औद्योगिक घराने की 79 अरब रूपयों की वेदांता रिसोर्सेज बाक्साइट खनन परियोजना पर पर्यावरण मंत्रालय ने रोक लगाते हुए कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इस परियोजना की उड़ीसा के कालाहांडी तथा रायगढ़ जिलों की नियमगिरि पहाडियों पर प्रतिवर्ष एक मिलियन टन बाक्साइड खनन की योजना थी। इस कंपनी को 2008 में प्रथम चरण की पर्यावरण स्वीकृति मिली थी, परंतु पर्यावरण मंत्रालय ने दूसरे चरण में पुन: इस कंपनी को पर्यावरण स्वीकृति देने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि इस परियोजना को केन्द्र सरकार द्वारा पूर्व में दी गई स्वीकृति अभी सवालों के घेरे में है। फिलहाल दूसरे चरण में इस परियोजना पर रोक लगाने के कुछ ठोस कारण भी हैं। इस संबंध में एक तो नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट है, तो दूसरे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य एन.सी. सक्सेना की अध्यक्षता में गठित की गई पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति की संस्तुतियां भी हैं। इन दोनों ही रिपोर्ट में उल्लेखित है कि वेदांता ने वहां वन संरक्षण अधिनियम तथा पर्यावरण सुरक्षा कानून के प्रावधानों का सीधे-सीधे उल्लंघन किया है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट अंकित है कि यह परियोजना नियमगिरि के पहाड़ी क्षेत्र में निवास करने वाले डोगरिया कोंध, कुटिया कोंध और झरनिया समूह के आदिवासियों की आस्था और उनके सम्यक प्राकृतिक जीवन से खिलवाड़ कर रही है। खास बात यह है कि यह आदिवासी समुदाय अपने जीवन निर्वाह और पारंपरिक जीवनशैली के लिए नियमगिरि पहाडियों से जुड़े प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि सही मायनों में उड़ीसा का यह खनन क्षेत्र इन आदिवासियों के लिए उनकी सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक विरासत के साथ-साथ उनकी अपनी अस्मिता का संकेतक भी है। इस परियोजना के क्रियान्वयन से आदिवासियों के विस्थापन की आशंका अभिव्यक्त की जा रही है। इसी कारण उड़ीसा का आदिवासी क्षेत्र कई साल से इन परियोजनाओं पर रोक के लिए अंादोलनरत है। कहने की आवश्यकता नहीं कि तीन वर्ष के वैधानिक संघर्ष के बाद 8 अगस्त 2008 को उच्चतम न्यायालय ने अपने अहं फैसले में वेदांता समूह की स्टरलाइट की बाक्साइट खनन परियोजना को मंजूरी जरूर दी थी, परंतु इसके साथ ही पर्यावरण और वन मंत्रालय को भी इस कानून के तहत कंपनी को सोच-समझकर पर्यावरण स्वीकृति देने के प्रति भी आगाह किया था। संयोग अथवा दुर्योग से केन्द्र सरकार ने उसी वर्ष 11 दिसंबर को ही कंपनी को सैद्धांतिक रूप से पर्यावरण मंजूरी दे दी थी। वर्तमान में पर्यावरण मंत्रालय के रोक के इस प्रमुख निर्णय के साथ ही उड़ीसा की राज्य सरकार और कांग्रेस के मध्य खींचतान भी शुरू हो गई है। इसके साथ ही इससे जुड़े कुछ और सवाल भी हवा में तैर रहे हैं कि देश के विकास के नाम पर क्या वहां के आदिवासियों और जनजातियों से उनके जल, जंगल और जमीन से जुड़ी रोजी-रोटी छीन लेना कहां तक उचित है? देश में इस समय आठ फीसदी आबादी देशज लोगों की है, परंतु उनसे जुड़ा 95 फीसदी वन क्षेत्र सरकार के अधिकार में है। देश की अधिकांश आदिवासी आबादी अपने वैधानिक व सामुदायिक अधिकारों से वंचित है। देश में अब तक इन वनवासी क्षेत्रों में विशाल परियोजनाओं के चलते 10 मिलियन से भी अधिक जनजातियां विस्थापित हो चुकी हंै। केन्द्र के लंबे-चौड़े वायदे करने के बावजूद मात्र एक चौथाई आदिवासी लोगों को ही पुनस्र्थापित किया गया है। शेष आदिवासी समुदाय अपने जीवन अस्तित्व के लिए संघर्षरत है। देश की कुल विस्थापित आबादी में से लगभग 55 फीसदी आबादी इन आदिवासियों की ही है। आज देश में विदेशी मुद्रा लाने की होड़ मची है। वर्तमान में भारत का खनन क्षेत्र बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना है। सच यह है कि इस खनन क्षेत्र में नए-नए प्रकार की तकनीक लाई जा रही हैं, जो वहां के आदिवासियों के विस्थापन को बढ़ावा दे रही हंै। नि:संदेह भारत खनिज संपदा संपन्न देश है। यहां लगभग पच्चीस प्रकार के प्रमुख खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, जिनमें लोहा, बाक्साइट, कॉपर, क्रोम, सोना, हीरा, कांसा, जिंक तथा कोयला इत्यादि प्रमुख हैं। इन खनिजों में 50 फीसदी मात्रा 3.20 मिलियन वर्ग क्षेत्र में फैली है। कहना न होगा कि यह क्षेत्र देश के पूर्वोत्तर व मध्य राज्यों जैसे उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व झारखंड जैसे राज्यों में केन्द्रित है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस संपूर्ण क्षेत्र का पारिस्थितिक क्षेत्र बहुत धनी है तथा यहां की जैवविविधता बहुआयामी है। यहां के आदिवासी लोग संपूर्ण प्राकृतिक तंत्र का संरक्षण करते हैं। इस संदर्भ में यहां गौर करने लायक तथ्य यह है कि वेदांता की खनन परियोजना रद्द होने के बाद उड़ीसा का बाक्साइट भंडार प्रमुख रूप से चर्चा में आ गया है। ऎसा अनुमान है कि अकेले उड़ीसा में विश्व का चौथा बाक्साइट भंडार है, जो राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में फैला हुआ है। यही कारण है कि उड़ीसा का यह खनन क्षेत्र आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पहली पसंद बन रहा है। कहना न होगा कि विगत दो माह में जिस प्रकार वेदांता समूह तथा कोरियाई कंपनी पॉस्को जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में साम्राज्यवादी शक्तियों को करारा झटका मिला है, उससे यह बात स्पष्ट हो गई है कि राज्य व केन्द्र सरकार खनन के लिए लीज पर दी जाने वाली भूमि तथा उन पर स्थापित होने वाली परियोजनाओं के विषय में स्वयं ही भ्रमित है। सरकारें एक ओर इन कंपनियों से बड़ा मुनाफा भी कमाना चाहती हैं, तो दूसरी ओर वंचित समुदायों के लिए विकास कार्यक्रमों के लागू न करने से उन्हें अपने राजनीतिक वोट बैंक के खिसक जाने का भी बहुत बड़ा खतरा है। इस पूरे प्रकरण में सच चाहे जो हो, परंतु इतना जरूर है कि सरकारें इन आदिवासियों के विस्थापन से उभर रहे अंादोलन को दबाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने के संतुलन का अर्थशास्त्र विकसित करना चाहती हंै। निश्चित ही यह इन आदिवासियों के भविष्य के साथ उनके संपूर्ण प्राकृतिक जीवन से खिलवाड़ है। इस प्रकार की परियोजनाओं को स्वीकृति देने के इन सरकारों के पास न कोई स्पष्ट नियम हैं और न ही ऎसी नियामक संस्थाएं हैं, जो इन कंपनियों की मनमानी और आर्थिक स्वार्थपरता पर लगाम लगा सकें। पिछले दिनो अवैध खनन से जुड़ा बेल्लारी बंधुओं का प्रकरण सभी के संज्ञान में है। अरावली से जुड़े मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय की चिंता किसी से छिपी नहीं है। इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में खनन के पट्टे आवंटित करने में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सरकार के बीच जो गठबंधन उभरकर सामने आया है, वह भी सभी के सामने है। पर्यावरण मंत्रालय के द्वारा वेदांता मामले में जो तत्परता दिखाई है, उससे इन कंपनियों की लूट-खसोट में कोई बहुत बड़ी कमी आएगी, यह उक्ति फिलहाल तर्कसंगत नहीं लगती। वह इसलिए, क्योंकि तमाम औद्योगिक समूह ऎसे हैं, जिन पर उनके दोषारोपण के बावजूद आज भी उन पर सरकार का वरदहस्त बना हुआ है। विगत दो दशक से लागू उदारीकरण की प्रक्रिया से ऎसे अनेक मामलों का खुलासा हआ है। देखना यह है कि वर्तमान का यह पर्यावरण संरक्षण एवं वनाधिकार कानून विकास और विस्थापन के बीच कितना तालमेल रखता है। देश के विकास हेतु औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती, लेकिन यह मुद्दा भी ज्वलंत है कि यदि औद्योगिक विकास यहां के मूलनिवासियों को विस्थापित करता है, तो इससे वंचित समूहों का संकुल अंादोलन की थकान से उन्मादी व उग्रवादी प्रवृत्तियों के साथ समझौता करने से नहीं हिचकिचाएगा। कटु सच यह है कि नक्सलवाद, उग्रवाद व युवाउन्माद जैसी विघटनकारी प्रवृत्तियां कहीं न कहीं विकास और विस्थापन के संघर्ष से उभरी हुई सामाजिक समस्याएं हैं। इन पर समय के साथ विचार किया जाना समय की ज्वलंत मांग है। डॉ. विशेष गुप्ता (लेखक वरिष्ठ समाजशास्त्री हैं)
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