हिंदुस्तान में चुनावों के रंग का अलग ही मजा है। हर इलाके के अपने रंग हैं। अपने अपने तरीके हैं। हर इलाके का रंग अलग है। हर पार्टी, हर राजनीतिक दल और हर उम्मीदवार का रंग, तौर तरीका, अंदाज खास दिखाई देता है। पिछले एक महीने में पंजाब और उत्तराखंड के चुनावों के लिए अलग-अलग इलाकों में घूमा, अलग-अलग नेताओं से मुलाकात हुई, उनके साथ भी चुनाव प्रचार देखा और फिर पिछले एक हफ्ते यूपी के पहले चरण में होने वाले चुनाव के इलाकों में जाने का मौका मिला।
लगा कि जितनी विविधता हिंदुस्तान में है, उतना ही रंग-रूप और विविधता उसके चुनावों में भी दिखाई देती है और ना केवल उम्मीदवार और राजनीतिक पार्टियां, बल्कि कार्यकर्ता के साथ आम वोटर भी उतने ही उत्साह से हिस्सा लेता है। इससेे लगता है कि हमारी जम्हूरियत की जड़ें इसीलिए मजबूत हैं कि यहां का आम आदमी चुनावों को एक जश्न, एक त्योहार और एक जिम्मेदारी की तरह लेता है, वरना पंजाब में दूल्हा घोड़ी पर चढ़ कर ससुराल जाने के बजाय पहले सवेरे वोटिंग बूथ पर नहीं आता और 80 साल की बुजुर्ग महिला खाट पर लेट कर वोट डालने नहीं पहुंचती। इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ हो रहे हैं। इनमें से 3 राज्यों में वोट डाले जा चुके हैं और यूपी में इस हफ्ते से मतदान शुरू हो जाएगा।
इन चुनावों को सरकार का सेमी फाइनल भी कहा जा रहा है, सबसे अहम यूपी के चुनाव हैं। कहा जाता है कि जो यूपी में ताकत दिखाएगा, वो ही अगली बार दिल्ली में सरकार बनाएगा। यूपी में 403 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं और यहां से 80 संसदीय सीटें हैं। कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं ही, अब भैया राहुल को ताकत देने के लिए बहन प्रियंका भी मैदान में उतर गई हैं।
पहले वो खुद को रायबरेली और अमेठी तक सीमित रखने वाली थीं, अब यूपी में कुछ और जगहों पर प्रचार और सभाएं करेंगी। आम आदमी के लिए नेताओं से आमतौर पर मुलाकात करना लगभग असंभव सा होता है। चुनाव प्रचार के दौरान ये नेता सीधे आपके घर पहुंच जाते हैं और आपकी मां के हाथ की बनी बाजरे की रोटी खाने की जिद करते हैं। उनके साथी बताते हैं कि नेताजी तो कहीं भी किसी भी ढाबे पर रूककर खाना खा लेते हैं। दलित के घर जाकर चाय पी लेते हैं। बूढे बाबा के पैर छू कर आशीर्वाद मांगते हैं।
चुनाव नहीं होते तो आपको पता ही नहीं चलता कि आपके यहां प्रचार करने वाली नेता हमेशा सिर पर पल्लू रखकर चलती हैं। और अपनी दादी को आदर्श मानती हैं। और ये उनका संत स्वभाव ही तो है कि वे सभा में जाकर माफी ही नहीं मांगती, बल्कि कहती हैं कि आप मुझे डांटिए कि मैं पिछले तीन साल से आपसे मिलने नहीं आई, फिर भी ना जाने क्यों मेरे कुछ पत्रकार मित्र ऎसे संत स्वभाव वाले नेताओं के बारे में कुछ ना कुछ उल्टा सीधा लिखते रहते हैं। और अगर, हां, अगर चुनाव नहीं होते तो मुझ जैसे मूढ़ लोगों को पता ही नहीं चल पाता कि मेरी मुख्यमंत्री जी भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं।
पत्रकार हमेशा ही उनके खिलाफ कुछ न कुछ उल्टा सीधा लिखते रहते हैं। वे तो चुनावों ने ही मुझे बताया कि मुख्यमंत्री जी को भ्रष्ट लोग आंखों नहीं सुहाते। इसलिए चुनाव से ऎन पहले उन्हें एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों को सरकार से निकाल दिया, टिकट भी नहीं दिया और तकरीबन सौ से ज्यादा विधायकों को भी इसलिए टिकट नहीं दिया, क्योंकि उनकी छवि भ्रष्ट मानी जाती है। हो सकता है कि इसके बावजूद बहुत से लोग उन्हें अब भी भ्रष्ट मुख्यमंत्री मानते रहें। अब लोगों का क्या है, कुछ तो लोग कहेंगे ही कहेंगे।
चुनावों से ही मुझे पता चला कि हमारे नेता अंग्रेजी और कम्प्यूटर के कतई खिलाफ नहीं हैं, बल्कि अब तो उन्होंने हर गरीब बच्चे को लैपटॉप देने का भरोसा भी दिलाया है और वे ही मुसलमानों के सबसे बड़े खैरख्वाह हैं, वरना पिछली बार तो कुछ लोगों ने उन्हें इतना बदनाम कर दिया था कि वे मुसलमानों के साथ नहीं हैं, जबकि उनकी गलती सिर्फ इतनी भर सी थी कि उन्होंने बाबरी मस्जिद गिरवाने वाले नेताजी को अपने साथ ले लिया था। दोस्ती और रिश्तों का असली पता भी चुनावों की वजह से चल पाता हैं।
जिन के बीच तलाक की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती हैं, वे चुनाव प्रचार के दौरान एक साथ नजर आते हैं। जिन नेताओं के बारे में एक दूसरे के खिलाफ काम करने या उनकी जड़ें काटने की खबरें सुनने पढ़ने को मिलती हैं, चुनाव मैदान में वे हाथ से हाथ मिलाकर फोटो खिंचाते हैं और नेताजी की जीत के लिए अपील करते हैं। बहुत से लोग एक पार्टी को यूं ही बदनाम करते रहे कि उसने मंदिर बनवने का वादा तो पूरा नहीं ही किया, बल्कि उसे भूल भी गई, जबकि अभी मैंने खुद सुना है कि इस पार्टी के नेता चुनावी सभा में इस बात का पक्का वादा कर रहे हैं कि वे मंदिर बनवा कर ही रहेंगे। हो सकता है कि आप तो अब भी नहीं मानें। इसलिए चुनाव एक महान पर्व है, वे हमारी संस्कृति, हमारे धर्म, हमारी जातियों, हमारी भाषाओं, हमारे रिश्तों की पहचान कराता हैं।
भले ही बहुत से लोग इसे पैसे और ताकत का खेल मानते हों, लेकिन ज्यादातर लोगों का मानना है कि चुनावों में जीत हमेशा ही सच की होती है, यानी जो जीतता है वही सच होता है और उसी सच के खेल से हमारी सरकार बनती है। हमारे नुमाइंदे चुन कर आते हैं और कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि हमारे नेता हमारी छवि या हमारा आईना होते हैं, तो फिर नाराजगी किस बात की। यदि आपके अपने चुने हुए नेता अच्छे नहीं लगते, बेईमान और भ्रष्ट लगते हैं तो पहले खुद को सुधारिए , शराब और पैसे या फिर जाति और धर्म के नाम पर वोट मत डालिए। एक नारा कहीं कभी पढ़ा था कि खुद सुधरेंगे, तो युग सुधरेगा। सच के साथ चलिए, तब ही होगा सत्यमेव जयते।
विजय त्रिवेदी (लेखक एनडीटीवी इंडिया में डिप्टी एडिटर हैं)
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