वह महत्वपूर्ण है। छात्र शक्ति को भी देखना और समझना होगा कि कहीं वे किसी राजनीतिक दल और नेता की कठपुतली तो नहीं बन रही है, क्योंकि लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के आधार पर हुए चुनावों ने इस बार नई इबारत लिखी है। करोड़ों रूपये के धन की बर्बादी से मुक्ति मिली है। न चंदा उगाही की हिम्मत हुई है। छात्र शक्ति की मनमानी पर तो अंकुश लग गया और छात्रसंघ चुनाव के जरिए युवाओं को नेता बनाने की पहली सीढ़ी को उन्होंने अच्छी तरह पार भी कर लिया। अब शुरू होगा उनका असली इम्तिहान। जब उन्हें बचना होगा राजनीतिक गुंडागर्दी, दहशतगर्दी, जमीनों और प्लाटों के कब्जों में अपनी शक्ति के दुरूपयोग से। अब भूमाफिया, शातिर राजनीतिज्ञ और भ्रष्टाचारी उनके चारों और मधुमक्खी की तरह मंडराने लगेंगे। उन्हें तो मानो इस शक्ति के रूप में छह साल बाद फिर हथियार मिल गया। देखना छात्र नेताओं को है कि उन्हें क्या करना है। छात्रसंघ चुनावों की सार्थकता भी उन्हें ही साबित करनी है। उरूक्रम शर्मा
|
|
|
|
|
|
|