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Saturday, 19 May, 2012
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लाचारी का शोषण
Tuesday, February 07, 2012, 12:24 hrs IST
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जब किसी भी समाज की दशा और दिशा अर्थतंत्र तय करने लगते हैं, तो मापदंड तय करने के तरीके बदलने लग जाते हैं। यही कारण है कि हम जिन्हें सभ्य और आधुनिक समाज का हिस्सा मानते हैं, वे लोग प्राकृतिक अवस्था में रह रहे लोगों को इंसान मानने के बजाय जंगली जानवर ही मानते हैं। आधुनिक कहे जाने वाले समाज की यह एक ऎसी विडंबना है, जो सभ्यता के दायरे में कतई नहीं आती। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में रह रहे लुप्तप्राय: जारवा प्रजाति की महिलाओं को भोजन का लालच देकर सैलानियों के सामने नचाने के जो वीडियो-दृश्य ब्रिटिश अखबारों में सिलसिलेवार छप रहे हैं, उन्हें शासन-प्रशासन के स्तर पर झुठलाने की कवायद कितनी भी की जाए, लेकिन हकीकत यह है कि अभयारण्यों में दुर्लभ वन्य जीवों को देखने की मंशा की तरह, दुर्लभ मानव प्रजातियों को भी देखने की इच्छा रसूखदारों में पनप रही है।

आधुनिक विकास और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए वन कानूनों में लगातार हो रहे बदलावों के चलते अंडमान में ही नहीं देशभर की जनजातियों की संख्या लगातार घट रही है। आहार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की कमी होती जा रही है। अलग-अलग दुर्गम टापुओं पर जंगलों में समूह बनाकर रहने वाली जनजातियों का अन्य समुदायों और प्रशासन से बहुत सीमित संपर्क है। यही वजह है कि इनकी संख्या घटकर महज 381 रह गई है। एक अन्य टापू पर रहने वाले ग्रेट अंडमानी जनजाति के लोगों की आबादी केवल 97 के करीब है। इनमें प्रतिरोधात्मक क्षमता इतनी कम होती है कि ये एक बार बीमार हुए तो इनका बचना नामुमकिन हो जाता है। एक तय परिवेश में रहने के कारण इन आदिवासियों की त्वचा बेहद संवेदनशील हो गई है। लिहाजा यदि ये बाहरी लोगों के संपर्क मे लंबे समय तक रहते हैं तो ये रोगी हो जाते हैं और उपचार के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अब जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री वी.के. चंद्र देव ने ऎलान किया है कि इनकी प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने के उपाय किए जाएंगे।

करीब एक दशक पहले तक ये लोग पूरी तरह निर्वस्त्र रहते थे, लेकिन सरकारी कोशिशों और इनकी बोली के जानकार दुभाषियों के माध्यम से समझाइश देने पर इन्होंने थोड़े-बहुत कपडे पहनने अथवा पत्ते लपेटने शुरू कर दिए हैं। इसीलिए ब्रिटिश अखबार के जरिए जिन वीडियो दृश्यों की जानकारी सामने आई है, उनमें जारवा महिलाओं को कपड़े पहने नृत्य करते दिखाया गया है। इससे तय है ये वीडियो नए हैं। पुलिसिया पूछताछ से खुलासा हुआ है कि ब्रिटिश के "द ऑब्जर्वर" के पत्रकार को पोर्टब्लेयर का एक व्यक्ति और टैक्सी चालक इनके निवास स्थल तक ले गया था। वहां इन्होंने स्वादिष्ट भोजन के चंद निवाले डालकर इनसे नृत्य कराया और फिल्मांकन किया। जबकि यह क्षेत्र सर्वोच्च न्यायालय और स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार पर्यटन के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित है। इन्हें संपूर्ण संरक्षण देने की दृष्टि से अंडमान टंऊक रोड को बंद करके समुद्र से ऎसा मार्ग बनाए जाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जो जारवा संरक्षित क्षेत्र से होकर न गुजरे।

भारत की सांस्कृतिक विविधता एक अनूठी खूबसूरती है। यहां विभिन्न आदिवासी समुदायों को अपने पुरातन व सनातन परिवेश में रहने की स्वतंत्रता हासिल है। मानवाधिकारों की वकालत करने वाले अमेरिका जैसे देश में आदिम जनजातियों को सुनियोजित ढंग से समाप्त किया जा रहा है। अमेरिकी देशों में कोलंबस के मूल्यांकन को लेकर दो तरह के दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक दृष्टिकोण उन लोगों का है, जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्तार व वर्चस्व उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के अनेक देशों में है। दूसरा दृष्टिकोण या कोलंबस के प्रति धारणा उन लोगों की है, जो दावा करते हैं कि अमेरिका का अस्तित्व ही हम लोगों ने खड़ा किया। इनका दावा है कि कोलंबस इन लोगों के लिए मौत का कहर लेकर आया। कोलंबस के आने तक अमेरिका में इन आदिम समूहों की आबादी 20 करोड़ के करीब थी, जो अब घटकर 10 करोड़ के करीब रह गई है। अब भी अमेरिका में अश्वेतों का जनसंहार लगातार जारी है। ब्रिटेन के भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। हाल ही में नस्लीय आधार पर भारत के अनुज बिडवे की हत्या का मामला भी सामने आया है।

शोषण व सुनियोजित संहार के ऎसे ही पैरोकारों का एक दल हमारे यहां भी पैदा हो गया है, जिसमें योजनाकर और अर्थशास्त्री शामिल हैं। ये भूमि, जंगल और खनिजों को आर्थिक संपत्ति मानते हैं। इनका कहना है कि इस प्राकृतिक संपदा पर दुर्भाग्य से किसानों और वनवासियों का वर्चस्व है, जो अक्षम हैं। सकल घरेलू उत्पाद दर में लगातार वृद्धि के लिए जरूरी है कि ऎसे लोगों से खेती योग्य भूमि छीनी जाए और उसे विशेष व्यावसायिक हितों, शॉपिंग मालों और शहरीकरण के लिए काम में लिया जाए। इसी तर्ज पर जिन जंगलों और खनिज ठिकानों पर जन-जातियां आदिकाल से रहती चली आ रही हैं, उन्हें विस्थापित कर संपदा के ये अनमोल क्षेत्र औद्योगिक घरानों को उत्खनन के लिए सौंपे जा रहे हैं। इस मकसद की पूर्ति के लिए "क्षतिपूर्ति वन्यरोपण विधेयक 2008" बिना किसी बहस-मुबाहिसे के पारित करा दिया गया था। जबकि इसके मसौदे को जनजातियों, वनों और खनिज संरक्षण की दृष्टि से गैर-जरूरी मानते हुए संसद की स्थायी समिति ने खारिज कर दिया था। कम्पनियों को सौगात देने की कड़ी में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने समिति की सिफारिश को दरकिनार कर यह विधेयक पारित करा दिया। यही कारण है कि देश में जितने भी आदिवासी बहुल इलाके हैं, उन सभी में इनकी संख्या तेजी से घट रही है।

प्रमोद भार्गव
(लेखक सम-सामयिक मामलों के विश्लेषक हैं)
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