क्रिकेट का मक्का कहा जाने वाला लाड्र्स आज से पहले कई अविस्मरणीय पारियों और 1983 विश्वकप में भारत की रोमांचक जीत के लिए याद किया जाता रहा है, लेकिन इस मक्का के नाम अब एक शर्मसार वाकया भी जुड़ गया। वाकया है चंद पैसों के लिए कुछ पाकिस्तानी खिलाडियों के बिक जाने का। हालांकि बात अभी साबित नहीं हुई, लेकिन जैसे आसार हैं, साबित होते देर नहीं लगेगी। और अगर साबित हो जाती है, तो क्रिकेट को "जेंटल मेन्स का खेल" से नवाजा जाना बेमायने होगा। ऎसा बस लगने ही लगा था कि क्रिकेट से सट्टेबाजी के बादल अब छंट रहे हैं कि अचानक एक सट्टेबाज ने एक लाख तीस हजार डॉलर के एवज में जो उगला, उससे यकीन हो गया क्रिकेट और सट्टेबाजी का रिश्ता यूं ही खत्म नहीं होने वाला। उसके दावे के अनुसार पाकिस्तान के चार खिलाड़ी मोहम्मद आसिफ, मोहम्मद आमिर, कमरान अकमल और सलमान बट ने लाड्र्स में इंग्लैंड के विरूद्ध खेले गए चौथे और आखिरी मैच में कई छोटी-छोटी चीजें फिक्स कीं, जिसके उसने सबूत भी दिए। दक्षिण लंदन में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के सट्टेबाज मजहर मजीद ने क्रिकेट के खेल के छोटे से छोटे पहलू पर होने वाली सट्टेबाजी और उसके लिए खेल को फिक्स करने के जो किस्से बताए हैं, उनको सुनने के बाद क्रिकेट की अनिश्चितता का रोमांच मर जाता है। इस सट्टेबाज ने ब्रितानी अखबार "द न्यूज ऑफ दी वल्र्ड" के सामने स्टिंग ऑपरेशन के दौरान जिन गेंदों पर नो बॉल की बात कही, उन्हीं गेंदों पर पाकिस्तानी गेंदबाज मोहम्मद आसिफ और मोहम्मद आमिर ने नो बॉल फेंकीं। यह अपने आप में उनके खिलाफ गवाही दे रहा है। आम लोगों को भले ही यह लग रहा होगा कि भला इस छोटी-सी बात का सट्टा कैसा? आमतौर पर सट्टेबाजी हार या जीत पर ही होती है। इस तरह की सट्टेबाजी को "स्प्रेड बेटिंग" कहते हैं, जिसमें किसी भी बात पर सट्टा लगाया जाता है और देखा जाता है कि आपका अनुमान कितना सही है। स्प्रेड बेटिंग में खिलाड़ी सट्टेबाजों से पैसा खाकर नो बॉल, वाइड बॉल, बाउंसर और धीमी गति से गेंदें फेंकते हैं, कैच छोड़ते हैं, रन बनाने की गति तेज और धीमी करते हैं, फील्डिंग में जानबूझ कर गलतियां करते हैं और बल्लेबाजों व गेंदबाजों का क्रम बदलते हैं। सटोरियों को इसमें आसानी होती है, क्योंकि उन्हें एक-दो खिलाडियों को ही साथ मिलाना होता है और ऎसे मामलों में घोटालों का पता आसानी से नहीं लग पाता। हालिया मामला तो स्टिंग ऑपरेशन की वजह से सामने आ गया। इस बात पर यकीन करने में भी ताज्जुब होता है कि अभी किसी खिलाड़ी के टीम में आए हुए जुम्मा-जुम्मा आठ दिन ही हुए हैं और उसने सट्टेबाजों तक अपनी पहुंच भी बना ली और वो भी ऎसा खिलाड़ी, जो अपने प्रदर्शन से संपूर्ण क्रिकेट जगत में अपनी छाप छोड़ रहा हो। नई पीढ़ी के सबसे होनहार तेज गेंदबाज के रूप में उभरे मोहम्मद आमिर ने जब इंग्लैंड की टीम के पांच विकेट चटका कर लाड्र्स की सरजमीन को चूमा, तब पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के क्रिकेट प्रेमियों के सीने चौड़े हो गए थे। बिना रन दिए इंग्लैंड के मध्यम क्रम के तीन खिलाडियों को पवेलियन लौटा देने वाले इस खिलाड़ी की इयन बाथम, जेफरी बायकाट और माइकल हाल्डिंग जैसे धुरंधर खिलाडियों सेे तुलना की जाने लगी। खेल खत्म होने के बाद नजारा ही बदल गया। आखिर एक उभरते खिलाड़ी और जिसका करियर अभी-अभी शुरू ही हुआ है, को सट्टेबाजों से पैसा बटोरकर मैच में नो बॉल फेंकने की जरूरत ही क्या थी? ये बातें कहीं तो इशारा कर रही हैं। आखिर ऎसे मामले में पाकिस्तानी खिलाड़ी ही ज्यादातर क्यों फंसते हैं? कारण महज पैसा नहीं हो सकता। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के पूर्व अध्यक्ष माल्कम स्पीड का मानना है कि यह बीमारी पाकिस्तानी क्रिकेट के स्वभाव में रही है। पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड के पूर्व सदस्य आरिफ अली अब्बासी ने पाकिस्तान में मैच फिक्सिंग के आरोपों की एक सुनवाई में बताया था कि 1979 में कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान पर टॉस के दौरान पाकिस्तानी कप्तान आसिफ इकबाल ने सिक्का जमीन पर गिरने से पहले ही ऎलान कर दिया था कि टॉस भारतीय कप्तान विश्वनाथ ने जीत लिया है, क्योंकि शायद वे टॉस हारने का सौदा करके आए थे। तब शायद क्रिकेट में उतना पैसा नहीं था, लेकिन अब तो हालात ऎसे नहीं हैं। शायद पैसा अपने साथ मुफ्त में बेईमानी भी ले आया। क्रिकेट में मैच फिक्सिंग के आरोप नब्बे के दशक से ही लगने शुरू हो गए थे। इसमें ज्यादातर का ताल्लुक दक्षिण एशियाई देशों की टीमों से ही था। पाकिस्तान टीम के 1994 के आस्ट्रेलिया दौरे के बाद आस्ट्रेलिया के तीन खिलाडियों शेन वार्न, मार्क वा और टिम मे ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान के कप्तान सलीम मलिक ने उन्हें खराब खेलने के लिए रिश्वत देने की कोशिश की। आरोप साबित हुए और उसके व पाकिस्तानी गेंदबाज अताउर रहमान पर आजीवन खेलने पर पाबंदी लगा दी गई। वर्ष 2000 में ही भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन और दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोनिए पर भी मैच फिक्सिंग को लेकर उनके खेलने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया था। हैंसी क्रोनिए-मोहम्मद अजहरूद्दीन कांड क्रिकेट मैच फिक्सिंग का अब तक का सबसे बड़ा कांड साबित हुआ। इसमें भारत के अन्य खिलाड़ी अजय जडेजा, मनोज प्रभाकर, अजय शर्मा और अली इरानी पर भी प्रतिबंध लगे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि क्रिकेट के खेल में स्प्रेड बेटिंग का यह वर्तमान घोटाला क्रोनिए-अजहरूद्दीन के बाद दूसरा बड़ा घोटाला साबित होगा। बहरहाल दुनिया भर के क्रिकेट बोड्र्स खेल की छवि पर लगे इस बदनुमा दाग को साफ करने की जितनी कोशिश कर रहे थे, सब फिर से बेमायने लगने लगा। क्रोनिए-अजहरूद्दीन मामले के बाद मैच फिक्सिंग की रोकथाम के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते का गठन तो किया और दोषी खिलाडियों को सख्त सजाएं भी हुईं, लेकिन उन सबका फायदा होते तो नहीं दिखता। थोड़े समय के अंतराल पर कुछ न कुछ मामलेे सामने आ ही जाते हैं। कोई भी घटना खिलाडियों को सट्टेबाजों के हाथों से बिकने से रोक नहीं पा रही हैं। तो आखिर वजह क्या है? क्या वजह है कि पाकिस्तान लगातार इसका शिकार बड़ी आसानी से बनता जा रहा है। एक तो वैसे ही पाकिस्तान में आतंक के साये में कोई देश वहां जाकर खेलना नहीं चाहता। उनके लिए किसी न किसी देश में क्रिकेट सीरीज का इंतजाम कराया जाता है। यह क्रिकेट इतिहास में पहली बार हुआ है कि इंग्लैंड ने पहले आस्ट्रेलिया को अपने देश बुलाकर पाकिस्तान से सीरीज कराई फिर खुद खेल रहा है, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान टीम की किसी न किसी मामले में फंसने की खबरें मिलती रहती हैं। फिर चाहे वो 2007 विश्व कप में पाकिस्तान टीम के आयरलैंड के हाथों आश्चर्यजनक रूप से हार जाने के बाद कोच बाब वूल्मर की रहस्यमय मौत का मामला हो या फिर गेंद से छेड़छाड़ का। थोड़े समय पहले ही कप्तान सहित टीम के ज्यादातर खिलाडियों पर मैच फिक्सिंग के आरोप लगे थे। सट्टेबाज मजहर मजीद ने अपने वीडियो टेप में दावा किया है कि पाकिस्तानी टीम के खिलाडियों के साथ उसके संबंध पिछले चार साल से हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आईसीसी का भ्रष्टाचार विरोधी दस्ता अपना काम ढंग से नहीं कर रहा है। सवाल यह है कि जिस देश में क्रिकेट के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा हो, वहां इससे जुड़े लोग पैसों के लिए इसे और खतरे में डालेंगे? माना कि पैसा एक तथ्य है, लेकिन शायद इसके पीछे और भी एक कारण है। वो है डर। डर सालों से घिरे इस लिंक से दूर रहकर राजनीति का शिकार होने का। डर, टीम से अलविदा कर दिए जाने का या फिर डर अंडरवल्र्ड का? गजाला अमरीन (लेखिका खेल पत्रकार हैं)
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