इच्छाओं का कभी नाश नहीं होता। अतृप्त इच्छाएं अंतस के किसी कोने में छिपी बैठी रहती हैं। संभावनाओं की हवा लगते ही इनकी ताक-झांक शुरू हो जाती है। फिर राजमद तो सभी को होता है। लालू प्रसाद यादव भला इसके अपवाद कैसे हो सकते हैं। कर्पूरी ठाकुर की आवभगत से लेकर राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने में उन्होंने न जाने कितनी बार प्रधानमंत्री बनने के सपने देखे होंगे। सपने देखना बुरा भी नहीं है। जो सपने नहीं देखता, बड़ा आदमी नहीं बनता। पहली बार जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था, तो लालू की बांछें सहज ही खिल गई थीं, उन्हें लगा था कि संप्रग सरकार में कांग्रेस के बाद सबसे बड़ा सहयोगी घटक होने के नाते यह सम्मान उनके ही खाते में जाएगा, लेकिन कुछ सहयोगी दलों के प्रतिरोध के चलते लगभग हाथ आई बाजी उनके हाथ से निकल गई। पिछले चुनाव में तो बिहार की जनता ने ही उन्हें उनकी औकात बता दी। ऎसे में प्रधानमंत्री बनने की उनकी मुराद अधूरी ही रह गई। अपनी वर्षो पुरानी इस हसरत को उन्होंने स्वांग के जरिए पूरा किया। प्रधानमंत्री बनने का यह अभिनय उन्होंने 70 सांसदों के साथ मिलकर किया। कभी अपने प्रधानमंत्री बनने की राह के सबसे बड़े रोड़ा रहे मुलायम सिंह यादव को भी लगे हाथ उप प्रधानमंत्री बनवा दिया। गोपीनाथ मुंडे लोकसभा अध्यक्ष और कीर्ति आजाद नेता विरोधी दल चुने गए और यह सारा स्वांग मौजूदा सरकार को बर्खास्त कर किया गया। कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है और जब नेता खाली होंगे, तो क्या करेंगे, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह सब तब हुआ, जब सांसदों का वेतन पांच गुना बढ़ाने की मांग के मद्देनजर संसद पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। जिस देश में किसान भूख और मुफलिसीवश आत्महत्या को मजबूर हों, जहां कालाहांडी जैसा भुखमरी का ज्वलंत इतिहास हो। जहां का आदिवासी समाज पेंच पीकर और चकवड़ घास खाकर जीवन-बसर करता हो। जहां एक बिरादरी चूहों के बिल से निकले अनाज और चूहों को मारकर ही अपनी आजीविका चलाती हो, वहां के नेता अगर अपनी पगार बढ़ाने की बात करते हैं, तो इससे अधिक विडंबनापूर्ण स्थिति और क्या हो सकती है। जिस देश के नागरिक शिक्षामित्र से अध्यापक बनने के लिए आंदोलनरत हों। जहां सवर्ण भी सफाईकर्मी बनने के लिए लाइन लगाए खड़े हों, उस देश के सांसद अगर अपनी सेवा की मनचाही कीमतें मांगने लगें, तो फिर इस देश का भगवान ही मालिक है। जिस देश की राजधानी यमुना की बाढ़ से कराह रही हो, जिस देश के लगभग सभी प्रांतों के अधिकांश जिले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हों और जिस देश के किसान भूमि अधिग्रहण के एवज में उचित मुआवजे को तरस रहे हों, अलबत्ते उन पर गोलियां और लाठियां बरस रहीं हों, तो फिर ऎसे में अपना वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे सांसदों की खुदगर्जी पर रोना ही आता है। जिस रफ्तार से महंगाई बढ़ रही है, उस लिहाज से सांसदों के वेतन-भत्ते भी बढ़ने चाहिए। इस राय से पूरा देश इत्तेफाक रखता है, लेकिन जनसेवा का दंभ भरने वाले नेताओं को इतना तो सोचना ही चाहिए कि महंगाई केवल उन पर ही असर नहीं डालती। उन्हें यह भी देखना होगा कि एक झटके में अगर उनका वेतन तीन गुना बढ़ जाता है, तो क्या यह देश के नौकरीपेशा लोगों के साथ अन्याय नहीं होगा? देखा जाना चाहिए कि क्या महंगाई के अनुपात में सरकारी और निजी संस्थानों के कर्मचारियों के वेतन भी बढ़ रहे हैं? यदि ऎसा नहीं है, तो जनप्रतिनिधियों को यह हक कैसे मिल जाता है कि वे अपनी सुख-सुविधाओं में बढ़ोतरी के लिए मर्यादा की लक्ष्मण रेखाएं पार कर जाएं? यदि कुछ इसी तरह का प्रदर्शन नौकरशाह और अन्य नागरिक भी करने लगें, तो इस देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? एक बार नारद जी ने कहा था कि आती हुई लक्ष्मी सभी को अच्छी लगती है। शायद यही वजह है कि सांसदों का वेतन बढ़ाने की मांग के हामी पक्ष-विपक्ष दोनों बने। कुछ ने खुलकर साथ दिया, तो कुछ ने तटस्थ रह कर। खुशी के लaू तो सभी के मन में फूट रहे थे, बस बिल्ली के गले में घंटी बांधने की बात थी। सो यह उपक्रम लालू ने पूरा कर दिया। सांसदों के विरोध को देखते हुए उनकी पगार तीन गुना बढ़ा दी गई, लेकिन इसके बाद भी वे खुश नहीं हैं। ठीक उसी तरह जैसे दामाद सब कुछ पाकर भी मुंह फुलाए रहता है। सांसद प्रशासनिक अफसरों से अधिक वेतन चाहते हैं और इसके लिए उनका वेतन पांच गुना बढ़ाना पडेगा। जो भी हो, सरकार पर स्वांग का असर दिखने लगा है और वह एक बार फिर सांसदों का वेतन बढ़ाने पर विचार कर रही है। राजग के संयोजक शरद यादव की मानें, तो सांसदों का वेतन 50 हजार से बढ़कर 65 हजार तक हो सकता है, लेकिन इसके बाद भी नेताओं की हीन भावना का अंत तो होना नहीं है। जिन अधिकारियों को वे बेमुरव्वत डांटते हैं, उनके वेतन की अधिकता उन्हें इसके बाद भी कहीं न कहीं झेंपने को विवश तो करती ही रहेगी। सांसदों को इस देश को इतना तो बताना ही होगा कि आजादी के बाद से आज तक उन्होंने ऎसा क्या चमत्कार कर दिया है, जिसके चलते उनका वेतन पांच गुना बढ़ा दिया जाए। एकबारगी मान भी लें कि सांसदों को प्रशासनिक अफसरों के बराबर वेतन मिलना चाहिए, लेकिन उनकी जवाबदेही भी तो तय होनी चाहिए कि वे भी एक आईएएस अफसर की मानिंद काम करेंगे। 40 हजार निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और इतना ही कार्यालय भत्ता लेने वाले सांसदों को इतना तो बताना ही चाहिए कि वे अपने क्षेत्र के कितने गांवों में गए और उन गांवों की किस बड़ी या छोटी समस्या का समाधान उनके स्तर पर हुआ। बहुत से ऎसे भी सांसद हैं, जिन्होंने चुनाव जीतने के बाद से आज तक अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता की ओर रूख ही नहीं किया है। ऎसे सांसदों को क्या अधिकार है कि वे अपना वेतन बढ़ाने की मांग करें। कानून बनाना सांसदों का विशेषाधिकार है, लेकिन वे कानून बनाते किसके लिए हैं। जनता के लिए न? नौकरीपेशा लोगों की परेशानियों की चिंता नहीं और वे पिल गए अपना वेतन बढ़वाने। क्या सांसदों के इसी आचरण के बल पर देश में समरस समाज की स्थापना होगी? लालू के इन तर्को में दम है कि उन्हें अपने क्षेत्र के लोगों का ध्यान रखना पड़ता है, लेकिन पांच गुना पगार मांगने से पहले उन्हें इतना तो सोचना ही चाहिए था कि क्या उनके और राबड़ी देवी की सरकार में बिहार के नौकरीपेशा लोगों को समय से वेतन मिल पा रहा था। स्कूटर पर भैंस बैठाने या कोलतार पीने का चमत्कार आसान है। पाकिस्तान में प्याज और सत्तू खाने का मसखरापन भी किया जा सकता है, लेकिन वेतन वृद्धि के मसले को इतने हलके भी नहीं लिया जा सकता। मायावती को इस मामले में दाद देनी होगी। उन्होंने उत्तर प्रदेश में सपा को अपनी पार्टी का समर्थन दिया, तो तय कर लिया कि मुख्यमंत्री मामले में फिफ्टी-फिफ्टी ही चलेगा। भाजपा के साथ भी उन्होंने ऎसा ही किया। भले ही उनका गठजोड़ लंबा नहीं चला, लेकिन किसी को भी स्वांग करने की जरूरत नहीं पड़ी। लालू पहले ही तय कर लेते कि केंद्र का साथ देना है, तो उसकी रूपरेखा क्या होगी। अब वे इमामों के लिए भी वेतन मांग रहे हैं। सुप्रीमकोर्ट के 18 साल पहले दिए गए फैसले के आलोक में दरअसल वे ऎसा कर रहे हैं, लेकिन यह राजनीतिक फायदे के सिवा और क्या है? बिहार विधानसभा चुनाव के पहले लालू ने पलीते में आग लगाकर अन्य धर्माचार्यों को वेतन मांगने का अधिकार तो दे ही दिया है। सवाल वेतन देने और बढ़ाने का नहीं है, सवाल है संसाधन जुटाने का। नेताओं को इतना तो सोचना ही होगा कि जिस देश में सरकारी सेवाओं में भी अनुबंध पर नियुक्तियां होने लगी हैं, उनमें केवल एक दिन के सांसद रहने पर भी 20 हजार रूपये मासिक पेंशन का भार यह देश कैसे वहन करेगा? अच्छा होता कि सांसद अपने लिए खुद आचार संहिता बनाते और यह तय करते कि वे देश के लिए खासकर अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए क्या कुछ खास करेंगे। योजना बनाते कि पांच साल में वे कितने गांवों को अत्याधुनिक सुविधाओं से जोड़ सकेंगे। एस. पी. शांत (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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