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Saturday, 19 May, 2012
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बराबरी के मायने
Friday, February 10, 2012, 12:14 hrs IST
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जब भी मैं "विश्व स्वास्थ्य संगठन" द्वारा जारी किए गए आंकड़ों को देखती हूं तो सबसे पहले यह देखने की कोशिश करती हंू कि çस्त्रयों और बच्चों के विकास से संबंधित खबरों में भारत का स्थान कितने देशों से नीचे है। भारत में जिस प्रकार विकास के झूठे आंकड़े सरकारी अधिकारियो द्वारा दिए जाते हैं, उसे मानने को मन नहीं करता। यदि उन आंकड़ों की बात सच मानती हूं तो लगता है कि "विश्व स्वास्थ्य संगठन" के द्वारा जारी किए गए आंकड़े भारत को बदनाम करने के लिए छापे जाते हैं और यदि अपने अधिकारियो की बातें मानती हूं तो ऎसा लगता है कि विकास की गति दुगुनी और चौगुनी रफ्तार से हो रही है, लेकिन यथार्थ की जमीन पर सब बेकार लगता है।

पिछले दिनो जब मैंने ब्रिटेन से प्राप्त एक सूचना को पढ़ा तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि वहां की पढ़ी-लिखी çस्त्रयां भी अभी उदास हैं। एक महिला पत्रकार ने अपने एक लेख में वहां के कॉरपोरेट जगत में महिलाओं की ताजा स्थिति पर प्रकाश डालते हुए लिखा था कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार पाए एक सौ वर्ष तो हो गए हैं, लेकिन कॉरपोरेट जगत में बराबरी का दर्जा पाने में अभी एक सौ वर्ष और लगेंगे।" यह एक उदास करने वाली रिपोर्ट थी। जब ब्रिटेन की महिला पत्रकार की सोच इतनी निराशा भरी है तो भारत की çस्त्रयों को कॉरपोरेट में बराबरी का दर्जा पाने में न जाने कितने सौ वर्ष लग जाएंगे? तभी "विश्व स्वास्थ्य संगठन" की एक रिपोर्ट भी पढ़ने को मिली। जिसमें लिखा था, भारत में सरकारी रूप से गर्भपात की स्वीकृति मिलने के बाद भी गर्भवती çस्त्रयों का असुरक्षित तरीके से गर्भपात किया जाता है, जिसकी वजह से कुछ महिलाओं की जान चली जाती है।

इस रिपोर्ट में "लांसेट" पत्रिका के हवाले से कहा गया था कि विकसित देशों में 2003 से सुरक्षित गर्भपात की संख्या घटती जा रही है, जबकि भारत जैसे विकासशील देशों में असुरक्षित गर्भपात की संख्या बढ़ती जा रही है। इसको çस्त्रयों का मामला मानते हुए सरकार की ओर से उपेक्षा की जाती रहती है, लेकिन इस उपेक्षा से çस्त्रयों की जो दुर्गति होती है, वह विश्व से छिपी नहीं है। अब इन दो उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि विकसित देशों और विकासशील देशों की çस्त्रयो की नियति आने वाले वर्षो में कैसी होगी? लांसेट की रिपोर्ट में इस बात का खुलासा भी किया गया है कि वर्ष 2006 में दक्षिण एवं मध्य एशियाई देशों में 10.5 प्रतिशत गर्भपात का रिकार्ड है जिसमें 6.5 मिलियन के आंकड़े सिर्फ भारत के हैं। जिसमें से 66 प्रतिशत असुरक्षित और परम्परागत रूप से गर्भपात कराए गए थे और उनमें 13 प्रतिशत çस्त्रयों की मौत हो गई।

"लांसेट" की इस रिपोर्ट से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत के अस्पतालों में कितनी लापरवाही बरती जाती है। या तो डॉक्टर उपलब्ध सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं या सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। जिस देश में çस्त्रयों को लेकर इतनी लापरवाही बरती जाती है, वहां कॉरपोरेट जगत में पुरूषों से मुकाबला या बराबरी करनेेे मे कितना समय लगेगा, यह विचारणीय प्रश्न है। उस रिपोर्ट में लांसेट के संपादक रिचार्ड हरटन की चिंता भी प्रकाशित की गई है, जिसमें वे कहते हैं कि भारत में सर्वे द्वारा प्राप्त किए गए ताजा आंकड़े को देख कर चिंता होती है। इस दिशा में जो प्रगति 1990 में देखनें मे आई थी अब वह उल्टी हो गई है। अब यह जन स्वास्थ्य विभाग का दायित्व है कि इसकी प्रतिकूलताओं को नियंत्रित करे और इसमें सुधार लाने की कोशिश करे, लेकिन भारत जैसे देश पर इस अपील का क्या असर पड़ेगा, कहना कठिन है। संभव है कि यहां के लोगों द्वारा इस रिपोर्ट को ही जन स्वास्थ्य सेवाओं को बदनाम करने की साजिश बताकर खारिज कर दिया जाए, लेकिन इस सच्चाई के मंुंह को कदापि दबाया नहीं जा सकता। पूरे भारत में चाहे कोलकाता हो या कर्नाटक, तमिलनाडु या राजस्थान हो, आए दिन अस्पतालों में बच्चों और गर्भवती माताओं के मरने की खबरें पढ़ने, सुनने और देखने को मिलती हैं, लेकिन कहीं सुधार होता नजर नहीं आता। जाहिर सी बात है कि 66 प्रतिशत में सबसे अधिक संख्या गरीब और कमजोर लोगों की है, जो किसी भी तरह से कोई सुविधा नहीं जुटा सकते। दवाइयों से लेकर डॉक्टरों तक, सरकार के भरोसे रहना पड़ता है।

यदि नगरीय क्षेत्रों से दूर होते जाएं तो गामीण क्षेत्रों में यह मामला उतना ही गंभीर होता चला जाता है। पूरे देश के ग्रामीण अस्पतालों में दवाइयों से लेकर डॉक्टरों की सेवाओं तक का टोटा पड़ा रहता है। इसलिए वहां बेहतरी की उम्मीद नहीं होती। ब्रिटेन की महिलाओं की जितनी चिंता कॉरपोरेट जगत में बराबरी का दर्जा पाने की है, यहां भारतीय गरीब çस्त्रयों की चिंता अस्पतालों से स्वस्थ होकर लौटने की है। यह अपने आप में कितनी शर्मनाक बात है कि लोग अस्पताल अपने स्वास्थ्य को ठीक कराने के लिए जाते हैं, लेकिन भारतीय गर्भवती çस्त्रयां अस्पताल से लौट कर इस बात पर खुश होती हैं कि वहां से वे सकुशल वापस आ गईं। खासकर गर्भवती çस्त्रयों का बुरा हाल है। यदि çस्त्रयों को भारत के सरकारी अस्पतालों पर पहले भरोसा हो जाए, तब फिर पुरूषों से बराबरी की बात सोचेंगी।

हमारे यहां बातें तो महिला सशक्तीकरण ही बढ़-चढ़कर होती हैं और सफलता के दावे भी खूब किए जाते हैं, लेकिन महिलाओं की सेहत सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयास दावों के अनुरूप कहीं परिलक्षित होते नहीं दिख रहे हैं। हमें बालिकाओं के स्वास्थ्य की देखभाल की व्यवस्था स्कूल स्तर से ही प्रभावी करनी होगी, ताकि पढ़ाई के साथ बेटियों की सेहत का भी पूरा ध्यान रखा जा सके। केवल सरकारी प्रयास ही काफी नहीं हैं। परिवार और समाज को भी सजग रहना होगा। बालिका को सक्षम बनाएंगे, तभी वह बराबरी का हक पा सकेगी।
अल्का आश्लेषा
(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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