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Sunday, 01 August, 2010
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हादसों पर लगे ब्रेक
Friday, March 05, 2010, 10:45 hrs IST
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Road-Safety
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जयपुर-कोटा राजमार्ग पर सिरोही गांव में मंगलवार को सड़क हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई और तीस के करीब यात्री घायल हो गए। प्रतिदिन सड़क हादसों में मौत का भयावह तांडव होता है। साल का कोई दिन ऎसा नहीं जाता होगा, जब अखबारों की सुर्खियों में सड़क दुर्घटनाओं में बेबस यात्रियों की मौत का समाचार न हो। ह्वदयविदारक सड़क दुर्घटनाओं की खबरें छपती ही रहती हैं। अब तो स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि इन हादसों के समाचार हमारी संवेदनाओं को भी नहीं जगा पाते और सामान्य खबरों की तरह हम इन समाचारों को भी सरसरी निगाह में गुजार देते हैं।

कई बार तो एक एक दिन मेे ही दस-बीस या पच्चीस-पचास लोगों के मारे जाने की खबरें एक सामान्य बात हो गई हैं। देश में हर वर्ष जनवरी के पहले सोमवार से एक सप्ताह तक सड़क सुरक्षा सप्ताह का आयोजन किया जाता है। राजस्थान में भी हर साल प्रदेश स्तर पर सड़क सुरक्षा सप्ताह की रस्म अदायगी की जाती है, लेकिन सड़क हादसों पर ब्रेक लगाने में यह आयोजन अभी तक नाकाम साबित हुआ है। यहां तक कि दुर्घटनाओं और इनमें मरने वालों की संख्या साल दर साल बढ़ती जा रही है। राजस्थान में 2005 में 23,115 दुर्घटनाओं में 6793 मरे, 2006 में 23,348 दुर्घटनाओं में 7154, वर्ष 2007 में 2388 दुर्घटनाओं में 8143, वर्ष 2008 में 23,704 दुर्घटनाओं में 8398 और 2009 में करीब 24,800 सड़क दुर्घटनाएं हुइंü, जिनमें करीब 8800 लोगों की मौत हो गई और घायलों की संख्या करीब 31,000 रही। इस प्रकार राजस्थान में औसतन रोजाना 67 सड़क दुर्घटनाएं घटित होती हैं, प्रतिदिन 24 जानें जाती हैं और 90 घायल होते हैं। प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। पिछले 5 वर्ष के आंकड़ों के अनुसार 2005 से 2009 तक करीब 118552 दुर्घटनाओं में करीब 39,300 लोग दम तोड़ चुके हैं। भारत में प्रतिदिन 312 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं अर्थात वर्ष भर में दुर्घटनाओं में 1,03,880 लोग मारे जाते हैं। ताजा आंकडों के मुताबिक देश में हर घंटे कम से कम 13 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं। 2007 में 1.14 लाख लोगों ने सड़क हादसों में अपनी जान गंवाई थी। यह उन 64,000 हत्याओं से अघिक है, जो दर्ज हुई थीं। जम्मू कश्मीर में 2009 में सड़क हादसों में 1031 मरे, जबकि आतंकी हमलों में केवल 72 मारे गए। देश में राजस्थान का दुर्घटनाओं में छठा स्थान है।

जयपुर गुलाबीनगर की सड़कें अब कातिल होती जा रही हैं। मुख्य सड़क हो या गली मोहल्लों की, ऎसा कोई दिन नहीं जाता, जब तेज गति से वाहन चलाकर लोगों को बेमौत नहीं मारा जाता हो। जयपुर शहर में कुल 14 लाख से अघिक वाहन हैं। इनमें 60 हजार रिक्शे, 17 हजार ऑटोरिक्शा हैं। शहर में पिछले पांच साल में करीब साढ़े छह लाख नए वाहन रजिस्टर्ड हुए हैं। वर्ष 2009 तक शहर में करीब साढे चौदह लाख वाहनों का रजिस्ट्रेशन हुआ है। शहर में वाहनों की संख्या जनसंख्या की वृद्धि दर से दोगुनी है। जयपुर में जनसंख्या की वृद्धि दर 6 प्रतिशत सालाना है, जबकि वाहनों की संख्या में हर साल 12 प्रतिशत की वृद्धि होती है।

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से भी ज्यादा तेजी से जयपुर में ट्रेफिक का प्रेशर बढ़ रहा है। बीते पांच साल से यहां वाहनों की संख्या में 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। मुंबई में हर साल 12 प्रतिशत की दर से वाहन बढ़ रहे हैं, जबकि जयपुर में यह प्रतिशत 13 है। जयपुर में पिछले पांच सालों में व्हीकल्स की संख्या 50.34 प्रतिशत बढ़ती है। 2004-05 में वाहनों की संख्या 9,23,134 थी। यह 2007-08 में बढ़कर 13,87,857 हो गई। पांच साल में शहर में कुल 4,64,723 व्हीकल्स बढे हैं। तेजी से बढ़े वाहनों के कारण ट्रेफिक रेंगता नजर आता है। वर्ष 1997 के बाद यातायात पुलिस बेडे में कोई इजाफा नहीं हुआ, जबकि शहर में वाहनों की संख्या 4,92,020 से बढ़कर वर्तमान में 13,97,305 पहुंच गई है। ये वाहन केवल जयपुर से पंजीकृत हैं। उन वाहनों की संख्या अलग है, जो अन्य जिलों में पंजीकृत हैं। वर्ष 1997 में जयपुर में ट्रेफिक के लिए 870 पुलिसकर्मी स्वीकृत थे। आज भी वही नफरी है। इस प्रकार अब जयपुर में यातायात व्यवस्था के लिए 1674 वाहनों और 3470 नागरिकों पर केवल एक पुलिसकर्मी है, जो घोर अपर्याप्त है।

राज्य से गुजरने वाले करीब डेढ़ दर्जन नेशनल हाइवे पर पिछले दो सालों से करीब 15 हजार से अघिक छोटी व बड़ी दुर्घटनाएं हुई हैं, जिसमें साढे छह हजार से ज्यादा लोगों की मौत और करीब बीस हजार लोग घायल हुए हैं। इसमें सूत्रों के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अघिक कारें व जीपें शिकार होती हैं। वर्ष 2008 तक के आंकडे बताते हैं कि साल दर साल कार व जीप दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके बाद दुपहिया वाहन व ट्रकों का नंबर आता है। इनके मुकाबले बस दुर्घटनाएं आधी से भी कम हैं।

राजस्थान में 2008 में 6507 दुर्घटनाएं कार-जीप से, 5150 दुपहिया और 4909 ट्रक से हुई। नब्बे प्रतिशत दुर्घटना ओवरटेक करने व ओवरलोडिंग से होती है। भारत में प्रतिवर्ष 92,500 लोग ओवरलोडेड ट्रक के नीचे दबकर मारे जाते हैं। हर तीसरे ट्रक में ओवरलोड होता है। जयपुर शहर में पिछले तीन सालों में रोड एक्सीडेंट के दो हजार से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं। इन मामलों मेे हर साल साढे चार सौ से ज्यादा लोग आकस्मिक मौत के ग्रास बने हैं। वर्ष 2006 में दर्ज 2309 मामलों में घायलों की संख्या 2124 और 454 मृतक थे। वर्ष 2007 में सड़क दुर्घटनाओं के 2316 केस दर्ज हुए। इनमें घायलों की संख्या 2096 और 495 लोग मौत का शिकार हुए। वर्ष 2008 में 2098 केसेज में एक्सीडेंट्स ने 452 लोगों की जिंदगी को लील लिया और 1888 लोग घायल हुए। देशभर में सड़क दुर्घटनाओं के मामले में जयपुर का सातवां और इन्हीं दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या में पांचवा स्थान है। शायद ही कोई ऎसा दिन गुजरता होगा जब वाहन दुर्घटना न हो और सड़क पर खून न फैले। शहर के किसी न किसी हाइवे, चौराहे या तंग गलियों में यातायात में लापरवाही बरतकर कोई न कोई काल का ग्रास बनता ही है। रेड लाइट क्रॉस करना, गलत ओवरटेकिंग करना, तय गति सीमा से तेज गाड़ी चालाना, शराब पीकर ड्राइव करना ऎसी 80 प्रतिशत मानवीय भूलों के चलते ही गंभीर परिणाम देखने को मिलते हैं। इनमें तेज स्पीड मुख्य कारण होती है। सड़कों की खस्ता हालत भी इसकी एक वजह बताई जाती है। मुस्कान संस्था के सर्वे में सामने आया कि बड़े एक्सीडेंटस के अलावा भी शहर में रोजाना 200 से ज्यादा साइलेंट एक्सपीडेंट्स होते हैं।

सड़क सुरक्षा के तीन मूलभूत कारक हैं- ड्राइवर का प्रशिक्षण, सड़क का रखरखाव और यातायात नियमों का कड़ाई से पालना। सुरक्षित यातायात प्रबंधन के अलावा इस समस्या से निपटने का कोई बेहतर तरीका नहीं है। इसके लिए व्यापक राष्ट्रीय नीति का निर्माण आवश्यक है और सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और जनसहयोग अपेक्षित है। समाज और सरकार के संयुक्त प्रयासों से ही प्रदेश में आए दिन होने वाले सड़क हादसों को रोका जा सकता है, अन्यथा सड़कों पर मौत का तांडव आए दिन होता रहेगा।

डॉ. ज्ञान प्रकाश पिलानिया
(लेखक राज्यसभा सदस्य हैं)
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