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Saturday, 19 May, 2012
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उत्पीड़न बढ़ाती सुरक्षा
Monday, February 13, 2012, 12:16 hrs IST
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हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट न सिर्फ संविधान की रक्षक है, बल्कि उसके जिम्मे मानव अधिकारों की हिफाजत भी है। जब भी कभी संविधान पर आंच आती है, या कहीं मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, सुप्रीम कोर्ट अपने आदेशों और निर्देशों से अपना सार्थक हस्तक्षेप करता है। इंसाफ और मानवाधिकारों की बहाली के लिए सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में ऎसा ही एक हस्तक्षेप किया है। अदालत ने जम्मू-कश्मीर के बहुचर्चित पथरीबल फर्जी मुठभेड़ मामले में सेना के टाल-मटोल रवैए पर अपनी नाराजगी जताई है। अदालत खासतौर पर इस बात से खफा थी कि एक दशक पुराना मामला अभी सुनवाई के चरण तक भी नहीं पहुंचा। सेना ने न तो मुल्जिम अफसरों के खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई की और न ही सीबीआई को उन पर आपराधिक मामला चलाने की इजाजत दी। मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों ने साफ कर दिया कि अब यह देरी नाकाबिले बर्दाश्त है। सेना दोषी लोगों पर जल्द कार्रवाई करे।

गौरतलब है कि यह मामला वर्ष 2000 का है। सारी कश्मीर घाटी उस वक्त आतंकवाद के साए में थी। ऎसे ही दहशत के माहौल में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने चट्टीसिंहपुरा गांव में 35 सिखों का नरसंहार कर दिया। जब यह नरसंहार हुआ, तो पूरा मुल्क सकते में आ गया। आतंकवादियों की इस वहशियाना हरकत के बाद सेना के ऊपर जवाबी कार्रवाई का दबाव बना। बहरहाल, सेना ने हत्याकांड के 5 दिन बाद दक्षिणी कश्मीर के पथरीबल में मुठभेड़ में 5 लोगों को मार गिराया। इस मुठभेड़ के बाद सेना ने दावा किया कि यह वही लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी हैं, जो कि चट्टीसिंहपुरा गांव नरसंहार में शामिल थे। मगर स्थानीय लोगों ने सेना की इस कथित मुठभेड़ को फर्जी बतलाया। घाटी में सेना की इस कार्रवाई के खिलाफ जब धरने-प्रदर्शन हुए, तो सरकार ने इस मुठभेड़ की जांच सीबीआई को सौंप दी। मृत लोगों की लाशें कब्र से निकालकर उनकी फॉरेंसिक और डीएनए जांच हुई। सीबीआई की जब फाइनल रिपोर्ट आई, तो सेना का दावा झूठा निकला। सेना जिन्हें लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी बतला रही थी, वे दरअसल निर्दोष नागरिक थे।

सीबीआई ने जांच के बाद इस मामले में सेना के एक बिग्रेडियर समेत 5 सैन्य जवानों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर की, लेकिन सेना ने सीबीआई को उच्च अदालत में यह दलील देकर चुनौती दी कि चार्जशीट दाखिल करने से पहले सीबीआई ने उससे इजाजत नहीं ली। यानी, सेना कश्मीर घाटी में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून का नाजायज फायदा उठा रही है, जिसके तहत उसे यहां बेलगाम छूट मिली हुई है। सेना नहीं चाहती कि इस मामले में उसके कर्मियों के प्रति अभियोजन की कारवाई हो। यही नहीं, जांच रिपोर्ट में मुठभेड़ फर्जी साबित होने के बाद भी वह इसे फर्जी मानने को तैयार नहीं। बहरहाल, सेना को जब अधीनस्थ अदालतों से कोई राहत नहीं मिली, तो वह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। जाहिर है, सर्वोच्च अदालत उसी आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है। सीबीआई का सेना पर इल्जाम है कि वह इस मामले को रफा-दफा करना चाहती है। लिहाजा, वह इसे अभी तक जानबूझकर लटकाए हुए है। सीबीआई का यह इल्जाम कहीं से गलत नहीं। फर्जी मुठभेड़ के सभी आरोपी आज भी सेना की सेवा में हैं। उनमें से किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई।

अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक दीगर मामले की सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार से विशेष सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून और सेना से जुड़े दीगर कानूनों पर अपना रूख स्पष्ट करने को कहा था। फर्जी मुठभेड़ के दो अलग-अलग मामलों में, सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को आपराधिक मुकदमों से छूट देने पर केन्द्र सरकार से जुदा नजरिया रखते हुए, अदालत ने केन्द्र सरकार से जवाब तलब करते हुए कहा था कि क्या सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को आधिकारिक दायित्व निभाते वक्त किए गए दंडात्मक कारनामों के लिहाज से कानून के तहत आपराधिक मुकदमे से छूट है? इनमें फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार जैसे संगीन अपराध भी शामिल हैं। अदालत ने सरकार से दूसरा सवाल पूछा था कि क्या सीबीआई जैसी जांच एजेसी के लिए सेना और अर्द्धसैनिक बलों के आरोपी जवानों के खिलाफ मामला दर्ज करने से पहले, फर्जी मुठभेड़ के मामलों में शुरूआती जांच किया जाना बेहद जरूरी है? पथरीबल फर्जी मुठभेड़ मामले में भी सुप्रीम कोर्ट का रूख कमोबेश वही है।

दरअसल, उत्तर-पूर्व हो या फिर जम्मू-कश्मीर सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून, अशांत क्षेत्र कानून और जन सुरक्षा जैसे कई कानून जो कि हिंसा और उग्रवाद से प्रभावित इन इलाकों में शांति बहाल करने के नेक मकसद से अमल में लाए गए थे, आज इनका बड़े पैमाने पर दुरूपयोग हो रहा है। गोया कि इन कानूनों की आड़ में सुरक्षा बल बेकसूर नागरिकों का उत्पीड़न कर रहे हैं। मानवाधिकार हनन की ढेरों घटनाओं के बावजूद जिम्मेदार अफसरों या सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत दिए जाने की मिसाल इन सूबों में बमुश्किल मिलती है। सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की लगातार आलोचनाओं के बावजूद, हमेशा यह कहकर इस कानून का औचित्य ठहराया जाता रहा है कि आतंकवाद पर काबू पाने के लिए यह जरूरी हैं। यदि इन्हें वापस ले लिया गया तो आतंकवाद से प्रभावित इलाकों में तैनात किए गए सुरक्षा बलों के मनोबल पर गलत असर पड़ेगा। सवाल यह उठता है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऎसे कानूनी प्रावधान क्यों रहने चाहिए, जो सुरक्षाकर्मियों को यह आश्वासन दें कि वे बेगुनाह लोगों की हत्या करें या उनका उत्पीड़न, लेकिन फिर भी वे सजा पाने से बचे रहेगे।
जाहिद खान
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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