सामाजिक अंकेक्षण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट का अनिवार्य कानूनी अंग है। साल में दो बार महानरेगा के तहत हुए कार्यो का सोशल ऑडिट जरूरी है। वैसे तो सूचना का अधिकार लागू होने के बाद सभी सरकारी दस्तावेज खुले कर दिए गए हैं, लेकिन महानरेगा के कार्योü के सामाजिक अंकेक्षण से 15 दिन पहले ही संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने जरूरी हैं। महानरेगा में सामाजिक अंकेक्षण केवल विकास कार्योü का ही नहीं होता है, बल्कि जॉब कार्ड, कार्य, बेरोजगारी भत्ता आदि की भी ऑडिट होगी। प्रक्रिया, नियम और धन की सोशल ऑडिट के प्रावधान को सरकार चाहे तो भी नहीं हटा सकती है। इसमें बदलाव केवल संसद ही कर सकती है। इसलिए सोशल ऑडिट रोकने अथवा इसमें किसी प्रकार के संशोधन की किसी भी मांग को न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। जब रोजगार गारंटी एक्ट बन रहा था, तब भी अमीर लोगों ने यह कहकर इसका विरोध किया था कि यह भ्रष्टाचार वितरण की स्कीम बनकर रह जाएगा। स्वर्गीय राजीव गांधी ने भी कहा था कि केन्द्र से हम एक रूपया भेजते हैं, जो आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते केवल 15 पैसे ही रह जाता है। अमीरों के इन तर्को को ध्यान में रखकर ही इस योजना में अनिवार्य सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था की गई, ताकि योजना में किसी प्रकार की अनियमितता की कोई आशंका नहीं रहे। जो लोग सामाजिक अंकेक्षण के खिलाफ बोल रहे हैं, जनता भलीभांति उनका आशय समझ रही है कि वे ऎसा क्यों बोल रहे हैं। लोग जानते हैं कि उनकी मंशा क्या है और उनकी नीयत क्या है? कुछ संशोधन के बाद यह प्रावधान कर दिया गया कि सामाजिक अंकेक्षण का काम ग्रामसभा ही देखेगी। पहले भी ऑडिट का काम ग्रामसभा ही देखती थी, लेकिन इस प्रक्रिया में एनजीओ मदद करते थे। ग्रामसभा द्वारा सामाजिक अंकेक्षण पर सीएजी ने आपत्ति की थी कि जो एजेंसी खुद खर्च करती है, वह खुद ऑडिट नहीं कर सकती है। ऑडिट को लेकर किसी तरह की भ्रम की स्थिति पैदा करना अच्छी बात नहीं है। भीलवाड़ा में सोशल ऑडिट का एक उदाहरण देखिए। ऑडिट हुई, उस समय मंत्री भी बैठे थे और जनप्रतिनिधि भी। सामान के खरीद में गड़बड़ी पाई गई। एक बिल में जिससे सीमेंट खरीदना बताया गया, वह साइकिल के पंक्चर निकालता था। अब बताइए साइकिल के पंक्चर निकालने वाले का सीमेंट की दुकान से क्या संबंध? ऑडिट में इस तरह की बहुत सी अनियमितताएं उजागर हुई। गड़बडियों को सुधारने के लिए व्यवस्था में कुछ सुधार किए गए, वही अब कुछ लोगों को परेशान करने वाले लग रहे हैं। व्यवस्था में यदि आवश्यक सुधार नहीं होगा, तो व्यवस्था बिगड़ते देर नहीं लगती है, जो किसी के हित में नहीं है। सरपंच आखिर यह क्यों नहीं समझते हैं कि मंत्री, सांसद और विधायकों के सरकारी चैक पर साइन नहीं होते हैं, लेकिन सरपंचों से चैक पर साइन करवाए जाते हैं। कुछ सरपंच इस पीड़ा को लेकर हमारे पास भी आए थे कि गड़बड़ी दूसरे करते हैं और चैक पर साइन के कारण उन्हें फंसा दिया जाता है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि सजा उसी को मिलनी चाहिए, जिसने गड़बड़ी की है। यदि कहीं निर्दोष फंस रहा है, तो व्यवस्था में सुधार जरूरी हो जाता है। एक सुझाव यह भी आया कि चैक पर सरपंच के हस्ताक्षर नहीं करवाए जाएं, ताकि सरपंच नहीं फंसें। महानरेगा संबंधी फाइल नोटिंग पर अब पांच लोगों के हस्ताक्षर होते हैं। सरपंच, जूनियर इंजीनियर, ग्राम सेवक, रोजगार सहायक और संबंधित वार्ड मैंबर के संयुक्त हस्ताक्षर से फाइल नोटिंग के आधार पर निर्माण सामग्री दिया जाना तय हुआ। ब्लॉक स्तर पर भी विकास कार्यो के लिए टेंडर सिस्टम बना है। सुधार की इस प्रक्रिया से ही कुछ सरपंचों को लग रहा है कि उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। सरपंचों को अपने अधिकारों के साथ अपने दायित्व का अहसास होगा, तभी उनकी परेशानियां कम हो पाएंगी। एक बात सभी को भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है। जनता के पैसे का जनता को हिसाब देना होगा, अब यह किसी की इच्छा पर निर्भर नहीं है, बल्कि कानूनन मजबूरी है। अरूणा राय (लेखिका राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य हैं) जनता की जेब काटने की मंशा पंचायतीराज संस्थाओं को ज्यादा अधिकारों से मजबूती मिले और जनप्रतिनिधियों को पूरा सम्मान मिले। इस पर भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। सरकार ऎसा कर भी रही है। यदि जनप्रतिनिधि विकास योजनाओं में लूट की छूट चाहने लगें, तो ऎसा कर पाना न तो सरकार के लिए संभव है और न ही ऎसा कर देना जनता के हितों के अनुकूल होगा। सरपंचों की मांगों को देखकर तो सीधा-सीधा यही लगता है कि उनकी गांवों के विकास और जनता के कल्याण की चिंता से ज्यादा दिलचस्पी विकास योजनाओं की राशि हड़पने में है। सरपंचों के आंदोलन की शुरूआत एक गैर राजनीतिक संगठन ने की, लेकिन आंदोलन में भीड़ जुटी, तो भाजपा ने उसे हाईजैक कर लिया। भाजपा चूंकि एक राजनीतिक दल है और उसे राजनीति करने का हक है, लेकिन इस सवाल का जवाब तो उसे देना ही होगा कि जब भाजपा की खुद की सरकार थी, तब वह महानरेगा में सामाजिक अंकेक्षण क्यों नहीं रूकवा पाई और गड़बडियों में लिप्त पाए गए सरपंचों के खिलाफ मामले दर्ज क्यों होने दिए। कहने का मतलब यह है कि सरपंचों की जो कुछ मांगे थीं, वह सब गौण हो गई और अब यह महज भाजपा का राजनीतिक आंदोलन बनकर रह गया है। सरपंच यदि अपनी ग्राम पंचायत का विकास ही चाहते हैं, तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि विकास कार्यो के लिए सामग्री पंचायत स्तर अथवा जिला स्तर पर निविदाएं आमंत्रित कर दी जाए अथवा खरीद का अधिकार उन्हें दिया जाए। यह भी तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा है कि सामाजिक अंकेक्षण के कारण सरपंच फंस रहे हैं, इसलिए इसे बंद कर दिया जाए। देखा जाए तो महानरेगा ही एकमात्र ऎसी योजना है, जिसके तहत कार्य करने वाले श्रमिकों का भुगतान पोस्ट ऑफिस अथवा बैंक अकाउंट से होता है। इससे पहले तो ज्यादातर मामलों में यही होता था कि मस्टररोल लिया और राहत कार्यो का पूरा भुगतान फर्जी अंगूठे लगवाकर उठा लिया जाता था। शिकायतें भी होती थीं, जांच भी करवाई जाती थी, लेकिन तब सरपंच ज्यादा पॉवरफुल होते थे और आसानी से बच निकलते थे। सरपंच इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि अब स्थितियां बदल गई हैं। देशवासियों को अपना हिसाब-किताब जानने का कानूनन अधिकार मिल चुका है। जो भी काम होगा पूरा-पूरा लेखा-जोखा आम आदमी चाहे जब देख सकता है। यह बात उनके समझ में क्यों नहीं आती है कि नरेगा केवल योजना ही नहीं, एक कानून भी है। किसी योजना में दबाव डालकर सरकार से अपने अनुकूल संशोधन करवाए जा सकते हैं, लेकिन कानून में संशोधन इतना आसान नहीं है। जनप्रतिनिधियों को किसी राजनीतिक दल के बहकावे में आने की बजाय अपना ध्यान जनसेवा पर केन्द्रित करना चाहिए। रही बात सरपंचों को चोर समझने अथवा कहने की, तो यह एक कड़वी सचाई है कि आम लोगों की भी ऎसी ही धारणा है। हालांकि इसमें कोई दोराय नहीं है कि अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है, लेकिन कहते हैं ना कि एक मच्छली सारे तालाब को गंदा कर देती है। अव्वल तो जनप्रतिनिधियों को अपने काम से अपनी छवि ऎसी बनानी चाहिए कि उन पर कोई आक्षेप नहीं लगे, फिर उनका आचरण भी तो ऎसा होना चाहिए, जिससे उन पर कोई अंगुली नहीं उठे। राजनीति जनसेवा का एक माध्यम है, यही ध्येय लेकर राजनीति में आएंगे, तो राह भले ही कठिन हो, लेकिन आत्मिक संतुष्टि मिलेगी। यदि राजनीति में लाभ कमाने के मकसद से कोई आ रहा है, तो उसे समझ लेना चाहिए कि उसे सिवाय बदनामी के कुछ हासिल नहीं होगा। सरपंचों की वाजिब मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार होना चाहिए और विकास की राह में कोई रूकावट है, तो उसे निश्चित रूप से दूर किया जाना चाहिए। यदि कोई यह चाहे कि विकास के लिए अधिकार भी दिए जाएं और इसके लिए धन भी दिया जाए, लेकिन उसका कोई हिसाब नहीं पूछा जाए, तो यह न तो संभव है और न ही ऎसा कोई कानूनी रूप से कर सकता है। जनता के हितों को ध्यान रखेंगे, तो जनता आपके साथ खड़ी नजर आएगी और यदि उनकी जेब काटनी शुरू कर दी, तो यही जनता आपको समय पर सबक सिखाना भी जानती है। सत्यनारायण सिंह (लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं)
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