अमृतसर के पास हम कई लोग एक साथ वाघा बॉर्डर गए थे। यहां लगभग बीस वर्ष पूर्व भी मैं पत्रकारों की एक टीम के साथ आया था, लेकिन इन वर्षो में जो फर्क दिखा, वह दोनों देशों के बीच की नजदीकियों को कम करने की तमाम कोशिशों में शामिल दिखता है। बीस वर्ष पहले हम मात्र यह देखने गए थे कि सूरज के ढलने के साथ कैसे पाकिस्तान और भारत की सीमाओं के झंडे एक साथ नीचे उतरते हैं। कैसे दोनों देशों के दरवाजे थोड़ी देर के लिए ही सही एक साथ खुलते हैं और लोगों के हाथ लहराते हैं, लेकिन इस बार वाघा बॉर्डर एक पिकनिक स्थल की तरह लगा। इस तरफ ढेर सारी दुकानें हो गई हैं। उधर भी हो गई होंगी।
पहले हम चंद लोग बॉर्डर पर थे। इन वर्षो में गाडियां बहुत बढ़ गई हैं। खास तरह के लोग अपनी गाड़ी कुछ आगे तक ले जा सकते हैं, तो उससे नीचे के दर्जे के लोगों को थोड़ी दूर उतरकर पैदल जाना होता है। स्टेडियम में भीड़ जमा हो जाती है। पिछले वर्षो में फिल्मों ने जो कुछ दिखाया है, उसके दृश्य यहां दोहराने की कोशिश होती है। दृश्य में दो लोग तिरंगे को लेकर एक लंबी दौड़ लगाते हैं। उनकी थकान बताती है कि फिल्मी नकल करने का उन पर बोझ था। अब तो वहां लाउड स्पीकर लग गया है। अब तो यहां नारे लगवाए जा रहे हैं। इसके लिए सेना में यह नया पद बना होगा। वंदे मातरम् से लेकर हिंदुस्तान जिंदाबाद और भारत माता जिंदाबाद के नारों में व्यावसायीपन ज्यादा है। उधर भी यह सब हो रहा है। जैसे दोनों में इसी की होड़ है। पता नहीं कौन सी चीज पहले किस तरफ शुरू होती होगी और फिर दूसरी तरफ भी शुरू कर दी जाती होगी? हो सकता है कि बातचीत के बाद दोनों एक साथ करते होंगे, क्योंकि अब दोनों में से कोई भी राष्ट्रवाद के मामले में पीछे नहीं देखना चाहते हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात कि हमारे हिले हाथ लहराकर सीमा पार नहीं पहुंचे। लहराए हाथों ने किसी के हाथ की गर्मी महसूस नहीं की। उधर से भी कोई हाथ लहराया होगा, लेकिन दोनों लहराए गए हाथ एक दूसरे को ढूंढ़ नहीं पाए होंगे। भीड़ बहुत ज्यादा थी। अपने-अपने देश के लिए जिंदाबाद के नारे लगा रही थी।
मैं यह सोच रहा था कि आखिर 1991 के बाद वाघा बॉर्डर को आज के महौल की तरफ ले जाने की कोशिश कहां से कोशिश शुरू हुई होगी। यहां लोग हजारों की तदाद में आते और जाते होंगे, तो इन वर्षो में यहां से आने जाने वालों की तादाद कई लाखों में होगी। वे देश के विभिन्न हिस्सों में गए होंगे। अपने-अपने अनुभवों को बंाटा होगा। मध्यवर्गीय मानसिकता अपना कुछ निर्मित नहीं करती है। वह सहायक सामग्री के रूप में होती है। इसके बावजूद उसकी बड़ी भूमिका होती है।
प्रतिक्रियावादी सोच को फैलाने में वाघा बॉर्डर की ये यात्राएं कितनी सहायक होती हैं? आखिर बॉर्डर पर सरकारों के लोगों को घुमाने का उद्देश्य क्या है? कल हमने यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच भाईचारे की बात सोची थी। भारत और पाकिस्तान के बीच किसी तरह के समझौते की बुनियादी शर्त इन देशों के लोगों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ाना ही हो सकता है। ऎसा नहीं हो सकता कि लोगों के बीच तो भावनाएं एक दूसरे को नीचा दिखाने की तरफ विकसित हों। जैसे वाघा बॉर्डर पर जब एक तरफ से अपने देश का जिंदाबाद करने का नारा थोड़े हल्के स्वर का होता था, तो दूसरी तरफ से उसका करारा जवाब देने के लिए दोनों तरफ से ललकारा जाता था।
यदि लोगों के बीच आपस की एकता और प्रेम का भाव विकसित नहीं हो, तो व्यापार बढ़ाने और आने-जाने के उपायों पर विचार करने का मतलब महज दोनों देशों में फैले किस्म-किस्म के व्यापारियों के आपसी व्यापार का मामला लगने लगता है। दूसरा पहलू यह भी है कि व्यापारियों को जब अपना कारोबार जरूरी लगने लगता है तो वे फिर ऎसा इंतजाम भी करते हैं कि व्यापार तो होता रहे, लेकिन लोगों के बीच दूरियां भी उसी तरह से बनी रहे। इन दूरियों के लिए तरह- तरह के इंतजाम किए जाते हैं।
कुछ सीधे-सादे सवाल यहां खडे करना जरूरी है। पहला तो यह कि क्या कारण है कि कुछ खास मौके से पहले ही कोई बड़ी वारदात हो जाती है। जैसे अपने मुल्क में 15 अगस्त के पहले आतंकवादी चेतावनी की खुफिया रिपोर्टे अखबारों में सुर्खियां बनने लगती हंै। कई लोग पकड़े जाते हैं। बिल क्लिंटन का भारत आना हुआ था, तो कश्मीर में बड़ा हादसा हुआ। कश्मीर में पथरीबल में मुठभेड़ में पांच लोगों को आतंकवादी कहकर सेना ने मार डाला। अभी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े सवाल खड़े किए हैं। देश में पोटा के लिए संसद की संयुक्त बैठक होनी थी, तो संसद पर हमला हो गया। फौज सीमा पर तैनात हो जाती है। अपने देश में ही नहीं पूरी दुनिया में यह एक सिलसिला सा चल पड़ा है कि किसी खास मौके से पहले कोई खास वारदात जरूरी हो गई है।
इस तरह के हादसों के बाद उसी को आधार बनाकर हर कोई अपने लिए तर्क तैयार करने लगता है। पाकिस्तान में कोई वारदात होती है, तो वहां यह प्रचारित किया जाता है कि इसमें भारत का हाथ है। दूसरी तरफ भारत में कोई वारदात होती है, तो उसमें पाकिस्तान के हाथ होने का प्रचार किया जाता रहा है। किसी भी देश का नाम लेकर इस तरह से कोई आरोप लगाया जाता है तो इसका मतलब है कि वहां की सरकार और सत्ता उसमें शामिल है, क्योंकि सरकारें ही देश का प्रतिनिधित्व करती हैं। दोनों देशों के मीडिया के लिए यह जरूरी है कि वह देश, संगठन, व्यक्ति के फर्क को मिटाए नहीं। सरकारों की जिम्मेदारी इस तरह की घटनाओं की मुकम्मल रोकथाम करने की तरफ कम अपने-अपने कूटनीतिज्ञ फायदे उठाने की ज्यादा होती है। हमें आपसी मेलजोल बढ़ाने और आपसी रिश्तों की मजबूती पर ध्यान देना चाहिए। अनिल चमडिया (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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