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Saturday, 19 May, 2012
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बदलाव या भटकाव
Tuesday, February 14, 2012, 12:15 hrs IST
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वेलेन्टाइन डे यानी प्रेम की एक दिवसीय संस्कृति का बहुरंगीय बाजार अपने शबाब पर है। इस दिवस के जश्न में मीडिया भी पीछे क्यों रहे? मीडिया ने तो वेलेन्टाइन डे के एक सप्ताह पूर्व से ही लोगों की स्मृतियों को भड़काना शुरू कर दिया। बहरहाल, इस डे पर मादक वसंती हवाओं का मौसम उफान पर है। युवा मस्तिष्क रूमानी स्वप्न बुनने में मस्त हैं। आप चाहें इसे पसंद करें या न करें, यह दिवस सभी वर्गो के युवाओं के लिए एक विशाल उत्सव बन चुका है। इस उत्सव का कड़वा सच यह है कि अब यह दिवस केवल उपहारों के आदान-प्रदान तथा प्रेम के मासूम पलों की साझेदारी का ही बहाना नहीं रहा है, बल्कि अब यह प्रेम के स्थान पर पारस्परिक यौन आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का दिवस भी बन रहा है। समय रहते इसके इस मनोविज्ञान पर दृष्टिपात करना समय की मांग अनुभव हो रही है।

कहना न होगा कि हर वर्ष 14 फरवरी आते ही वेलेन्टाइन डे के पक्ष में वैश्विक युवा संस्कृति का खुमार एवं विपक्ष में समाज की भौंहें चढ़नी शुरू हो जाती हैं। हम कभी उस विचारधारा को समझने का प्रयास नहीं करते, जो इस प्रकार के दिवसों की भूमिका अदा करती है।

यह वह विचारधारा है, जो लोगों में घटते प्रेम व वात्सल्य के एहसास को उदारीकृत बाजार से प्राण वायु लेकर विस्तार देने का प्रयास करती है। जरा इतिहास में झांकने की कोशिश करें तो हमें संत वेलेन्टाइन के बारे में कोई पुष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती, जिनके नाम पर यह डे मनाया जाता है। चौदह फरवरी के साथ सीधे तौर पर एक मान्यता यह जुड़ी है कि वेलेन्टाइन नामक पादरी को उस समय के यूनानी शासक क्लाउडियस ने ईसा के मत के प्रचार के अपराध में जेल में डाल दिया और इस दिन उनका सिर धड़ से अलग कर दिया था।

ऎसा माना जाता है कि जिस दिन उन्हें मौत के घाट उतराया गया, उसी रात उनकी मृत्यु से पहले उसने जेलर की बेटी को अलविदा का एक पत्र लिखा था, जिसके अंत में उसने लिखा था- तुम्हारा वेलेन्टाइन। ऎसी संभावना है कि उसे उस लड़की से प्यार हो गया था। तभी से दंडित किए गए सेंट वेलेन्टाइन के मार्मिक और अपूर्ण रहे प्रेम की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है। इसी के साथ दूसरी मान्यता यह भी जुड़ी है कि वेलेन्टाइन जब जेल में थे तो उन्हें रोम के बच्चों के असंख्य पत्र प्राप्त हुए थे, जो उन्हें बेतहाशा प्यार करते थे।

कुछ इस दिवस की जड़ें उस पुरानी यूरोपीय लोक मान्यता के भीतर भी तलाशते हैं, जहां यह धारणा उन दिनों खूब प्रचलित थी कि संसारभर की सभी प्रजातियों के पक्षी चौदह फरवरी के दिन अपना जोड़ा बनाते हैं। वेलेन्टाइन डे से जुड़ा इतिहास व किंवदंतियां चाहे जो हों, परंतु कहीं न कहीं यह दिवस प्रेम की प्राकृतिक भावनाओं को संजोते हुए श्ृंगार को अभिव्यक्त करने का दिवस है। हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह समाज अब वैश्विक व उदारीकृत समाज की शक्ल ले रहा है। यह संभव नहीं कि भारतीय समाज को विदेशी बाजारों के लिए खोल देने के बाद पश्चिमी संस्कृति का प्रवेश न हो। इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वेलेन्टाइन डे जैसे उत्सव हमारी अपनी स्वदेशी संस्कृति से मेल नहीं खाते, परंतु इस बेमेल संस्कृति को भारत में लाने के लिए उन्हीं नीति निर्धारकों का हाथ रहा है, जो आज इससे बचने का प्रयास कर रहे हैं।

आज के बच्चे यदि अब संस्कृति को अपनाने, रेव पार्टियों के आयोजित करने अथवा वेलेन्टाइन डे के प्रति समर्पण करने में जो अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, उसमें परिवारों की घटती भूमिका प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। इसमें सेवा क्षेत्र का विस्तार भी उतना ही भागीदार है। कड़वा सत्य यह है कि बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में परिजनों की घटती भूमिका, बच्चों के मध्य पारिवारिक साझेदारी एवं उनसे प्रेम करने की भावना बच्चों में प्रेममय सुख एवं सुरक्षा की भावना का संचार करती है। घर का प्रेम व वात्सल्य बच्चों में एक प्रकार की सुरक्षा का आवरण प्रदान करता है।

अफसोस की बात यह है कि परिवार की भावमयी एवं वात्सल्य से ओत-प्रोत संकल्पना के पीछे छूट जाने से किशोर मन की संवेदनाएं घायल अवस्था में हैं। उस पर मरहम लगाने का काम न तो परिवार कर रहे हैं और न ही स्कूल और स्कूली पाठ्यक्रम। व्यावसायिक सिनेमा व दूरदर्शन के सीरियल, संवाद एवं पात्रों के चरित्र का तीन चौथाई भाग भी प्रेम प्रसंगों से ही भरा रहता है। यही कारण है कि उन पात्रों के प्रेम प्रसंग किशोरों के जीवन को सीधे रूप में प्रभावित कर रहे हैं। इससे किशोर मन की वर्जनाएं टूट रही हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता बढ़ रही है, विवेक लुप्त हो रहा है और प्रेम के प्रसंग उनको तात्कालिक सुख की अनुभूति करा रहे हैं। यह मीडिया क्रांति का भी प्रभाव है कि इससे यौनगत आजादी का प्रसार तेजी से हुआ है तथा विवाह पूर्व यौन संबंधों की अवधारणा निरंतर विस्तार ले रही है।

भारत में प्रतिवर्ष 50 लाख गर्भपात 20 वर्ष तक की आयु की किशोरियों द्वारा कराए जाते हैं। तथ्यों की गंभीरता यह है कि यह सभी गर्भपात किशोरियों के युवा मित्रों द्वारा स्कूल समय में कराए गए थे। शायद वेलेन्टाइन डे से विस्तारित खुली यौन स्वछंदता की पृष्ठभूमि में छिपी इस घटना का अध्ययन करना समीचीन होगा। निश्चित ही वेलेन्टाइन डे की भावना में कोई दोष नहीं है। दोष तो एक दिवसीय मदनोत्सव की संस्कृति में है, जो सारी वर्जनाओं को ध्वस्त करके बाजार की संस्कृति का हिस्सा बनकर आक्रामक स्वरूप अपना रही है। यदि वेलेन्टाइन डे के वर्तमान आक्रामक स्वरूप को रोकना है तो हमें अपनी पारिवारिक गिरेबां में झांककर देखना पड़ेगा कि कहीं हमारा बच्चों से भावनात्मक व रागात्मक अलगाव तो उन्हें इस प्रेम की अस्थायी ज्वाला में तो नहीं झोंक रहा।
डॉ. विशेष गुप्ता
(लेखक जाने-माने समाजशास्त्री हैं)
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