शाहरूख खान की एक हिट फिल्म है ओम शांति ओम। उसमें एक मशहूर डायलॉग है, जिसमें वे कहते हैं कि अगर किसी को दिल से चाहो तो उसे मिलाने में पूरी कायनात जुट जाती है। कायनात जुटती हो या नहीं जुटती हो, यह तो नहीं पता, लेकिन जब अमेरिका चाहता है, तो पूरी कायनात उसके साथ होती है। चाहे हरेक के लिए अमेरिका से जुड़ने के अपने-अपने मायने हों, लेकिन अमेरिका अपना हित जरूर साध लेता है। यह वह वियतनाम, क्यूबा से करता आया है और हालिया इराक और अफगानिस्तान में करने के बाद अब उसने अपना निशाना ईरान को बनाया है। उसकी इस फेरहिस्त में उत्तरी कोरिया, सीरिया, लेबनान, जार्डन सरीखे देश भी हैं, लेकिन फिलहाल उसकी नजर इराक और अफगानिस्तान के बीच में फंसे देश ईरान पर है। अमेरिका की इस कायनात में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए), यूरोपीय संघ और कुछ अनमने राष्ट्र आते हैं। ये अनमने राष्ट्र वे होते हैं, जो संयुक्त राष्ट्र के नाम पर मन मारकर अमेरिका की ओर खड़े दिखाई देते हैं। इन अनमने राष्ट्रों में रूस, चीन के अलावा भारत भी है। फिलहाल अमेरिका की इस कायनात ने ईरान को घेर रखा है। हालांकि अमेरिका ने इसकी तैयारी डेढ़ दशक पहले ही शुरू कर दी थी, लेकिन बीते पांच साल में उसने ईरान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। ईरान को घेरने के लिए सीधा-सीधा आरोप लगाया कि वह परमाणु बम बनाने जा रहा है। ईरान इससे इनकार करता है। उसका कहना है कि उसने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं और किसी भी अन्य राष्ट्र की तरह उसे भी परमाणु ऊर्जा का उपयोग करने का अधिकार है। अमेरिका को ईरान का यह तर्क समझ नहीं आता है। अमेरिका का कहना है कि परमाणु ऊर्जा उत्पादन की आड़ में ईरान परमाणु बम बनाने की ओर अग्रसर है। तकनीकी तौर पर देखें, तो अमेरिका की आशंका सही है। कोई भी देश जो परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन करता है, उसके इसकी आड़ में परमाणु बम बनाने की आशंका प्रबल हो जाती है। बिजली उत्पादन के लिए 3.5 फीसदी संवर्धित यूरेनियम चाहिए। यूरेनियम अगर 20 फीसदी संवर्धित हो, तो उसका उपयोग औषधि व अनुसंधान के क्षेत्र में किया जाता है, लेकिन अगर वह 90 फीसदी संवर्धित हो, तो उससे परमाणु बम बनाया जा सकता है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों की मानें, तो ईरान के पास फिलहाल 20 किग्रा 20 फीसदी वाला संवर्धित यूरेनियम है। इससे एक हल्का परमाणु बम बनाया जा सकता है। कच्चे यूरेनियम को संवर्धित करने में सबसे ज्यादा 90 फीसदी ऊर्जा उसे 0.7 से 20 फीसदी तक करने में खर्च होती है। उसके बाद उसे 20 से 90 फीसदी तक संवर्धित करने के लिए ज्यादा ऊर्जा या तकनीक की जरूरत नहीं होती है। अमेरिका को यही चिंता खाए जा रही है। इसीलिए उसने बीते साल अक्टूबर में ईरान के साथ बातचीत तोड़ी थी। अक्टूबर में सुरक्षा परिषद के पांचों सदस्यों के साथ जर्मनी (जी 5+1) ईरान को मनाने में लगा हुआ था। इसके अलावा विएना समूह (रूस, अमेरिका, फांस, आईएईए) भी ईरान को मनाने में लगा हुआ था। विवाद था कि ईरान को तेहरान स्थित नतांज अनुसंधान रिएक्टर के लिए 20 फीसदी वाला संवर्धित यूरेनियम चाहिए था। आईएईए के प्रस्ताव पर जब ईरान ने स्वीकार किया कि वह 20 फीसदी संवर्धित यूरेनियम के लिए अपना एक तिहाई 3.5 फीसदी संवर्धित यूरेनियम तीसरे देश को देने के लिए तैयार है, तो इसका फ्रांस और अमेरिका ने विरोध किया। जैसे-तैसे फ्रांस और अमेरिका ने इस प्रस्ताव को माना, लेकिन 20 फीसदी संवर्धित यूरेनियम उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने सात से आठ महीने का समय मांगा। ईरान इसी बात पर बिफर पड़ा। ईरान का कहना था कि उसका नतांज रिएक्टर खाली हो चला है। उसे दो महीने में ही संवर्धित यूरेनियम चाहिए। इसी मुद्दे पर ईरान की विएना समूह से भी बातचीत टूट गई। इसी मसले को ईरान ने अपने ढंग से सुलझाते हुए बीती 17 मई को तेहरान में तुर्की और ब्राजील के साथ करार किया, जिसमें 1200 किलोग्राम 3.5 फीसदी संवर्धित यूरेनियम तुर्की को देना तय हुआ। बदले में 120 किग्रा 20 फीसदी संवर्धित यूरेनियम उसे मिलना तय हुआ। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इसका कड़ा विरोध किया। इसके 22 दिन बाद 9 जून को संयुक्त राष्ट्र परिषद में प्रस्ताव लाकर ईरान के खिलाफ चौथा आर्थिक और सामरिक प्रतिबंध लगाया गया। अमेरिका का इससे भी पेट नहीं भरा, तो उसने और यूरोप ने बीती जुलाई में ऎलान किया कि कोई भी देश ईरान के साथ किसी भी तरह की परमाणु प्रक्रिया या तेल से जुड़ा कोई करार नहीं करेगा और अगर ऎसा किया गया, तो ऎसी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। चीन, रूस और कुछ हद तक भारत ने अमेरिका और यूरोप के इस एक तरफा प्रतिबंध को मानने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि वे संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध (9 जून) से बंधे हैं, लेकिन अमेरिका और यूरोप का यह नया प्रतिबंध (जुलाई) उन्हें स्वीकार नहीं है। चीन की तेल कंपनियों ने हाल ही गैसोलीन से भरे चार जहाजों की आपूर्ति ईरान को की है। तुर्की की कंपनी टपरास भी इतने ही गैसोलीन कार्गो की आपूर्ति ईरान को करने जा रही है। रूस का भी कहना है कि वह अगले महीने के पहले पखवाड़े में ईरान को गैसोलीन की आपूर्ति करेगा। वैनेजुआला भी ईरान को यही कहकर गैसोलीन की आपूर्ति कर रहा है कि वह यूएन के करार से बंधा है, ना कि यूएस और यूरोप के प्रतिबंधों से। भारत ने भी फिर से ईरान के साथ 7.4 बिलियन डॉलर राशि वाली गैस पाइप लाइन परियोजना पर बातचीत शुरू कर दी है। चीन ने ईरान के तेल क्षेत्र में 40 बिलियन डॉलर का निवेश किया हुआ है। वह ईरान को तेल की 7 रिफाइनरी लगाकर दे रहा है। विश्व में तेल उत्पादन में पांचवा स्थान रखने वाला ईरान चीन के उसके कुल तेल आयात में चौथी सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखता है। भारत को वह अपने कुल उत्पादन का 10 फीसदी तेल निर्यात करता है। हालांकि इस सबके बावजूद ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर दिखाई देने लगा है। कई बड़ी तेल कंपनियों रॉयल डच, शैल, रिलायंस, वाइटॉल समूह, ग्लेनकोर, इंटरनेशनल एजी आदि ने ईरान को गैसोलीन आपूर्ति करना बंद कर दिया है। ईरान में जहां बीती मई में एक दिन में 1 लाख 20 हजार बैरल गैसोलीन आपूर्ति हो रहा था, अब वह आधा घटकर 60 हजार बैरल प्रतिदिन पर आ टिका है। पश्चिमी मीडिया के यह आंकड़े ईरानी समर्थकों को जरूर हतोत्साहित कर सकते हैं, लेकिन अमेरिकी, यूरोपीय और भारत की तेल कंपनियों के अलावा चीन, रूस और लेटिन अमेरिका की तेल कंपनियों को रोकना अमेरिका और यूरोप के लिए मुश्किल होगा। विदेशी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने की हिमाकत 1998 में बिल क्लिंटन ने भी दिखाई थी, लेकिन विरोध के कारण क्लिंटन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। इजराइल ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हवाई हमले करने को आतुर हो रहा है, लेकिन अगर उसने ऎसा किया, तो उसे ही नहीं अमेरिका को अपने घर में और बाहर दोनों ओर भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। एक आंकलन के मुताबिक मध्य-पूर्व में तीसरे विश्व युद्ध की भी शुरूआत हो सकती है, क्योंकि इजराइल हमले के बाद ईरान समर्थक आतंकी संगठन और अरब देश भी चुप नहीं बैठेंगे। ऎसे में ओबामा को ईरान के साथ 100 मीटर (हमले) के बजाए मैराथन (बातचीत, कूटनीति और व्यापार) की रणनीति अपनानी होगी। जैसा कि उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 70 के दशक में इजिप्ट और चीन के साथ किया था। आज चीन ही अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। या यूं कह लीजिए चीन की अर्थव्यवस्था के कारण ही अमेरिका सब-प्राइम क्राइसेस की मंदी से निकल पाया। घनेन्द्र सिंह सरोहा (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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