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Tuesday, 07 September, 2010
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मुद्दों पर हावी रणनीति
Tuesday, July 27, 2010, 11:01 hrs IST
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संसद का मानसून सत्र सोमवार को प्रारंभ हो गया। सत्र प्रारंभ होने से पहले देश का राजनीतिक माहौल साफ संकेत दे रहा है कि मौजूदा सत्र खासा हंगामेदार होगा। घरेलू और बाहरी तमाम मोर्चो पर बुरी तरह विफल रही सरकार हमलावर विपक्ष से निपटने के लिए अनेक उपाय ढूंढ़ रही है। महंगाई के मुद्दे पर सफल भारत बंद के आयोजन और इस मुद्दे पर मिले अपार जनसमर्थन से गदगद विपक्ष इस सत्र में भी महंगाई को अपना प्रमुख हथियार बनाएगा।
प्रमुख विपक्षी दल भाजपा गुजरात के अमित शाह की सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी को मुख्य मुद्दा बनाना चाहती थी, लेकिन इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में ही दरार दिखने पर भाजपा को बैक होना पड़ा है। समाजवादी पार्टी और वामपंथी दल तो पहले से ही इस मसले पर भाजपा के विरोध में थे, लेकिन भाजपा का जूनियर पार्टनर जनता दल (यू) भी शाह प्रकरण पर असहज है। दरअसल बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और वहां सड़क से लेकर विधानसभा तक चुनाव की रिहर्सल चल रही है। ऎसे में अगर जद (यू) संसद में भाजपा के साथ शाह प्रकरण पर खड़ा होता है, तो बिहार में उसे मुस्लिम मतों से हाथ धोना पड़ेगा। लिहाजा भाजपा ने भी महंगाई को ही विपक्षी एकता का पहला हथियार बनाया है। इस मसले पर वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल भी सरकार को घेरेंगे, लेकिन उनकी कोशिश होगी कि उन्हें भाजपा को साथ न समझा जाए। भाजपा ने मंगलवार 27 जुलाई को महंगाई पर कार्य स्थगन प्रस्ताव लाने की घोषणा की है, जबकि सरकार की मंशा साफ है कि वह कार्य स्थगन पर चर्चा कराने को तैयार नहीं है। इसलिए सत्र की शुरूआत ही नारेबाजी, बायकाट के साथ होने के पूरे आसार हैं। महंगाई के बाद भोपाल गैस कांड दूसरा ऎसा बड़ा मुद्दा होगा, जिस पर सरकार घिरी नजर आएगी। विपक्ष कांग्रेस पर आरोप लगाता रहा है कि तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने ही वारेन एंडरसन को सुरक्षित देश से निकाला था। जाहिर है सरकार इस मसले पर तमाम किंतु-परंतु करेगी और अपनी जवाबदेही से बचना चाहेगी। बताया जाता है भारतीय जनता पार्टी ने इस विषय पर नियम 184 के तहत चर्चा कराने के लिए नोटिस दिया है और सरकार इस नियम के तहत चर्चा कराना नहीं चाहेगी, क्योंकि 184 के तहत चर्चा पर मतदान कराया जाता है। मामूली अंतर से बहुमत प्राप्त सरकार के लिए बार-बार वोट प्रबंधन टेढ़ा काम है। लिहाजा भोपाल गैस त्रासदी पर सरकार और विपक्ष टकराएंगे।
भोपाल गैस त्रासदी मसले पर सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ तो उसे विपक्ष के वार झेलने होंगे, दूसरी ओर सरकार के अंदर यूनियन कार्बाइड और उसकी सहयोगी डाउ केमिकल्स के मददगार समझे जाने वाले कमलनाथ और अभिषेक मनु सिंघवी सरीखों को आउट ऑफ कंट्रोल होने से रोकना बड़ी चुनौती होगा। इससे भी बड़ा सकंट सरकार के सामने अर्जुन सिंह होंगे। अभी तक तो कांग्रेस उनकी चुप्पी बरकरार रखने में कामयाब रही है, लेकिन अर्जुन सिंह ने अगर इस मुद्दे पर मुंह खोल दिया, तो सरकार की खासी फजीहत हो सकती है। बड़े मुद्दों में भारत-पाक वार्ता की विफलता भी शामिल होगी। कृष्णा-कुरैशी वार्ता के ऎन पहले गृह सचिव जीके पिल्लई ने जिस तरह बयानबाजी करके माहौल खराब किया, वह विपक्ष के निशाने पर होगा। हालंाकि विपक्ष इस मसले पर साफ बंटा होगा। भाजपा जहां पिल्लई के समर्थन और कृष्णा के विरोध में होगा, तो शेष विपक्ष पिल्लई के खिलाफ होगा।
स्पेक्ट्रम नीलामी में कथित गड़बडियों के चलते संचार मंत्री ए राजा सरकार की नई मुसीबत बनेंगे। हालांकि सरकार के मैनेजर अंदरूनी तौर पर तो चाहते हैं कि राजा की मुसीबतें बढ़ती ही जाएं, लेकिन राजा के बहाने घिरेगी तो सरकार भी। सरकार के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द रेल मंत्री ममता बनर्जी बनेंगी। विपक्ष खासतौर पर वामपंथी दल सैंथिया रेल हादसे के मद्देनजर ममता के इस्तीफे की मांग करेंगे। विपक्ष यह आरोप लगाता रहा है कि बडे रेल हादसे होने के बाद भी ममता अपने मंत्रालय पर ध्यान नहीं दे रही हैं और रेल मंत्रालय का प्रयोग वह बंगाल में अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं। वामपंथी दल जहां माओवादियों से ममता के दोस्ताना संबंधों की पोल पट्टी खोलेंगे, तो तृणमूल के कुछ सांसद फिर संसद को अखाड़ा बनाना चाहेंगे। बिहार विधानसभा के आसन्न चुनाव की छाया भी संसद के मानसून सत्र पर पडेगी। लालू प्रसाद यादव अपने कुल जमा चार सांसदों के बल पर बिहार के टे्रजरी घोटाले को उठाना चाहेंगे, लेकिन कितना सफल होंगे, यह तो समय बताएगा। राष्ट्रीय महत्व का एक और मुद्दा प्रमुख रूप से केंद्र में होगा। वह यह कि कश्मीर में हाल ही की हिंसा सबका ध्यान खींचेगी। भाजपा इसके बहाने फिर से तुष्टिकरण, धारा 370 का राग अलापेगी और स्वयं को राष्ट्रवादी और बाकी सारे देश को राष्ट्रविरोधी घोषित करेगी। जाहिर है कश्मीर समस्या के समाधान पर चर्चा कम होगी, बल्कि इस समस्या का राजनीतिक दोहन अधिक होगा।
महिला आरक्षण विधेयक व जनगणना में जाति एक बार फिर टकराव का कारण बन सकते हैं। हालांकि महिला आरक्षण का जिन्न सरकार खुद बोतल में बंद रखना चाहेगी, क्योंकि यह विधेयक यूपीए सरकार के लिए बवाल-ए-जान साबित हो सकता है। पिछले सत्र में बड़ी मुश्किल से इस पर सरकार ने अपनी जान बचाई थी। इसी तरह जनगणना में जाति पर भी समाजवादी विपक्ष अपने विरोध की इतिश्री पिछले सत्र में कर चुका है। अगर कोई मुद्दा न मिला, तो फिर इस मुद्दे पर भी हाथ आजमाया जा सकता है। लगता है सरकार की तरफ से भी विपक्ष खासतौर पर भाजपा को घेरने के लिए कमर कसी जा रही है। इसके लिए कर्नाटक में भाजपा के मंत्री रेड्डी बंधुओं का अवैध खनन और एक अंग्रेजी टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन के जरिए फिर चर्चा में आया भगवा आतंकवाद भाजपा के लिए परेशानी का सबब बनेंगे। सोहराबुद्दीन फर्जी एनकाउंटर, भगवा आतंकवाद व अवैध खनन पर खुद को घिरता देख भाजपा संसद को बाधित करने का प्रयास करेगी। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में हालांकि सभी दलों ने सदन को सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए सहयोग देने का औपचारिक वादा तो किया, लेकिन विरोधी दल के नेताओं के तेवर बता रहे थे कि यह वादा झूठा साबित होगा। सरकार इस सत्र में कुल नौ विधेयक रखने वाली है, जबकि 26 नए विधेयक पेश किए जाएंगे। रेल बजट और आम बजट की पूरक व अनुदान मांगों पर विचार कर इन्हें भी पास किया जाएगा, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या 26 जुलाई से 27 अगस्त तक एक माह चलने वाला मानसून सत्र जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरेगा?
लंबे समय से संसद में जनता के सवालों पर स्वस्थ बहस की परंपरा समाप्त होती जा रही है। संभवत: जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव ने पिछले दिनों एक संवाददाता के सवाल के जवाब में खीझकर कहा था कि संसद में राजनीति नहीं होगी, तो क्या कीर्तन होगा? बात बहुत माकूल थी, लेकिन सवाल तो यह है कि राजनीति किसके लिए और किसके सवालों पर होगी? ऎसा क्यों होता है कि अंबानी बंधुओं के सवाल पर तो संसद में काफी बहस होती है, लेकिन जब जनता के सवाल महंगाई पर चर्चा होती है, तो आधे से ज्यादा सांसद गायब होते हैं। संसद के कार्य दिवस में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्नकाल होता है, जो सीधे जनता से जुड़ा होता है। विपक्ष को अपनी बात रखने, सदन में नारेबाजी व बायकाट करने और सदन न चलने देने का हक है, लेकिन अगर प्रश्नकाल में हंगामा किया जाता है, तो यह सीधे उस आम आदमी के हितों पर हमला है, जिसका प्रतिनिधित्व करने का दावा हर राजनैतिक दल करता है। संसद आम आदमी के सवाल उठाने के लिए है।
अमलेंदु उपाध्याय
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं)
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