जयपुर में एक तीन साल की बच्ची से बलात्कार कर उसे मार डाला गया, लेकिन शायद ही किसी के मन को इस घटना ने झकझौरा। किसी के जेहन में इस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की हूक भी नहीं उठी, आखिर क्यों? क्योंकि संवेदनशीलता का वजूद खत्म होता जा रहा है। औरत की लुटती अस्मत मूक होकर देखने की सभी की आदत सी हो गई है। ज्यादातर लोग इस सोच के गुलाम हैं कि उनका इससे क्या सरोकार? खुलेआम हो रहा महिला उत्पीड़न यह सवाल खड़ा करता है कि क्या किसी में जरा भी शर्म नहीं बची है? क्या किसी को ऎसी घटनाएं पढ़कर रोष नहीं आता? क्या किसी का दिल नहीं पसीजता किसी की मासूम चीख सुनकर? महिला उत्पीड़न की भयावह तस्वीर इस बात का उत्तर देती नजर आ रही है। देश में महिलाओं के विरूद्ध हुए कुल पंजीकृत अपराध प्रतिवर्ष बढ़ते जा रहे हैं। वर्ष 2004 में इनकी कुल संख्या 154333 थी, जो 2008 में बढ़कर 195856 हो गई। 2008 में देश में प्रतिदिन 537 अपराध महिलाओं के विरूद्ध घटित हुए, यानी 22 प्रति घंटे। देश में हर रोज बलात्कार के 59 मामले दर्ज होते हैं, 63 का अपहरण होता है, 33 यौन उत्पीड़न का शिकार होती हैं और रोजाना 111 महिलाओं से छेड़छाड़ की जाती है। 223 महिलाएं पति या रिश्तेदारों द्वारा प्रताडित की जाती हैं। हर रोज 22 महिलाओं को दहेज के लिए मार दिया जाता है। 15 बहुओं को अधिक दहेज की मांग के कारण उत्पीडित होना पड़ता है। प्रति 24 मिनट में एक महिला से बलात्कार होता है। 22 मिनट में अपहरण। 12 मिनट में छेड़छाड़। 6 मिनट में पति या रिश्तेदार द्वारा प्रताड़ना। 43 मिनट में यौन उत्पीड़न। राजस्थान भी इस मामले में पीछे नहीं है। प्रदेश में प्रतिदिन 19 महिलाओं का उत्पीड़न होता है। आठ महिलाओं से छेड़छाड़ होती है और 5 का अपहरण किया जाता है। हर आठ घंटे में एक महिला से बलात्कार होता है। प्रदेश में होने वाली कुल हत्याओं का करीब 26 फीसदी हिस्सा दहेज मृत्यु और आत्महत्या में दर्ज होता है। अबोध बालिकाओं से बलात्कार के शर्मनाक हादसों में भी बढ़ोतरी हुई है। यह घोर विडंबना है कि आज औरत की अस्मत भगवान के मंदिर में भी महफूज नहीं है। ध्यातव्य है कि 28 जून, 2003 को जयपुर में ब्रह्मपुरी स्थित संकट मोचन हनुमान मंदिर में कथित तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक के बहाने बुलाकर पुजारी ने एक अधेड़ विधवा से बलात्कार किया। यह घटना अपवाद नहीं है। जयपुर में रामद्वारा में भी महंत के सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ था। दुखद है कि नृशंस बलात्कार के साथ-साथ पनपता देह व्यापार, पसरता दुराचार और फलता-फूलता व्यभिचार राष्ट्र की संस्कृति को विषाक्त कर रहा है। पार्लरों में समाज की आड़ में देह व्यापार के धंधे ने भी देश के कई मुख्य नगरों में अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी हैं। शहर से बाहर बसी बस्तियों में किराए पर कमरे लेकर वहां वेश्यावृत्ति होना एक आम बात हो गई है। निर्माणाधीन बड़े-बड़े कॉम्पलेक्सों में काम करने वाली ग्रामीण मजदूरनियों को धन का लालच देकर इस घिनौने पेशे में ढकेला जा रहा है। ग्रामीण अंचलों में भी अनैतिक धंधे पनप रहे हैं और राजमार्गो पर भी वेश्यावृत्ति के अड्डे खुले आम चल रहे हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2002-2004 के दौरान कराए एक सर्वे से विदित हुआ कि देश में 28 लाख वेश्याएं थीं, जिसमें 36 प्रतिशत बालिकाएं थीं। पर तब से तो देह व्यापार सुरसा के मुंह की तरह बढ़ गया है, जो महिला देह को कचोटता-नोचता रहता है। यह एक त्रासदी है कि महिला के विरूद्ध अपराधों में सजायाफ्ता करीबन 30 प्रतिशत रहती है। दहेज हत्या, बलात्कार और महिला उत्पीड़न के गंभीर मामलों में भी औसतन 18 फीसदी दोषियों को ही सजा मिल पाती है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि बलात्कार और अपहरण के 80 फीसदी मामलों में सजा नहीं होने के पीछे मुख्य कारण पीडिता का बयानों से मुकरना होता है। दंड संहिता की धारा 164 के तहत होने वाले बयानों से भी वह यह कहकर मुकर जाती है कि उसने पुलिस के दबाव की वजह से गलत बयान दिए थे। दहेज संबंधी मामलों में रिश्तेदार या पंच बीच-बचाव करके मामला रफा-दफा करा देते हैं। जब पीडिता गवाही के लिए आती है, तो डरी, सहमी एक कोने में मुंह छिपाए बैठी रहती है। इसके ठीक विपरीत मुलजिम पक्ष बाहुबलियों के साए में धुरंधर वकीलों के लवाजमे के साथ आता है। पीडिता को घर-परिवार ही आश्रय देने को तैयार नहीं होता। लंबी तारीखों, झूठे गवाहों, पैसा लेकर कुतर्को से सताई औरत को तोड़ते वकीलों और पीडिता को सैक्स वर्कर घोषित करने की होड़ में न्याय क्षेत्र अन्याय क्षेत्र बन जाते हैं। सारे कानून सताई औरतों के लिए हार और बलात्कारी पुरूषों के लिए बचने के रास्ते ही साबित होते हैं। ऎसे में पीडिता पक्ष आधा तो मनोवैज्ञानिक रूप से ही टूट जाता है। मजबूरीवश पीडिता पक्षद्रोही हो जाती है, जिसका सीधा फायदा मुलजिम को मिलता है। मुकदमों के फैसले में भी सालों-साल लग जाते हैं। यह बात आम है कि अगर कोई महिला वहशीपन का शिकार होती है, तो उसके ही चरित्र की पड़ताल शुरू हो जाती है, ताकि यह साबित किया जा सके कि मामला संदिग्ध है, जबकि मथुरा बलात्कार कांड में सर्वोच्च न्यायालय ने यह बात स्पष्ट की है कि ऎसी पड़ताल करके अत्याचारियों को बचाना अनुचित व अन्यायपूर्ण है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत तो सजायाफ्ता नगण्य है। कछुआ चाल से हो रही लिखा-पढ़ी और कानून की जटिलता ने बलात्कार के मुकदमों की सुनवाई को प्रहसन जैसा बनाकर रख दिया है। औरत की अस्मत एवं असुरक्षा का उपरोक्त भयावह मंजर हमारे सभ्य समाज के दामन पर एक बदनुमा स्याह धब्बा है और कानून के मुंह पर एक करारा तमाचा है। आश्चर्य है कि आज द्रोपदी का सरेआम चीर-हरण हो रहा है, पर किसी का खून नहीं खोलता। सरेआम कुंठित, ओछी व विकृत मानसिकता के लोग महिलाओं पर फब्तियां कसते हैं, उनके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करते हैं। फिर भी ऎसा देखने वाले मौन साधे बैठे रहते हैं। वे सोचते हैं कि जिसके साथ ऎसा हो रहा है, वह उनकी क्या लगती है, लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि इसी तरह उनके परिवार की महिलाएं भी उत्पीड़न की शिकार होती हैं और कोई उसे रोकने के लिए आगे उठकर नहीं आता। आज हमारे देश की आधी आबादी का जमीनी सच यही है कि वह जितना पहले अनपढ़ होकर अत्याचार का शिकार होती है, उतना ही आज पढ़-लिखकर समर्थ होने के बाद भी वह घुटन और दहशत में जी रही है। हालात यह हैं कि घर में अपने खून के रिश्तों के बीच भी वह सुरक्षित नहीं है। बलात्कार के कलंक से सगे भाई और बाप भी नहीं बच पाए हैं। और तो और जिन्हें वह अपना समझती है, वे ही उसके आंचल को तार-तार करने पर उतारू हैं। घर से बाहर कार्यस्थल की बात करें, तो स्थितियां कुछ अलग नहीं हैं। यहां भी महिलाएं यौन उत्पीड़न सहकर ही काम करने के लिए विवश हैं। उपरोक्त महज आंकड़े हैं, पर हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयावह है। शर्म, संकोच, भय और लोकलाज के कारण उत्पीड़न के सारे मामले रिपोर्ट नहीं होते। कुछ रिपोर्ट होने पर भी दर्ज नहीं होते। उत्पीड़न का उपरोक्त लेखा-जोखा केवल अर्द्धसत्य को उद्घाटित करता है, केवल हिमखंड का शीर्ष ही इंगित करता है, जिसकी विशाल काया का विस्तार गुमनामी के अथाह सागर में ही डूबा रहता है, पर नारी की इस व्यथा कथा से किसी शरीफजादे के कान पर जूं क्यों नहीं रेंगती? महिला की असुरक्षा की भयावह तस्वीर से सरकार और समाज कुछ कर गुजरने को क्यों नहीं उत्प्रेरित होते? ऎसा नहीं है कि पूरा समाज महिलाओं की इस दुखद स्थिति को महसूूस नहीं कर रहा है, पर क्या वजह है कि कोई कुछ बोलता नहीं है? डॉ. ज्ञान प्रकाश पिलानिया (लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)
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