प्रसिद्ध नारीवादी सिमोन द बोवा ने कहा था कि औरतें पैदा नहीं होती, बनाई जाती हैं। यह बात आज भी उतनी ही सच है। पूरा समाज घर में पैदा हुए बेटे और बेटियों को पालने-पोसने में अलग तरह से बर्ताव करता है। छोटे बच्चों की किताबों में, जिनमें भाषा की वर्णमाला सिखाई जाती है उनमें लिखा होता है- गीता खाना बनाएगी, राम खेलने गया है। साफ है गीता की जगह रसोई में है, यह सोच का फर्क है और इसमें अब भी मौटे तौर पर कोई बदलाव आया नहीं दिखता है, लेकिन अब लगता है कि हिंदुस्तान इतिहास लिखने जा रहा है। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस तो है ही, महिलाओं की आजादी की लड़ाई के सौ साल भी पूरे हो रहे हैं और देश की संसद में महिला आरक्षण बिल रखा जा रहा है।
सरकार राज्यसभा में एक बार फिर ये बिल रखने वाली है और उसे उम्मीद है कि इस बार ये बिल पास हो जाएगा। यानी आज इतिहास लिखा जाना है। हिंदुस्तान के इतिहास को एक बड़ी करवट लेनी है। एक बड़ा बदलाव देखना है। एक बड़ी उम्मीद आज सवेरे का सूरज लेकर आया है। कोहरे के घने बादल छंटते दिख रहे हैं। बहुत से लोग कह सकते हैं कि ये सपना, ये वादा, ये भरोसा तो बरसों से हम लोग देखते आए हैं, लेकिन औरतों की किस्मत को बदलने के फैसले हम इतनी आसानी से नहीं होने देते। बात किसी हद तक सच भी है। महिला आरक्षण बिल को आए हुए 14 साल हो गए हैं। 1996 में देवेगौड़ा सरकार ने पहली बार इस बिल को लोकसभा में रखने की कोशिश की थी। तब से अब तक चार प्रधानमंत्री आ गए, सरकारें बदल गईं, लेकिन बिल को पास करने का सपना पूरा नहीं हो पाया। हर बार नए बहाने रखे गए, नई दिक्कतें पेश की गर्ई। नई उलझनें बताई गर्ई। कभी मर्दो के हक छीनने की बात हुई, तो कभी संसदीय व्यवस्था में अराजकता फैलने की बात की गई और फिर सबसे मजबूत बहाना रखा गया कि इस बिल में पिछड़ी औरतों को आरक्षण देने की बात नहीं की गई है। बिल का समर्थन करने वाले राजनीतिक दल हों चाहे विरोध करने वाले दल, सभी का महिलाओं को लेकर रवैया अभी तक कमोबेश एक जैसा ही रहा है। इस बिल को कांग्रेस, भाजपा और वाम दल भले ही समर्थन करते हों, लेकिन यह भी साफ है कि महिलाओं को टिकट देने को लेकर अब तक किसी पार्टी ने संजीदगी नहीं दिखाई है।
यदि पिछले लोकसभा चुनावों का हिसाब देखा जाए तो महिला बिल के समर्थन में बोलने वाली सीपीएम ने पिछले आम चुनाव में कुल 69 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन महज सात महिलाओं को टिकट दिया। इसी तरह कांग्रेस ने 417 में से 45 सीटों पर महिलाओं को तकरीबन 11 फीसदी सीटों पर टिकट दिया। भाजपा ने 364 सीटों पर चुनाव लड़ा और महिलाएं उतारीं केवल तीस। यह तो महिला आरक्षण बिल का समर्थन करने वाले दलों की स्थिति है। अच्छी बात यह है कि इस बार बिल का विरोध करने वाले राजनीतिक दल सत्ताधारी दल नहीं हैं, यानी सरकार का हिस्सा नहीं मतलब उनके नाराज होने पर सरकार गिरने का खतरा नहीं दिखता है। हालांकि लालू यादव ने प्रधानमंत्री से मिलकर एक बार फिर इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है, मतलब बिल को लटकाने का एक बहाना। सरकार के पास इससे बेहतर कोई मौका नहीं हो सकता बिल को पास करवाने का। पिछड़ी महिलाओं को भी आरक्षण में जगह मिले इसके लिए सरकार को ठोस भरोसा देना चाहिए, ताकि उन्हें भी मौका मिल सके। इस बार सत्तारूढ़ गठबंधन यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज हैं। लोकसभा की अध्यक्ष मीरा कुमार हैं। बिल पर दस्तखत करने की सर्वोच्च ताकत रखने वाली राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील हैं। पांच राजनीतिक दलों की अध्यक्ष महिला हैं। सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस और सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा के साथ साथ लेफ्ट में भी बिल को लेकर सहमति है, तो अबकी बार देर की तो फिर मौका बहुत मुश्किल से आएगा ।
आखिर में एक छोटी सी बात, बिल पास हो या ना हो, हमें महिलाओं को लेकर तो अपना रवैया बदलना ही होगा। नंद किशोर हटवाल की एक कविता याद आ रही है - बोए जाते हैं बेटे और उग आती हैं बेटियां, खाद-पानी बेटों में और लहलहाती हैं बेटियां, एवरेस्ट की ऊंचाइयों तक ठेले जाते हैं बेटे और चढ़ आती हैं बेटियां, बेटे बोना भले ही बंद ना कर सको लेकिन बेटियों को उगने से रोको मत क्योंकि वो तो चढ़ ही जाएंगी पहाड़।
विजय त्रिवेदी (लेखक एनडीटीवी इंडिया में डिप्टी एडिटर हैं)
महिला दिवस पर महिला आरक्षण राह अब आसान दिख रही है। महिला आरक्षण पिछले 13 साल से संसद में और उसके बाहर भी बहस का मुद्दा बना रहा है, लेकिन सर्वसम्मति के अभाव में लटकता रहा है। आई.के. गुजराल ने 1995 में पार्टियों की 30 प्रतिशत महिला उम्मीदवार की प्रतिबद्धता का निज बिल पेश किया, लेकिन यह बिल भी पार्टियों के विरोध का शिकार हो गया। महिला आरक्षण 1996 के लोकसभा चुनाव में चर्चा का विषय बना था। 12 सितंबर 1996 को लोकसभा में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार पेश किया। 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही बिल अधर में रह गया। 26 जून 1998 और 22 नवंबर 1999 को वाजपेयी सरकार ने भी बाहरवीं और तेरहवीं लोकसभा में 33 फीसदी आरक्षण का बिल पेश किया। मई 2003 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार की संसद में विधेयक लाने की कोशिश नाकाम हुई। मनमोहन सिंह सरकार ने 6 मई 2008 को, 108 वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा की बजाए राज्यसभा में पेश किया और स्थाई समिति के सुपुर्द कर दिया। राज्यसभा में बिल पेश करने का यह फायदा हुआ कि अब दुबारा बिल पेश करने की जरूरत नहीं, क्योंकि राज्यसभा का कार्यकाल कभी खत्म नहीं होता।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने 4 जून 2009 को पंद्रहवीं लोकसभा के अभिभाषण में अपनी सरकार की सौ दिनों की प्राथमिकताओं में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देना घोषित किया। अब जिस तरह से इस विधेयक पर आमराय बनती जा रही है, उससे लगता है कि यह मुकाम हासिल कर लेगा। ध्यातव्य है कि यह विधेयक संविधान संशोधन विधेयक है, जो संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से ही पारित हो सकता है। इसके अलावा विधेयक को कम से कम 50 प्रतिशत विधानसभाओं में भी मंजूर कराना होगा। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने घोष्ाणा पत्रों में 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया है। महिलाओं को प्रतिनिघित्व देने के लिए भारत में सर्वप्रथम 1931 में कांगे्रस के कराची अघिवेशन में महिला मताघिकार और प्रतिनिघित्व का प्रस्ताव पारित हुआ था। विश्व स्तर पर महिलाओं की 33 प्रतिशत संसदीय भागीदारी की अवधारणा 1995 में संयुक्त राष्ट्र की चौथी विश्व महिला कांफ्रेंस (बीजिंग) में अस्तित्व में आई, जिसमें कहा गया कि महिलाओं की प्रजातांत्रिक संस्थाओं में कम से कम 33 प्रतिशत की भागीदारी होनी चाहिए। 1988 में राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1988-2000) द्वारा सभी निर्वाचित निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण से जुडे 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से सीटें आरक्षित की गईं। महिलाओं को पंचायतीराज में केवल 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, लेकिन ये इतनी संख्या में जीतकर आई हैं कि इनका राष्ट्रीय प्रतिशत 38 हो गया है। इस समय देश में 12 लाख महिला पंचायत जन प्रतिनिघि (पंच-सरपंच-प्रधान-प्रमुख) हैं, जिनमें 9 लाख केवल ग्रामीण महिलाएं हैं। आज भारत में जितनी निर्वाचित महिला प्रतिनिघि हैं, उतनी तो पूरे विश्व में भी नहीं हैं। आज यह निर्विवाद है कि राजनीतिक भागीदारी से ही महिला सशक्तिकरण की नई सुबह संभव है।
यह अप्रत्याशित और सुखद है कि पंद्रहवीं लोकसभा में उपेक्षित महिला वर्ग का प्रतिनिघित्व बढ़ा है। यह पहला मौका है जब 59 महिलाएं लोकसभा में पहुंची हैं, जो अब तक का सर्वाघिक आंकड़ा है। 14वीं लोकसभा में महज 45 महिलाएं ही लोकसभा में पहुंच पाईं, जो 543 सदस्यीय सदन का 10 फीसदी भी नहीं था। 1999 में 13वीं लोकसभा में 49 महिला सांसद निर्वाचित हुई थीं। 2009 के लोकसभा चुनावों में कुल 556 महिलाएं चुनाव मैदान में उतरीं। इनमें से केवल 40 कांग्रेस की और 43 भाजपा की थीं। कांग्रेस से सर्वाघिक 23 और भाजपा से 13 महिलाएं चुनीं गईं। इस आम चुनाव में भी अघिकतर दलों ने महिलाओं को कम टिकट दिए, लेकिन सफलता इन्होंने अघिक अर्जित की। कुल उम्मीदवारों 8070 में महिलाओं की भागीदारी मात्र 6.9 फीसदी रही। लेकिन जीत के लिहाज से उनकी सफलता दर 10.86 प्रतिशत रही। पुरूष उम्मीदवारों की सफलता दर लगभग 8 प्रतिशत ही रही। 1977 में लोकसभा में çस्त्रयों की प्रतिभागिता 3.5 प्रतिशत थी, वह 2009 में बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई है। ये महिलाएं बिना आरक्षण के यहां तक पहुंची हैं, लेकिन दुनिया के 187 संसदीय प्रणाली वाले देशों की ताजा सूची में भारत को 99वें स्थान पर रखा गया है। राज्यसभा में 243 सदस्यों में 22 महिलाएं हैं, जो 9 प्रतिशत हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर से नीचे है।
डॉ. ज्ञान प्रकाश पिलानिया (लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
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