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Tuesday, 07 February, 2012
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चिंता बढ़ातीं चालाकियां
Friday, September 03, 2010, 09:18 hrs IST
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चीन में एक बड़े राजनेता हुए हैं- डेंग झिआओपिंग। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में उन्होंने ही चीन को उदारीकरण की राह पर धकेला था। विदेश मामलों के लिए उन्होंने चीन को "ताओगुआनग्यानघुई" की एक नीति दी। उन्होंने कहा था-"जब भी हालात विपरीत हों, तो अपने को कमतर दिखलाने की कोशिश करें और जैसे ही हालात अनुकूल बनें, तो अगले पर सवार हो जाएं।" बीते तीन दशक पर नजर डालें, तो जम्मू-कश्मीर चीन की विदेश नीति का हिस्सा नहीं था।
भारत के साथ उसकी विदेश कूटनीति सीमा विवाद, अरूणाचल प्रदेश और तवांग (जहां 17 वीं शताब्दी में छठे दलाई लामा ने जन्म लिया) जैसे मुद्दों पर ही केन्द्रित थी, लेकिन जिस तरह से उसने जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए स्टेपल वीजा और भारतीय सेना के उत्तरी कमांड के प्रमुख को वीजा देने से इनकार किया है, उससे साफ है कि चीन ने कश्मीर को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया है। हमेशा की तरह भारतीय राजनेता इसे पाकिस्तान से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान के कहने पर चीन ऎसा कर रहा है, लेकिन ऎसा है नहीं। अगर ऎसा होता तो चीन कबका कश्मीर मामले में दखल दे देता, जबकि बीते साल नवंबर में खुद अमेरिका ने उसे दोनों देशों के बीच चौधराहट करने की हरी झंडी दे दी थी।
कूटनीतिक स्तर पर चीन हमेशा से यही कहता आया है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला है। अलगाववादी नेता मीर वायज उमर फारूक ने बीते साल नवंबर में अपने चीन दौरे पर मध्यस्थता का प्रस्ताव वहां के हुक्मरानों के सामने रखा था, जिसे ठुकरा दिया था। यहां यह समझने की जरूरत है कि ऎसा क्या हो गया कि चीन अब अरूणाचल प्रदेश के साथ-साथ कश्मीर को भी अपनी कूटनीति में शामिल करने जा रहा है। दरअसल इसके बहुतेरे कारण हैं। अमेरिकी इसे चीन की विस्तारवादी नीति से जोड़कर देख रहे हैं। यूरोपीय देश इसे चीन की सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के रूप में देख रहे हैं। जो कारण सीधे रूप में समझ में आता है, वह है चीन का भारत को एक कमजोर और लुंजपुंज लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में देखना, जिसकी कूटनीति हमेशा से रक्षात्मक रही है। या यूं कह लीजिए जब भी उसको आंखें तरेरी जाएं, तो वह हमेशा अच्छे संबंधों की दुहाई देने लगता है। यहां अपने विदेश मंत्रालय की तरह बात घुमा-फिराकर भी कही जा सकती है, लेकिन सच यही है कि चीन को लेकर साउथ ब्लॉक के पास (अमेरिकी भरोसे को छोड़कर) अपनी कोई रणनीति है ही नहीं।
राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अरूणाचल प्रदेश जाते हैं, तो विदेश मंत्रालय को चीन को सफाई देनी पड़ती है कि वे भारत में कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र हैं। चीन एशियाई विकास बैंक को अरूणाचल प्रदेश में सिंचाई परियोजनाओं के लिए 60 मिलियन डॉलर का ऋण जारी करने पर हड़का देता है, तो विदेश मंत्री एसएम कृष्णा कहते हैं कि एडीबी को छोडिए, ऎसे "संवेदनशील" क्षेत्रों में सरकार अपना ही पैसा लगाएगी। चीनी लाल सेना जब चाहे मैकमोहन रेखा के इस पार भारतीय सीमा में घुस आती है। पत्थरों पर लाल स्याही से चीन लिखकर चली जाती है। लद्दाख प्रशासन जम्मू-कश्मीर सरकार को रिपोर्ट भेजता है कि लाल सेना ने उन्हें नरेगा के तहत बनाई जा रही सड़क का काम करने से रोक दिया है। अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को वहां के सांसदों के साथ यह बताने के लिए दिल्ली आना पड़ता है कि चीन अपनी ओर ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बना रहा है। ये बातें जब मीडिया में उछलती हैं, तो सरकार चेतती है और चीन से पूछती है कि क्या हो रहा है? चीन हमेशा की तरह यही कहता है कि कुछ नहीं। सब बे-सिरपैर की बातें हैं।
सरकार यानी विदेश मंत्री, वाणिज्य मंत्री और यहां तक की राष्ट्रपति चीन के दौरे पर जाती हंै, तो उम्मीद की जाती है कि वह चीन से भारत के लिए सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट का आश्वासन लेकर आएंगी। दोनों देशों के व्यापार में भारत के घाटे की खाई को कम किया जाएगा। चीन को समझाया जाएगा कि वह पाक अधिकृत कश्मीर में किसी भी परियोजना में शामिल ना हो। पाकिस्तान की सैन्य हथियारों से मदद ना करे। आदि-आदि। असल में होता क्या है? सूचना क्रांति के इस दौर में विदेश मंत्री एसएम कृष्णा दोनों देशों के बीच हॉटलाइन (साठ के दशक की फोन लाइन) स्थापित करके आते हैं। वे चीन को समझाते हैं कि वह थाइलैंड, फिलिपींस और वियतनाम से बासमती चावल, आम और सब्जियां लेने के बजाए इन्हें भारत से ले। सस्ते पड़ेंगे। कहां बात बीजिंग से आईटी, फार्मेसी आदि क्षेत्रों के दरवाजे खोलने की करनी होती है और हो जाती है आम, सब्जियों की। तो यह तो हाल है हमारी विदेश नीति का।
चीन की दक्षिणी-पूर्व-एशिया देशों में काट के लिए भारत ने 1991 में लुक ईस्ट पॉलिसी बनाई। 1993 में बर्मा से पहले व्यापारिक और बाद में सैन्य संबंध जोड़े। चीन के ग्रेटर मेकोंग उपक्षेत्र के मुकाबिल 2000 में मेकोंग-गंगा कॉर्पोरेशन का गठन किया। बंगाल की खाड़ी से जुड़े देशों का "बिम्सटेक" संगठन बनाया। श्रीलंका, थाईलैंड समेत कई देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए। एशिया पेसिफिक इकोनॉमिक कॉर्पोरेशन में एंट्री की। आशियान में भी भारत घुसा, लेकिन कहां चीन की 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी और कहां 1.3 ट्रिलियन डॉलर की भारत की अर्थव्यवस्था। हकीकत यही है भारत की 20 साल की लुक ईस्ट पॉलिसी के बावजूद भारत चीन को उसके दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से अलग-थलग करने में असफल रहा। उलटे चीन ने इन देशों के साथ ऊर्जा स्रोतों और सीमा विवाद का खेल शुरू कर दिया है। नेपाल, बांग्लादेश, बर्मा, श्रीलंका, मालदीव आदि देशों में चीन ने बंदरगाह निर्माण, ऊर्जा करार और वित्तीय मदद की नीति अपनाई है। पाकिस्तान उसके साथ हमेशा से है। उसके तेल और गैस से भरे जहाजों को मध्य एशिया से स्वदेश आने के लिए हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर का चक्कर नहीं लगाना पड़े, इसके लिए वह कश्मीर के ऊपर से गुजर रहे काराकोरम हाइवे को चौड़ा करने के साथ ही उसके साथ-साथ रेल लाइन बिछा रहा है। काराकोरम हाइवे ही वो मार्ग है, जो चीन को तो मध्य एशिया से जोड़ता है, लेकिन यही मार्ग मध्य एशिया के ग्रेटर तुर्कीस्तान के अलगाववादियों को भी चीन के पश्चिमी प्रांत झिंगजियांग से जोड़ता है।
अल कायदा जैसे संगठनों को भी चीन में घुसने का यह आसान रास्ता नजर आता है। चीन इसी बात से चिंतित है। पूरी संभावना है कि काराकोरम राजमार्ग और रेल लाइन की सुरक्षा की जिम्मेदारी पाकिस्तान चीन को ही दे दे। इन हालात में चीन के लिए कश्मीर महत्वपूर्ण हो जाता है। कश्मीर की हलचल वाली यह दरार कुर्द इलाके (बगदाद) से लेकर जापान के सेनकाकुस द्वीप (डिआईयूताई चीनी में) तक फैली है। इस दरार में तेहरान, नार्दन एलायंस (अफगानिस्तान), ब्लूचिस्तान और एफएटीए (पाकिस्तान), कश्मीर, नेपाल, भूटान, बर्मा, पैरासेल द्वीप (वियतनाम), ताइवान और जापान का सेनकाकुस द्वीप शामिल है। चीन इन सबमें अपना प्रभुत्व चाहता है।
घनेन्द्र सिंह सरोहा
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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