कश्मीर घाटी में पहले पत्थरबाजों का कोई वर्ग नहीं था, कोई खास जमात नहीं थी। वे किसी खास राजनीतिक धारा से भी जुडे नहीं रहते थे। वे "शेर" हो सकते थे या "बकरा", यानी शेख अब्दुल्ला के हिमायती या मीरवाइज मौलवी यूसुफ शाह के। उनकी कोई खास पहचान नहीं थी, न कोई नाम। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और लोग भी बदले। लोगों की मानसिकता बदली और मन भी। बदली हुई स्थितियों में अब लगता है कि पत्थरबाजी पेशा बन गई है और इसे नाम दिया गया है।
साल भर पहले ही खबरें आने लगी थीं कि कुछ राजनीतिक नेता दिहाड़ी के आधार पर नौजवानों की नियुक्ति करने लगे हैं, क्योंकि आजकल राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मिलना मुश्किल हो गया है। इन बेरोजगार युवकों का एक काम विरोधियों पर पत्थर मारना भी होता था। लेकिन जल्द ही यह सूचनाएं भी आने लगीं कि पत्थरबाजों को उपलब्ध कराने के ठेकेदार भी पैदा हो गए हैं। मोहल्लों में अब पत्थरबाजों और उनके ठेकेदारों की अपनी पहचान बन गई है। साफ है कि अगर यह बिकाऊ सेवा बन गई है, तो इसके खरीदार भी होंगे और वे इस संगठित श्रम या सेवा का इस्तेमाल छोटे-मोटे झगड़ों अथवा फसाद के लिए नहीं, किसी बड़े या दूरगामी प्रभाव के लिए कर रहे होंगे। पत्थर सुलभ है, सस्ता है, इसे चलाने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं और कानून में पत्थर हथियार नहीं है। ऎसे में यह एक ऎसा हथियार बन गया, जिससे बवाल भी खड़ा किया जा सकता है और मुकदमेबाजी में भी आसानी से बचाव ढूंढ़ा जा सकता है। तो कौन थे इस सेवा के ग्राहक? बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं। सैय्यद अलीशाह गिलानी, महबूबा सईद और मीरवाइज फारूख के बयानों से ही साफ है कि यह "आजादी" की लड़ाई का नया साधन है। पत्थरबाजी की ठेकेदारी भले ही प्रायोजित थी, लेकिन पिछले महीने भर से जो दृश्य श्रीनगर और कश्मीर घाटी के दूसरे कस्बों में दिखाई देते रहे हैं, क्या वे भी प्रायोजित हैं? हजारों की संख्या में प्रदर्शन, अपने सहयोगियों में पत्थर बांटती और स्वयं फेंकती औरतें, पथराव करने वाली भीड़ में सबसे आगे चलने वाले कमसिन बच्चे। भावनाओं का यह तूफान न तो नियंत्रित हो सकता है, न किसी से अनुशासित या प्रायोजित।
पत्थरबाजी भावनाओं के ज्वार की तरह नहीं, जो चढ़ते ही उतरने लगता है। यह किसी उफनती नदी का बांध टूटने जैसा है, जहां पानी सारे कायदे तोड़कर सब कुछ बहा ले जाता है। नदी के बांध की तरह कश्मीरी समाज में भी भीतर से कुछ टूट गया है। शायद वह भरोसा टूट गया है, जो लोग समय-समय पर अपने रहनुमाओं पर करने लगे थे। वर्ष 1947 से ही उन्हें सब्जबाग दिखाए जाते रहे। शेर-ए-कश्मीर शेख अब्दुल्ला ने कहा था कि मैं तुम्हें व्यक्तिगत शासन से आजादी दिलाऊंगा। वह आजादी मिली तो कहने लगे कि यह आजादी पर्याप्त नहीं, क्योंकि मेरी सत्ता अभी स्थाई नहीं। फिर जमायते इस्लामी ने कहा कि सही आजादी तो तभी आएगी, जब मजहबी शासन हो। फिर सीमा पार से बताया गया कि बिना हथियार आजादी नहीं मिल सकती। उसी में कूद पडे सुरक्षा बल। जिसने भी जो सपना दिखाया, उसी ने उसे तोड़ दिया। संजीदा और खास मकसद कार्यकर्ताओं की उम्मीद पूरी नहीं हुई। इतनी जद्दोजहद के बाद उन्हें कोई नई बुनियादी सोच या अपने काम के लिए नई दिशा हासिल नहीं हो सकी। ऎसे में इस व्यापक आंदोलन की एकजुटता को लेकर शंका उत्पन्न होती है। एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि जमीनी स्तर पर चल रहे विभिन्न आंदोलनों में साझेदारी कैसे बने और कायम भी रहे। इसे ध्यान में रखकर कदम उठाए जाएं, तभी लंबी लड़ाई लड़ पाना संभव हो पाएगा। आज कश्मीर देश के उन चंद राज्यों में शामिल है, जहां शिक्षा का प्रतिशत काफी ऊंचा है, औरतों में भी। लेकिन यह शिक्षा और डिग्रियां बेकार साबित हो रही हैं। हजारों पढे-लिखे नौजवानों के लिए विकल्प केवल कश्मीर से बाहर पलायन करना ही है।
पढ़े-लिखे युवकों को आसानी से रोजगार नहीं मिल पा रहा है। रोजगार के बिना शिक्षा का क्या फायदा? कई साल पहले जब आतंक के एक लंबे दौर के बाद कश्मीर विधानसभा के लिए फिर से चुनाव कराने की चर्चा चल पड़ी थी तो हुरिर्यत के कहने पर घाटी में हड़ताल हुई थीं। एक बुर्कापोश लड़की से चुनाव के बारे में पूछने पर उसने कहा कि वह इसलिए चुनाव चाहती हैं कि कोई तो जिम्मेदार सरकार आए। अगर नहीं आएगी तो हॉस्टल में रहकर पूरी की गई मेरी शिक्षा बेकार जाएगी। मेरे पिता मेरी शादी करके मुझे दफा कर देंगे और मुझे अपने अरमानों को अलविदा कहना होगा। लड़की को उम्मीद थी कि नई सरकार आएगी तो रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे। रोजगार मिलेगा तो जीवन की राह आसान होगी। घर में खुशहाली आएगी। आर्थिक स्थिति सुधरेगी तो आगे बढ़ने की राह आसान होगी। ऎसी न जाने कितनी उम्मीदें तब से नाउम्मीदी में बदल चुकी हैं।
नव उदारवाद के नाम पर चलाई जा रही नीतियों से लोगों में कितना असंतोष है। इसे हमारे नीति नियंता समझ नहीं पा रहे हैं या फिर सब कुछ समझते हुए भी इन सब से अनजान बने हुए हैं। लोग अपनी ही चीजों से बेदखल किए जा रहे हैं। विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों से स्थानीय समुदायों की बेदखली हो रही है। भूमंडलीकरण का दौर श्रमिकों को बेरोजगार कर रहा है। कर्ज के बोझ से लदे किसान खुदकुशी कर रहे हैं। पर्यावरण की समस्याएं जो आ रही हैं, सो अलग। कुल मिलाकर इन स्थितियों से लड़ रहा प्रत्येक व्यक्ति इस उम्मीद के साथ जिंदा है कि देश में उनकी आवाज कभी तो कोई उठाएगा। नव उदारवादी वैश्वीकरण, संकीर्ण राजनीति, जातिवाद, पितृसत्ता और फौजवाद के खिलाफ खड़े हो रहे आंदोलनों को और प्रखरता व व्यापकता मिली। संवाद, आशावाद और उम्मीद का माहौल निर्मित करने की कोशिश रही। लेकिन, यह भी सत्य है कि इसके बौद्धिक और किताबी रूप ही ज्यादा सामने आए। यहां की जमीनी सच्चाइयां यकीनन निराशाजनक रहीं। कश्मीर की त्रासदी गरीबी की नहीं है। भारत और पाकिस्तान कश्मीर के लिए लड़ ही नहीं रहे हैं, उसका सौदा करने को भी आमादा दिखते हैं। कश्मीरी अवाम को नहीं मालूम कि उनका यह क्षेत्र इस देश का होगा, उसका होगा कि किसी का भी नहीं होगा।
इस अनिश्चय और मूल्यहीनता के दौर में वे अपनी संस्कृति को भी खोते जा रहे हैं। जो लड़के सुरक्षा बलों पर पत्थर मारते हैं, वे कल की बात नहीं सोचते, क्योंकि कल पर से ही उनका भरोसा उठ चुका है। वे अगर आजादी का नारा देते हैं तो उन्हें नहीं मालूम कि वे किससे आजादी चाहते हैं और आजादी का स्वरूप क्या होगा? वे जो करते हैं, उसके जरिए अपने अंदर के असंतोष और गुस्से को बाहर निकालना चाहते हैं। उनकी माताएं या बहनें जब पत्थर मारती हैं तो अपनों की मौत मातम मना रही होती है। उनके इस काम की व्याख्या और लोग करते हैं, जिन्हें भावनाओं को भुनाना आता है। वे पत्थर मारने में भी कोई मजहबी कर्मकांड देखते हैं। लेकिन आम कश्मीरी समाज सभी व्याख्याओं से परे एक क्षुब्ध और त्रस्त अवस्था में है, जिसे पास जाकर, छूकर संभालना होगा, दूर से सहायता पैकेज देकर नहीं। समय रहते युवाओं के अरमानों को नहीं समझा गया तो स्थितियां और ज्यादा विकराल होंगी। (लेखक साहित्यकार हैं एवं इन दिनों जम्मू में रह रहे हैं)
शैलेन्द्र चौहान
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